चित्र: Jeevan Jose, Kerala, India / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
Aak Ka Milk आक का दुग्ध
Calotropis gigantea
अन्य नाम: आक का दूध, अर्क क्षीर
प्रयोज्य अंग: क्षीर
| रस | तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent) |
|---|---|
| गुण | लघु (Light), रूक्ष (Dry) |
| वीर्य | उष्ण (Hot) |
| विपाक | कटु (Pungent) |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | Classical systemic action |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Calotropis gigantea
- प्रयोज्य अंग: क्षीर
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: इन योगों में आन्तरिक प्रयोग वर्जित।
Aak Ka Milk के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
आक का दूध विशालकाय मदार (Calotropis gigantea) — बड़े, बैंगनी पुष्पों वाले अर्क — का क्षीर है। किसी भी टूटे हुए भाग से बहने वाला यही दुग्ध-सदृश रस यहाँ निर्दिष्ट अंग है।
अपने छोटे सजातीय की भाँति यह भी अनुसूची E1 का उपविष है। शास्त्रीय परम्परा में यह क्षीर एक संस्कार-द्रव्य तथा दाहक बाह्य लेप है — कभी भी सहज रूप से सेवन की जाने वाली औषधि नहीं।
वर्गीकरण
कुल एपोसाइनेसी (Apocynaceae, Asclepiadoideae)। यहाँ निर्दिष्ट अंग क्षीर है; पत्र, पुष्प तथा मूलत्वक् पृथक् रूप से प्रयुक्त होते हैं। रस: कटु, तिक्त। गुण: लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण। वीर्य: उष्ण। विपाक: कटु। दोषघ्नता: कफ एवं वात का शमन।
उपयोग एवं लाभ
शास्त्रीय निर्माण में धातु-कल्पों हेतु भावना एवं शोधन द्रव्य के रूप में, तथा बाह्य रूप से शलाका पर अत्यल्प मात्रा में मस्सों, गोखरू एवं हठी त्वचा-वृद्धियों पर प्रयुक्त। इस संग्रह में यह करञ्ज तैल तथा कासीसादि तैल में सम्मिलित है — दोनों बाह्य प्रयोग के योग हैं।
संस्कार-द्रव्य के रूप में अर्क क्षीर
शास्त्रीय रसशास्त्र में यह क्षीर निर्माण के समय धातु-द्रव्यों के मर्दन एवं शोधन हेतु प्रयुक्त होता है — यह एक भैषज्य-निर्माण चरण है, चिकित्सीय घटक नहीं।
दाहक के रूप में अर्क क्षीर
अपने लेखन (खुरचने वाले) कर्म के कारण मस्सों तथा हठी वृद्धियों पर अत्यल्प मात्रा में लगाया जाता है। केवल व्रण-स्थान पर, आसपास की त्वचा पर कदापि नहीं।
मात्रा — कितना लें
इन योगों में आन्तरिक प्रयोग वर्जित। बाह्य रूप से केवल व्रण-स्थान पर, चिकित्सक द्वारा, अत्यल्प मात्रा में।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
Aak Ka Milk का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में Aak Ka Milk के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग — अर्क).
भावप्रकाश निघण्टु में Aak Ka Milk के विषय में क्या कहा गया है?
दोनों अर्क जातियों तथा उनके समान दाहक क्षीर का वर्णन। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — अर्क.
आयुर्वेद में Aak Ka Milk किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
शास्त्रीय निर्माण में धातु-कल्पों हेतु भावना एवं शोधन द्रव्य के रूप में, तथा बाह्य रूप से शलाका पर अत्यल्प मात्रा में मस्सों, गोखरू एवं हठी त्वचा-वृद्धियों पर प्रयुक्त। इस संग्रह में यह करञ्ज तैल तथा कासीसादि तैल में सम्मिलित है — दोनों बाह्य प्रयोग के योग हैं।
Aak Ka Milk के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.
Aak Ka Milk को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। Aak Ka Milk का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
Aak Ka Milk का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: क्षीर.
Aak Ka Milk की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
इन योगों में आन्तरिक प्रयोग वर्जित। बाह्य रूप से केवल व्रण-स्थान पर, चिकित्सक द्वारा, अत्यल्प मात्रा में। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
Aak Ka Milk का प्रयोग कब वर्जित है?
केवल चिकित्सकीय परामर्श पर — अनुसूची E1। यह क्षीर उग्र क्षोभक है जो त्वचा पर फफोले लाता है और सम्पर्क में आने पर नेत्र को गम्भीर, सम्भवतः स्थायी क्षति पहुँचाता है; तत्काल प्रक्षालन कर चिकित्सकीय सहायता लें। निगल लेने पर वमन, अवसाद तथा हृदय-प्रभाव होते हैं और यह प्राणघातक सिद्ध हुआ है। बालकों की पहुँच से दूर रखें। बिना सुरक्षा-साधन के कभी न छुएँ, तथा कभी स्वयं न लगाएँ।
Aak Ka Milk कहाँ पाया जाता है?
भारत भर में शुष्क बंजर भूमि, बालू-टीलों तथा मार्ग-किनारों पर सामान्य; प्रायः Calotropis procera के साथ ही उगता है और अपने बड़े बैंगनी पुष्पों से पहचाना जाता है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- रस तरङ्गिणी — उपविष प्रकरण
अर्क क्षीर उपविषों में उल्लिखित; किसी भी प्रयोग से पूर्व निर्दिष्ट शोधन आवश्यक। - भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — अर्क
दोनों अर्क जातियों तथा उनके समान दाहक क्षीर का वर्णन।
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
केवल चिकित्सकीय परामर्श पर — अनुसूची E1। यह क्षीर उग्र क्षोभक है जो त्वचा पर फफोले लाता है और सम्पर्क में आने पर नेत्र को गम्भीर, सम्भवतः स्थायी क्षति पहुँचाता है; तत्काल प्रक्षालन कर चिकित्सकीय सहायता लें। निगल लेने पर वमन, अवसाद तथा हृदय-प्रभाव होते हैं और यह प्राणघातक सिद्ध हुआ है। बालकों की पहुँच से दूर रखें। बिना सुरक्षा-साधन के कभी न छुएँ, तथा कभी स्वयं न लगाएँ।
प्राप्ति स्थान
भारत भर में शुष्क बंजर भूमि, बालू-टीलों तथा मार्ग-किनारों पर सामान्य; प्रायः Calotropis procera के साथ ही उगता है और अपने बड़े बैंगनी पुष्पों से पहचाना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
औषधि में विष का प्रयोग होता ही क्यों है?
शास्त्रीय रसशास्त्र अनेक उपविषों का प्रयोग शोधन के पश्चात् करता है — शोधन वे निर्दिष्ट संस्कार-विधियाँ हैं जो द्रव्य के गुणों को बदल देती हैं। सिद्ध योग में प्रयुक्त शोधित द्रव्य वह कच्चा क्षीर रह ही नहीं जाता।
क्या मैं स्वयं इसे मस्से पर लगा सकता हूँ?
नहीं। यह दाहक है जो व्रण की भाँति ही स्वस्थ त्वचा को भी क्षति पहुँचाता है, और नेत्र-सम्पर्क में अन्धता ला सकता है। यह चिकित्सक द्वारा ही लगाया जाने वाला द्रव्य है।