चित्र: Ganesh Dhamodkar / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
अरहर अरहर
Cajanus cajan
प्रयोज्य अंग: मूल
| रस | मधुर, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | पित्त और कफ का शमन; वात को बढ़ा सकता है |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Cajanus cajan
- प्रयोज्य अंग: मूल
- दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन; वात को बढ़ा सकता है
- सामान्य मात्रा: मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार।
अरहर के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
अरहर (Cajanus cajan) तूवर अथवा पिजन-पी है, भारत की प्रमुख दालों में से एक, जो दक्कन तथा मध्य भारत में उगाई जाती है। औषधि के रूप में परिचित दाल नहीं, अपितु मूल प्रयुक्त होता है।
आयुर्वेद मूल को अतिसार तथा दाहयुक्त विकारों में ग्राही एवं शीत द्रव्य के रूप में प्रयुक्त करता है, और पत्र मुख-व्रण तथा शोथ हेतु गृह-प्रयोग है।
वर्गीकरण
कुल फैबेसी (Fabaceae)। मूल औषधीय अंग है; पत्र एवं बीज गृह-परम्परा में प्रयुक्त होते हैं। रस: कषाय, मधुर। गुण: लघु, रूक्ष। वीर्य: शीत। विपाक: कटु। दोषघ्नता: कफ एवं पित्त का शमन।
उपयोग एवं लाभ
अतिसार एवं प्रवाहिका में तथा दाहयुक्त पित्त-अवस्थाओं में दिया जाता है। पत्र मुख-व्रण, शिथिल मसूड़ों तथा स्थानिक शोथ हेतु चबाया अथवा कल्क रूप में लगाया जाता है। इस संग्रह में मूल काङ्कायन वटी में सम्मिलित है।
कोष्ठ हेतु अरहर मूल
कषाय एवं शीत होने से द्रव मल को वहाँ रोकने हेतु प्रयुक्त जहाँ व्याधि का स्वभाव शीत नहीं, उष्ण हो।
मुख हेतु अरहर पत्र
मुख-व्रण एवं शोथयुक्त मसूड़ों हेतु गृह-प्रयोग, जो ताज़ा चबाया अथवा कल्क रूप में लगाया जाता है।
मात्रा — कितना लें
मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। पत्र आवश्यकतानुसार बाह्य प्रयोग में।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
अरहर का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में अरहर के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (धान्य वर्ग — Adhaki).
भावप्रकाश निघण्टु में अरहर के विषय में क्या कहा गया है?
कषाय-मधुर रस, शीत वीर्य; ग्राही। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — धान्य वर्ग — Adhaki.
आयुर्वेद में अरहर किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
अतिसार एवं प्रवाहिका में तथा दाहयुक्त पित्त-अवस्थाओं में दिया जाता है। पत्र मुख-व्रण, शिथिल मसूड़ों तथा स्थानिक शोथ हेतु चबाया अथवा कल्क रूप में लगाया जाता है। इस संग्रह में मूल काङ्कायन वटी में सम्मिलित है।
अरहर के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस मधुर, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन; वात को बढ़ा सकता है.
अरहर को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। अरहर का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: पित्त और कफ का शमन; वात को बढ़ा सकता है.
अरहर का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: मूल.
अरहर की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। पत्र आवश्यकतानुसार बाह्य प्रयोग में। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
अरहर का प्रयोग कब वर्जित है?
सुसह्य — यह वनस्पति मुख्य आहार है और मूल एक मृदु द्रव्य। कषाय होने से अधिक एवं दीर्घ प्रयोग विबन्ध कर सकता है। सामान्य प्रयोग में कोई विशेष निषेध नहीं।
अरहर कहाँ पाया जाता है?
भारत भर में वर्षा-आधारित दलहन फ़सल के रूप में व्यापक कृषि, मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — धान्य वर्ग — Adhaki
कषाय-मधुर रस, शीत वीर्य; ग्राही। - आयुर्वेदिक फार्माकोपिया ऑफ़ इंडिया — Adhaki
Cajanus cajan; पहचान एवं पारम्परिक उपयोग।
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सुसह्य — यह वनस्पति मुख्य आहार है और मूल एक मृदु द्रव्य। कषाय होने से अधिक एवं दीर्घ प्रयोग विबन्ध कर सकता है। सामान्य प्रयोग में कोई विशेष निषेध नहीं।
प्राप्ति स्थान
भारत भर में वर्षा-आधारित दलहन फ़सल के रूप में व्यापक कृषि, मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या दाल औषधीय है?
दाल आहार है। औषधीय अंग मूल है, तथा पत्र बाह्य रूप से प्रयुक्त होता है।
क्या यह आहार एवं औषधि, दोनों रूपों में सुरक्षित है?
हाँ — अरहर मुख्य आहार है और मूल एक मृदु द्रव्य। सामान्य पाक-प्रयोग में कोई चिन्ता नहीं।