चित्र: S.K. Gawali / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
अशोक अशोक
Saraca asoca · Fabaceae
अन्य नाम: Saraca indica, अशोक
प्रयोज्य अंग: त्वक्
अशोक (Saraca asoca) एक छोटा भारतीय वृक्ष है जिसकी त्वक् स्त्री-प्रजनन स्वास्थ्य हेतु आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। नाम का अर्थ है "शोक हरने वाला"। यह अत्यधिक रजःस्राव, कष्टार्तव तथा गर्भाशय-विकारों में प्रयुक्त होता है और शास्त्रीय योग अशोकारिष्ट का प्रधान द्रव्य है।
| रस | कषाय, तिक्त |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और पित्त का शमन |
| प्रभाव | गर्भाशय बल्य (Garbhashaya-balya) |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Saraca asoca
- प्रयोज्य अंग: त्वक्
- दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
- सामान्य मात्रा: त्वक् चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; अशोकारिष्ट प्रचलित योग है।
अशोक के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
अशोक (Saraca asoca) — "शोक हरने वाला" — गर्भाशय तथा स्त्री-स्वास्थ्य हेतु आयुर्वेद का सर्वप्रमुख द्रव्य है। इसकी त्वक् स्त्री-प्रजनन संस्थान को शीतलता एवं बल देती है और शास्त्रीय अशोकारिष्ट का आधार है।
वर्गीकरण
फैबेसी (Fabaceae) कुल का यह द्रव्य गर्भाशय-बल्य तथा रक्तस्तम्भक द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कषाय-तिक्त रस एवं शीत वीर्य पित्त का शमन करते हैं और आर्तववह स्रोतस् को बल देते हैं।
उपयोग एवं लाभ
अशोक गर्भाशय हेतु आयुर्वेद का प्रधान द्रव्य है, जिसे शास्त्रों में स्त्रीरोगहर कहा गया है। यह अत्यधिक अथवा कष्टयुक्त रजःस्राव में, असृग्दर (रक्तप्रदर) में तथा गर्भाशय-दौर्बल्य के सामान्य प्रबन्धन में प्रयुक्त होता है। त्वक् क्वाथ रूप में बनाई जाती है अथवा अशोकारिष्ट के रूप में ली जाती है, जो इसका सर्वाधिक प्रचलित रूप है।
अत्यधिक रजःस्राव में अशोक
इसका सर्वाधिक प्रमाणित प्रयोग। अत्यन्त कषाय होने से यह असृग्दर — अत्यधिक रजःस्राव — का शास्त्रोक्त द्रव्य है, और अशोकारिष्ट के अस्तित्व का कारण भी।
कष्टार्तव में अशोक
मरोड़युक्त शूल हेतु कष्टार्तव में प्रयुक्त, प्रायः अकेले नहीं अपितु किसी योग के भीतर। यह वेदनाहर की भाँति नहीं, अपितु गर्भाशय-पेशी को शान्त कर कार्य करता है।
अनियमित ऋतुचक्र में अशोक
जहाँ रजोदर्शन अनिश्चित हो, वहाँ कई चक्रों तक लेकर काल को नियमित किया जाता है। यह प्रजनन-धातु का बल्य है, अतः धीरे कार्य करता है।
श्वेतप्रदर में अशोक
इसकी कषायता श्वेत योनि-स्राव को रोकती है — यह शास्त्रोक्त संकेत समस्त निघण्टुओं में मिलता है।
गर्भाशय-बल्य के रूप में अशोक
शास्त्रों ने इसे विशेष रूप से गर्भाशय पर कार्य करने वाला बताया है, इसीलिए यह लगभग प्रत्येक पारम्परिक स्त्री-योग में सम्मिलित रहता है।
प्रसव के पश्चात् अशोक
प्रसवोत्तर काल में गर्भाशय को पुनः बल देने तथा दीर्घ रक्तस्राव घटाने हेतु प्रयुक्त।
रक्तार्श में अशोक
वही रक्तस्तम्भक कर्म अर्श तथा अन्य रक्तपित्त अवस्थाओं पर लागू किया जाता है।
त्वचा-विकारों में अशोक
शोथयुक्त त्वचा-विकारों में इस शास्त्रीय सिद्धान्त पर बाह्य तथा आन्तरिक, दोनों रूपों में प्रयुक्त कि रक्त को शीतल करने से त्वचा निर्मल होती है।
अशोकारिष्ट में अशोक
आयुर्वेदीय भैषज्य-संग्रह के सर्वाधिक ज्ञात स्त्री-बल्य का प्रधान द्रव्य, जो भोजनोपरान्त सन्धान-द्रव के रूप में लिया जाता है।
श्रोणि-असुविधा में अशोक
रजोविकारों से जुड़ी श्रोणि की खिंचाव अथवा भारीपन की अनुभूति में प्रयुक्त, यहाँ भी किसी योग के अंग के रूप में।
मात्रा — कितना लें
त्वक् चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; अशोकारिष्ट प्रचलित योग है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
अशोक का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में अशोक के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग).
भावप्रकाश निघण्टु में अशोक के विषय में क्या कहा गया है?
गर्भाशय हेतु हितकर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग.
आयुर्वेद में अशोक किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
अशोक गर्भाशय हेतु आयुर्वेद का प्रधान द्रव्य है, जिसे शास्त्रों में स्त्रीरोगहर कहा गया है। यह अत्यधिक अथवा कष्टयुक्त रजःस्राव में, असृग्दर (रक्तप्रदर) में तथा गर्भाशय-दौर्बल्य के सामान्य प्रबन्धन में प्रयुक्त होता है। त्वक् क्वाथ रूप में बनाई जाती है अथवा अशोकारिष्ट के रूप में ली जाती है, जो इसका सर्वाधिक प्रचलित रूप है।
अशोक के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कषाय, तिक्त, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: गर्भाशय बल्य (Garbhashaya-balya).
अशोक को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। अशोक का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.
अशोक का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: त्वक्.
अशोक की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
त्वक् चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; अशोकारिष्ट प्रचलित योग है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
अशोक का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; प्रजनन-सम्बन्धी अवस्थाओं में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
अशोक कहाँ पाया जाता है?
अशोक भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी सदाबहार वृक्ष है, जो पश्चिमी घाट, हिमालय की तलहटी तथा मध्य भारत के आर्द्र, छायादार वनों में मिलता है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग
गर्भाशय हेतु हितकर के रूप में वर्णित। - शास्त्रीय स्त्रीरोग ग्रन्थ — Ashokarishta
शास्त्रीय स्त्री-बल्य का आधार।
Modern research
-
Activity based evaluation of Saraca asoca (Roxb.) de Wilde flowers as estrogenic agents using ovariectomized rat model
(see source). Journal of Ethnopharmacology (2016)
A study evaluating the estrogenic activity of Saraca asoca (Ashoka) flowers in an ovariectomized rat model, supporting its traditional use in uterine and menstrual disorders.
View study -
Saraca indica Bark Extract Shows In Vitro Antioxidant, Antibreast Cancer Activity and Does Not Exhibit Toxicological Effects
(see source). Oxidative Medicine and Cellular Longevity (2015)
A study reporting Saraca asoca (Ashoka) bark extract has antioxidant and anti-breast-cancer activity without toxicological effects, relevant to its traditional use in women's health.
View study doi:10.1155/2015/205360
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; प्रजनन-सम्बन्धी अवस्थाओं में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
अशोक भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी सदाबहार वृक्ष है, जो पश्चिमी घाट, हिमालय की तलहटी तथा मध्य भारत के आर्द्र, छायादार वनों में मिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आयुर्वेद में अशोक किसमें प्रयुक्त होता है?
अशोक त्वक् लगभग पूर्णतः स्त्री-प्रजनन स्वास्थ्य में प्रयुक्त होती है: अत्यधिक रजःस्राव, कष्टयुक्त एवं अनियमित रजोदर्शन, श्वेतप्रदर, तथा प्रसव के पश्चात् गर्भाशय-बल्य के रूप में। यह शास्त्रीय स्त्री-योग अशोकारिष्ट का प्रधान द्रव्य है।
अशोक से ऋतुचक्र नियमित होने में कितना समय लगता है?
शास्त्रीय परम्परा प्रभाव आँकने से पूर्व दो से तीन रजोचक्रों की अपेक्षा रखती है। यह तत्काल सुधारक के रूप में नहीं, अपितु प्रजनन-धातु के बल्य के रूप में कार्य करता है, अतः इसे केवल रजोदर्शन के आसपास नहीं, निरन्तर लिया जाता है।
अशोक की मात्रा क्या है?
त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। अशोकारिष्ट के रूप में प्रायः 15–30 मिली समान मात्रा जल के साथ, भोजनोपरान्त, दिन में दो बार, अथवा चिकित्सक के निर्देशानुसार।
क्या गर्भावस्था में अशोक लिया जा सकता है?
चिकित्सकीय निगरानी के बिना नहीं। अशोक गर्भाशय पर कार्य करता है, और ठीक इसीलिए गर्भावस्था में सावधानी अपेक्षित है। इसका प्रसवोत्तर प्रयोग एक पृथक् संकेत है और उससे यह सिद्ध नहीं होता कि यह गर्भावस्था में सुरक्षित है।
क्या अशोक PCOS में सहायक है?
चक्र-नियमन पर प्रभाव के कारण इसे प्रायः PCOS के योगों में सम्मिलित किया जाता है, किन्तु यह इस अवस्था के चयापचय-पक्ष को सम्बोधित नहीं करता। PCOS को एक द्रव्य नहीं, अपितु व्यापक दृष्टिकोण तथा उचित निदान चाहिए।
क्या अशोक के दुष्प्रभाव हैं?
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। कषाय होने से दीर्घ एवं अधिक प्रयोग विबन्ध कर सकता है। दीर्घकालीन अत्यधिक रक्तस्राव में गर्भाशय-अर्बुद अथवा अन्य कारणों को निरस्त करने हेतु चिकित्सकीय जाँच सदैव आवश्यक है — उसकी अनिश्चितकालीन स्वयं-चिकित्सा न करें।
क्या अशोक वृक्ष संकटग्रस्त है?
Saraca asoca त्वक्-संग्रह के कारण वास्तविक दबाव में है और भारत में संवेदनशील (vulnerable) श्रेणी में सूचीबद्ध है। कृषित अथवा सतत रूप से संचित स्रोतों के उत्पाद ही लें, और ध्यान रखें कि Polyalthia longifolia की त्वक् से अपमिश्रण सामान्य है।