चित्र: H. Zell / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
भिलावा भिलावा
Semecarpus anacardium
प्रयोज्य अंग: फल
| रस | तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent) |
|---|---|
| गुण | लघु (Light), रूक्ष (Dry) |
| वीर्य | उष्ण (Hot) |
| विपाक | कटु (Pungent) |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | Classical systemic action |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Semecarpus anacardium
- प्रयोज्य अंग: फल
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: केवल चिकित्सक के निर्देशानुसार।
भिलावा के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
भिलावा (Semecarpus anacardium) मार्किंग नट है, जिसे यह नाम इसलिए मिला कि इसका दाहक काला रस धोबीघरों में वस्त्र चिह्नित करने हेतु प्रयुक्त होता था। फल ही औषधि है।
आयुर्वेद इसे उपविषों में गिनता है और शोधन के पश्चात् एक प्रबल रसायन तथा वात-द्रव्य के रूप में प्रयुक्त करता है। अशोधित अवस्था में इसकी राल सम्पर्क में आते ही तीव्र फफोले उत्पन्न करती है।
वर्गीकरण
कुल एनाकार्डिएसी (Anacardiaceae)। फल औषधीय है, केवल शोधन के पश्चात्। रस: कटु, तिक्त, कषाय। गुण: लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण। वीर्य: उष्ण। विपाक: मधुर। दोषघ्नता: कफ एवं वात का शमन; पित्त की प्रबल वृद्धि।
उपयोग एवं लाभ
आमवात तथा शूल एवं जकड़न सहित जीर्ण वात-व्याधियों में, जीर्ण त्वचा-रोग में, तथा निगरानी के अन्तर्गत ली जाने वाली शास्त्रीय तैयारियों में रसायन के रूप में प्रयुक्त। इस संग्रह में यह प्रसारिणी तैल में सम्मिलित है।
आमवात में भल्लातक
इसकी भेदक उष्णता जकड़न सहित आमवातिक शूल में वहाँ प्रयुक्त होती है जहाँ शीत, गुरु वात-कफज अवस्थाओं ने मृदु द्रव्यों पर प्रतिक्रिया न दी हो।
रसायन के रूप में भल्लातक
शास्त्रों में इसका रसायन प्रयोग वर्णित है — सदैव शोधित रूप में और निकट निगरानी के अन्तर्गत, इसकी उष्णता एवं क्षोभकता के कारण।
मात्रा — कितना लें
केवल चिकित्सक के निर्देशानुसार। शोधित फल 125–250 मिग्रा मात्रा में किसी योग के भीतर, प्रायः दूध या घृत के साथ, जिससे उसकी तीक्ष्णता मृदु हो।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
भिलावा का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में भिलावा के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (चिकित्सास्थान 1 — रसायन).
चरक संहिता में भिलावा के विषय में क्या कहा गया है?
भल्लातक रसायन का वर्णन, कठोर प्रक्रियागत सावधानियों सहित। सन्दर्भ: चरक संहिता — चिकित्सास्थान 1 — रसायन.
आयुर्वेद में भिलावा किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
आमवात तथा शूल एवं जकड़न सहित जीर्ण वात-व्याधियों में, जीर्ण त्वचा-रोग में, तथा निगरानी के अन्तर्गत ली जाने वाली शास्त्रीय तैयारियों में रसायन के रूप में प्रयुक्त। इस संग्रह में यह प्रसारिणी तैल में सम्मिलित है।
भिलावा के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.
भिलावा को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। भिलावा का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
भिलावा का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: फल.
भिलावा की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
केवल चिकित्सक के निर्देशानुसार। शोधित फल 125–250 मिग्रा मात्रा में किसी योग के भीतर, प्रायः दूध या घृत के साथ, जिससे उसकी तीक्ष्णता मृदु हो। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
भिलावा का प्रयोग कब वर्जित है?
केवल चिकित्सकीय परामर्श पर — अनुसूची E1। अशोधित फल-कवच की राल तीव्र स्फोटकारी है जो कष्टप्रद रासायनिक दाह उत्पन्न करती है और संवेदनशील व्यक्तियों में सर्वांगीण प्रतिक्रिया कर सकती है। शोधित होने पर भी यह पित्त की प्रबल वृद्धि करता है और दाह, मुख-व्रण तथा त्वचा-पिटिका उत्पन्न कर सकता है। गर्भावस्था, स्तनपान, बालकों में तथा पित्त-प्रधान या शोथयुक्त अवस्था वाले किसी भी व्यक्ति में वर्जित। कच्चे द्रव्य को केवल दस्तानों सहित ही छुएँ।
भिलावा कहाँ पाया जाता है?
भारत भर के शुष्क वनों का पर्णपाती वृक्ष, जो उप-हिमालयी क्षेत्र, मध्य भारत तथा पश्चिमी घाट में सामान्य है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- रस तरङ्गिणी — उपविष प्रकरण — Bhallataka
उपविषों में वर्गीकृत; ईंट-चूर्ण अथवा नारियल जल में शोधन निर्दिष्ट। - चरक संहिता — चिकित्सास्थान 1 — रसायन
भल्लातक रसायन का वर्णन, कठोर प्रक्रियागत सावधानियों सहित।
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
केवल चिकित्सकीय परामर्श पर — अनुसूची E1। अशोधित फल-कवच की राल तीव्र स्फोटकारी है जो कष्टप्रद रासायनिक दाह उत्पन्न करती है और संवेदनशील व्यक्तियों में सर्वांगीण प्रतिक्रिया कर सकती है। शोधित होने पर भी यह पित्त की प्रबल वृद्धि करता है और दाह, मुख-व्रण तथा त्वचा-पिटिका उत्पन्न कर सकता है। गर्भावस्था, स्तनपान, बालकों में तथा पित्त-प्रधान या शोथयुक्त अवस्था वाले किसी भी व्यक्ति में वर्जित। कच्चे द्रव्य को केवल दस्तानों सहित ही छुएँ।
प्राप्ति स्थान
भारत भर के शुष्क वनों का पर्णपाती वृक्ष, जो उप-हिमालयी क्षेत्र, मध्य भारत तथा पश्चिमी घाट में सामान्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भिलावा त्वचा को क्यों जलाता है?
फल-कवच में एक फ़ीनॉलिक राल होती है जो पॉइज़न आइवी के क्षोभक से निकट सम्बन्ध रखती है। अशोधित द्रव्य के सम्पर्क से कष्टप्रद फफोले उत्पन्न होते हैं।
क्या इसे घर पर रसायन के रूप में लिया जा सकता है?
नहीं। शास्त्रोक्त रसायन प्रयोग हेतु शोधित द्रव्य, सटीक मात्रा एवं निगरानी आवश्यक है, क्योंकि लाभ और हानि के बीच का अन्तर अत्यन्त सूक्ष्म है।