चित्र: Don A.W. Carlson / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
विलायती बबूल / अरिमेद इरिमेद
Vachellia farnesiana · Fabaceae
अन्य नाम: Acacia farnesiana, विलायती बबूल, गन्धबबूल
प्रयोज्य अंग: त्वक्
इरिमेद (Vachellia farnesiana) गन्धबबूल है, जिसकी त्वक् मुख एवं मसूड़ों हेतु आयुर्वेद का प्रधान द्रव्य है। यह निघण्टुओं का शास्त्रीय इरिमेद है और इरिमेदादि तैल का प्रधान घटक, जो रक्तस्रावी मसूड़ों, शिथिल दाँतों, मुख-व्रणों तथा गण्डूष में प्रयुक्त होता है।
| रस | कषाय, तिक्त |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और पित्त का शमन |
| प्रभाव | Mukharoga (oral health) |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Vachellia farnesiana
- प्रयोज्य अंग: त्वक्
- दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
- सामान्य मात्रा: गण्डूष हेतु त्वक् क्वाथ, अथवा गण्डूष एवं दन्तमूल-अभ्यंग हेतु इरिमेदादि तैल।
विलायती बबूल / अरिमेद के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
इरिमेद (Vachellia farnesiana) एक बबूल है जो मुख एवं दन्त-स्वास्थ्य हेतु मान्य है। इसकी कषाय त्वक् मसूड़ों को दृढ़ करती है, दाँतों को बल देती है और मुख-संक्रमण दूर करती है — यह इरिमेदादि तैल का प्रधान द्रव्य है।
वर्गीकरण
फैबेसी (Fabaceae) कुल का इरिमेद मुखरोग तथा कषाय द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कषाय-तिक्त रस एवं शीत वीर्य मसूड़ों को दृढ़ करते हैं और कफ-पित्त का हरण करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
इरिमेद एक दन्त-द्रव्य है। इसकी त्वक् मसूड़ों के रोग, शिथिल दाँतों, मुख-व्रणों तथा मुख-संक्रमण में प्रयुक्त होती है — गण्डूष हेतु क्वाथ के रूप में तथा इरिमेदादि तैल के आधार के रूप में, जो गण्डूष एवं दन्तमूल-अभ्यंग का शास्त्रीय तैल है।
रक्तस्रावी मसूड़ों हेतु इरिमेद
इसका प्रमुखतम प्रयोग। अत्यन्त कषाय होने से यह शिथिल मसूड़ों को कसता है और रक्तस्राव रोकता है — इरिमेदादि तैल का सम्पूर्ण प्रयोजन यही है।
शिथिल दाँतों हेतु इरिमेद
शास्त्रीय दन्तरोग में वहाँ प्रयुक्त जहाँ मसूड़े हट गए हों और दाँत हिलने लगे हों; दन्तमूल-अभ्यंग द्वारा लगाया जाता है।
मुख-व्रण हेतु इरिमेद
मुखपाक तथा पुनरावर्ती व्रणों में त्वक् का क्वाथ गण्डूष के रूप में प्रयुक्त।
गण्डूष हेतु इरिमेद
इरिमेदादि तैल शास्त्रोक्त गण्डूष तैल है, जिसे प्रतिदिन कुछ मिनट मुख में रखा जाता है।
मुखदुर्गन्ध हेतु इरिमेद
वहाँ गण्डूष के रूप में प्रयुक्त जहाँ दुर्गन्ध पाचन से नहीं, अपितु मसूड़ों के रोग से उत्पन्न हो।
व्रण हेतु इरिमेद
त्वक् का क्वाथ देर से भरने वाले व्रणों एवं क्षतों के प्रक्षालन हेतु लगाया जाता है।
अतिसार हेतु इरिमेद
द्रव मल में अपनी कषायता हेतु आन्तरिक रूप से लिया जाता है — यह गौण शास्त्रीय संकेत है।
त्वचा-रोग हेतु इरिमेद
कण्डू तथा जीर्ण त्वचा-विकारों में बाह्य रूप से लगाया जाता है।
श्वेतप्रदर हेतु इरिमेद
उसी कषाय सिद्धान्त पर योनि-प्रक्षालन के रूप में अथवा आन्तरिक रूप से प्रयुक्त।
इरिमेदादि तैल में इरिमेद
शास्त्रीय मुख-स्वास्थ्य तैल का प्रधान द्रव्य, जो आज भी मसूड़ों के रोग हेतु मानक आयुर्वेदीय योग है।
मात्रा — कितना लें
गण्डूष हेतु त्वक् क्वाथ, अथवा गण्डूष एवं दन्तमूल-अभ्यंग हेतु इरिमेदादि तैल। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
विलायती बबूल / अरिमेद का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में विलायती बबूल / अरिमेद के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग); भैषज्य रत्नावली (Irimedadi Taila).
भावप्रकाश निघण्टु में विलायती बबूल / अरिमेद के विषय में क्या कहा गया है?
मुखरोग हेतु हितकर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग.
भैषज्य रत्नावली में विलायती बबूल / अरिमेद के विषय में क्या कहा गया है?
शास्त्रीय मुख-स्वास्थ्य तैल का प्रधान द्रव्य। सन्दर्भ: भैषज्य रत्नावली — Irimedadi Taila.
आयुर्वेद में विलायती बबूल / अरिमेद किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
इरिमेद एक दन्त-द्रव्य है। इसकी त्वक् मसूड़ों के रोग, शिथिल दाँतों, मुख-व्रणों तथा मुख-संक्रमण में प्रयुक्त होती है — गण्डूष हेतु क्वाथ के रूप में तथा इरिमेदादि तैल के आधार के रूप में, जो गण्डूष एवं दन्तमूल-अभ्यंग का शास्त्रीय तैल है।
विलायती बबूल / अरिमेद के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कषाय, तिक्त, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: Mukharoga (oral health).
विलायती बबूल / अरिमेद को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। विलायती बबूल / अरिमेद का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.
विलायती बबूल / अरिमेद का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: त्वक्.
विलायती बबूल / अरिमेद की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
गण्डूष हेतु त्वक् क्वाथ, अथवा गण्डूष एवं दन्तमूल-अभ्यंग हेतु इरिमेदादि तैल। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
विलायती बबूल / अरिमेद का प्रयोग कब वर्जित है?
सामान्यतः सुरक्षित; मुख्यतः मुख-स्वास्थ्य के योगों में प्रयुक्त।
विलायती बबूल / अरिमेद कहाँ पाया जाता है?
इरिमेद भारत भर के शुष्क प्रदेशों का कण्टकयुक्त क्षुप अथवा छोटा वृक्ष है, जो पुष्पित होने पर सुगन्धित रहता है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग
मुखरोग हेतु हितकर के रूप में वर्णित। - भैषज्य रत्नावली — Irimedadi Taila
शास्त्रीय मुख-स्वास्थ्य तैल का प्रधान द्रव्य।
Modern research
-
Bioactive Compounds, Pharmacological Actions, and Pharmacokinetics of Genus Acacia
(see source). Molecules (2022)
A review of the genus Acacia (including Vachellia farnesiana / Irimeda) documenting antimicrobial, anti-inflammatory and antioxidant actions relevant to its oral and dental use.
View study doi:10.3390/molecules27217340
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सामान्यतः सुरक्षित; मुख्यतः मुख-स्वास्थ्य के योगों में प्रयुक्त।
प्राप्ति स्थान
इरिमेद भारत भर के शुष्क प्रदेशों का कण्टकयुक्त क्षुप अथवा छोटा वृक्ष है, जो पुष्पित होने पर सुगन्धित रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इरिमेद किसमें प्रयुक्त होता है?
इरिमेद त्वक् लगभग पूर्णतः मुख हेतु प्रयुक्त होती है: रक्तस्रावी एवं शिथिल मसूड़े, हिलते दाँत, मुख-व्रण तथा मुखदुर्गन्ध। यह इरिमेदादि तैल का प्रधान द्रव्य है, जो दन्तमूल-अभ्यंग एवं गण्डूष हेतु प्रयुक्त शास्त्रीय तैल है।
इरिमेदादि तैल का प्रयोग कैसे करें?
थोड़ी मात्रा मुख में लेकर पाँच से दस मिनट रखें अथवा घुमाएँ, फिर थूककर कुल्ला करें। अथवा अँगुली के पोर से मसूड़ों में मलें। दिन में एक बार, श्रेष्ठतः प्रातः भोजन से पूर्व।
क्या गण्डूष वस्तुतः मसूड़ों के रोग में सहायक है?
नियमित रूप से करने पर यह प्लाक तथा मसूड़ा-शोथ घटाता है, इसके उचित प्रमाण हैं, और यह सुदीर्घ शास्त्रीय परम्परा है। यह दन्त-मार्जन एवं दन्त-चिकित्सा का पूरक है, प्रतिस्थापन नहीं — स्थापित मसूड़ा-रोग को दन्त-चिकित्सक चाहिए।
इरिमेद की मात्रा क्या है?
बाह्य रूप से तैल अथवा गण्डूष के रूप में कठोर मात्रा-सीमा के बिना। आन्तरिक रूप से त्वक् क्वाथ 40–80 मिली अथवा चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, जहाँ चिकित्सक निर्दिष्ट करे, यद्यपि आन्तरिक प्रयोग असामान्य है।
इस स्थल पर इरिमेद के दो पृष्ठ क्यों हैं?
इस नाम से दो जातियाँ व्यापार में आती हैं। Vachellia farnesiana सामान्य शास्त्रीय पहचान है और यही यह पृष्ठ है। Acacia leucophloea हमारे एक निर्माण-पत्रक में निर्दिष्ट है और उसका अपना पृष्ठ है। हम दो जातियों को मिलाने के स्थान पर पृथक् रखते हैं।
इरिमेद को हिन्दी में क्या कहते हैं?
विलायती बबूल अथवा गन्धबबूल। अंग्रेज़ी में इसे स्वीट अकेशिया, नीडल बुश अथवा कैसी फ़्लावर कहते हैं — इसके पुष्प सुगन्ध-निर्माण में प्रयुक्त होते हैं।
क्या इसके दुष्प्रभाव हैं?
सुसह्य। कषाय होने से दीर्घ आन्तरिक प्रयोग विबन्ध कर सकता है। वृक्ष कण्टकयुक्त है और ताज़े द्रव्य को सावधानी से सँभालना चाहिए। गण्डूष के समय तैल की बड़ी मात्रा निगलने से बचें।