चित्र: Yasagan / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
चमेली, जाती जाती
Jasminum grandiflorum · Oleaceae
अन्य नाम: चमेली, जाती
प्रयोज्य अंग: पत्र, पुष्प
जाती (Jasminum grandiflorum) स्पैनिश चमेली है, जिसका पत्र व्रण एवं मुख हेतु आयुर्वेद का शास्त्रीय द्रव्य है। यह जात्यादि तैल का प्रधान द्रव्य है, जो क्षत, दग्ध तथा न भरने वाले व्रणों का मानक योग है, और पत्र मुख-व्रणों एवं शिथिल मसूड़ों हेतु चबाया जाता है।
| रस | तिक्त, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, स्निग्ध, मृदु |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन |
| प्रभाव | Vrana Ropana (wound-healing), oral |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Jasminum grandiflorum
- प्रयोज्य अंग: पत्र, पुष्प
- दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन
- सामान्य मात्रा: पत्र चबाकर अथवा क्वाथ गण्डूष के रूप में; व्रणों पर जात्यादि तैल।
चमेली, जाती के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
जाती (चमेली, Jasminum grandiflorum) एक सुगन्धित, रोपक वनस्पति है जिसके पत्र एवं पुष्प मुख-व्रणों, घावों तथा त्वचा को शान्ति देते हैं। यह जात्यादि तैल का प्रधान द्रव्य है, जो शास्त्रीय व्रणरोपण तैल है।
वर्गीकरण
ओलिएसी (Oleaceae) कुल की जाती व्रणरोपण तथा मुख-स्वास्थ्य द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-कषाय रस एवं मृदु, शान्तिदायक गुण रोपण करते हैं और संक्रमण दूर करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
चमेली-पत्र मुख्यतः मुख तथा त्वचा में प्रयुक्त होता है: मुख-व्रणों एवं शिथिल मसूड़ों हेतु चबाया या लगाया जाता है, और न भरने वाले व्रणों, क्षतों तथा दग्ध पर जात्यादि तैल के रूप में लगाया जाता है। यह सर्वांगीण द्रव्य नहीं, अपितु शीत, व्रण-शोधक द्रव्य है।
न भरने वाले व्रणों हेतु जाती
शास्त्रोक्त व्रण-द्रव्य तथा जात्यादि तैल का प्रधान घटक, जो उन क्षतों पर प्रयुक्त होता है जो भरते नहीं।
मुख-व्रण हेतु जाती
ताज़ा पत्र चबाना मुख-व्रणों तथा शोथयुक्त मसूड़ों का पारम्परिक उपाय है।
दग्ध हेतु जाती
सतह स्वच्छ हो जाने पर जात्यादि तैल दग्ध एवं जलन पर लगाया जाता है, जो रोपण में सहायता करता है और व्रण-चिह्न घटाता है।
मधुमेहजन्य व्रणों हेतु जाती
भारतीय परम्परा में जीर्ण अधोअंग-व्रणों पर उचित व्रण-चिकित्सा के साथ व्यापक रूप से प्रयुक्त।
त्वचा-रोग हेतु जाती
विचर्चिका, दद्रु तथा जीर्ण कण्डू में बाह्य रूप से लगाई जाती है।
रक्तस्रावी मसूड़ों हेतु जाती
शिथिल, रक्तस्रावी मसूड़ों हेतु पत्र-क्वाथ गण्डूष के रूप में प्रयुक्त।
नेत्र-विकारों हेतु जाती
पुष्प एवं पत्र शोथ हेतु शास्त्रीय नेत्र-योगों में प्रयुक्त होते हैं।
शिरःशूल हेतु जाती
पुष्पों का लेप ललाट पर लगाना उष्णताजन्य शिरःशूल का पारम्परिक उपाय है।
सुगन्ध-निर्माण में जाती पुष्प
इस जाति का जैस्मिन एब्सोल्यूट सर्वाधिक मूल्यवान प्राकृतिक सुगन्ध-द्रव्यों में है — यह उसके औषधीय प्रयोग से पृथक् है।
जात्यादि तैल एवं घृत में जाती
आयुर्वेदीय व्रण-प्रबन्धन में प्रयुक्त तैल तथा घृत, दोनों कल्पों का प्रधान द्रव्य।
मात्रा — कितना लें
पत्र चबाकर अथवा क्वाथ गण्डूष के रूप में; व्रणों पर जात्यादि तैल। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
चमेली, जाती का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में चमेली, जाती के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (पुष्पवर्ग); शार्ङ्गधर संहिता (Jatyadi Taila).
भावप्रकाश निघण्टु में चमेली, जाती के विषय में क्या कहा गया है?
व्रणरोपक एवं मुख-हितकर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — पुष्पवर्ग.
शार्ङ्गधर संहिता में चमेली, जाती के विषय में क्या कहा गया है?
शास्त्रीय व्रण-तैल का प्रधान द्रव्य। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Jatyadi Taila.
आयुर्वेद में चमेली, जाती किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
चमेली-पत्र मुख्यतः मुख तथा त्वचा में प्रयुक्त होता है: मुख-व्रणों एवं शिथिल मसूड़ों हेतु चबाया या लगाया जाता है, और न भरने वाले व्रणों, क्षतों तथा दग्ध पर जात्यादि तैल के रूप में लगाया जाता है। यह सर्वांगीण द्रव्य नहीं, अपितु शीत, व्रण-शोधक द्रव्य है।
चमेली, जाती के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, स्निग्ध, मृदु, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन. प्रभाव: Vrana Ropana (wound-healing), oral.
चमेली, जाती को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। चमेली, जाती का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन.
चमेली, जाती का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: पत्र, पुष्प.
चमेली, जाती की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
पत्र चबाकर अथवा क्वाथ गण्डूष के रूप में; व्रणों पर जात्यादि तैल। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
चमेली, जाती का प्रयोग कब वर्जित है?
सामान्यतः सुरक्षित; मुख्यतः व्रण एवं मुख-योगों में प्रयुक्त।
चमेली, जाती कहाँ पाया जाता है?
चमेली भारत भर में अपने सुगन्धित श्वेत पुष्पों हेतु उगाई जाने वाली आरोही क्षुप है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — पुष्पवर्ग
व्रणरोपक एवं मुख-हितकर के रूप में वर्णित। - शार्ङ्गधर संहिता — Jatyadi Taila
शास्त्रीय व्रण-तैल का प्रधान द्रव्य।
Modern research
-
Effects of ethanolic extract of Jasminum grandiflorum Linn. flowers on wound healing in diabetic Wistar albino rats
(see source). Journal of Ayurveda and Integrative Medicine (2017)
A study reporting Jasminum grandiflorum (Jati / jasmine) flower extract promoted wound healing in diabetic rats.
View study
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सामान्यतः सुरक्षित; मुख्यतः व्रण एवं मुख-योगों में प्रयुक्त।
प्राप्ति स्थान
चमेली भारत भर में अपने सुगन्धित श्वेत पुष्पों हेतु उगाई जाने वाली आरोही क्षुप है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जात्यादि तैल किसमें प्रयुक्त होता है?
यह शास्त्रीय आयुर्वेदीय व्रण-तैल है, जो न भरने वाले क्षतों, दग्ध, कटने, मधुमेहजन्य पाद-व्रणों तथा जीर्ण त्वचा-क्षतों पर लगाया जाता है। जाती-पत्र इसका प्रधान घटक है, साथ में निम्ब, हरिद्रा तथा अन्य व्रणरोपक द्रव्य।
व्रण पर जात्यादि तैल कैसे लगाएँ?
पहले व्रण स्वच्छ करें, फिर तैल की पतली परत लगाएँ — सीधे अथवा निर्जीवाणु पट्टी पर — दिन में एक या दो बार। यह रोपण में सहायता करता है किन्तु उचित व्रण-चिकित्सा का स्थान नहीं लेता — संक्रमित अथवा गहरे व्रणों को चिकित्सकीय देखभाल चाहिए।
क्या जाती और चमेली एक ही हैं?
पूर्णतः नहीं। जाती Jasminum grandiflorum है, वही जाति जो शास्त्रीय जात्यादि योगों में नामित है। चमेली प्रायः Jasminum officinale के लिए प्रयुक्त होती है, जो निकट सजातीय है और समान रूप से प्रयुक्त होती है। हम दो जातियों को मिलाने के स्थान पर पृथक् पृष्ठ रखते हैं।
क्या मुख-व्रणों हेतु चमेली के पत्ते चबाए जा सकते हैं?
दो-तीन ताज़े जाती-पत्र चबाना मुख-व्रणों तथा शिथिल मसूड़ों का पारम्परिक उपाय है। पत्ते तिक्त होते हैं। क्वाथ का गण्डूष मृदुतर विकल्प है।
जाती की मात्रा क्या है?
मुख्यतः बाह्य रूप से, तैल अथवा गण्डूष के रूप में, कठोर मात्रा-सीमा के बिना। आन्तरिक रूप से पत्र-क्वाथ 20–40 मिली जहाँ चिकित्सक निर्दिष्ट करे — आन्तरिक प्रयोग असामान्य है।
क्या जाती के दुष्प्रभाव हैं?
बाह्य प्रयोग में सुसह्य। कभी-कभी सम्पर्क-संवेदनशीलता होती है, अतः व्यापक प्रयोग से पूर्व पैच परीक्षण करें। गर्भावस्था में आन्तरिक प्रयोग से पूर्व चिकित्सक से परामर्श लें।
जाती को हिन्दी में क्या कहते हैं?
चमेली अथवा जूही, यद्यपि दोनों नाम कई चमेली जातियों के लिए ढीले रूप में प्रयुक्त होते हैं। अंग्रेज़ी में इसे स्पैनिश जैस्मिन, रॉयल जैस्मिन अथवा कैटालोनियन जैस्मिन कहते हैं।