केसर (Crocus sativus) — stigma
केसर — Crocus sativus. प्रयोज्य अंग: वर्तिकाग्र.
चित्र: Emilie40 / Wikimedia Commons, CC0
आयुर्वेदीय द्रव्य

केसर कुङ्कुम

Crocus sativus · Iridaceae

अन्य नाम: केसर, कश्मीरी केसर, सान्द्र केसर सत्त्व, शुद्ध कश्मीरी केसर

प्रयोज्य अंग: वर्तिकाग्र

कुंकुम (Crocus sativus) केसर है, एक क्रोकस पुष्प का शुष्क वर्तिकाग्र तथा विश्व का सर्वाधिक महँगा मसाला। आयुर्वेद इसे वर्ण, स्त्री-स्वास्थ्य, पाचन तथा रसायन के रूप में प्रयुक्त करता है। एक ग्राम बनाने में लगभग 150 पुष्प लगते हैं, इसीलिए इसमें अपमिश्रण इतना सामान्य है।

केसर — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु, तिक्त
गुणलघु, स्निग्ध
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मत्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन
प्रभाववर्ण्य (complexion), रसायन

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Crocus sativus
  • प्रयोज्य अंग: वर्तिकाग्र
  • दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन
  • सामान्य मात्रा: कुछ तन्तु (30–100 मिग्रा) दूध अथवा योगों में; वर्ण एवं बल्य कल्पों (कुमकुमादि) में प्रयुक्त।

केसर के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीकेसर
अंग्रेज़ीSaffron
संस्कृतकुङ्कुम, केसर
बंगालीজাফরান
गुजरातीકેસર
मराठीकेशर
तमिलகுங்குமப்பூ
तेलुगुకుంకుమపువ్వు
कन्नड़ಕೇಸರಿ
लैटिन (वानस्पतिक)Crocus sativus

परिचय

कुंकुम (केसर, Crocus sativus) वह बहुमूल्य स्वर्ण-रक्त वर्तिकाग्र है जो वर्ण, मनोदशा तथा स्त्री-स्वास्थ्य हेतु मान्य है। एक त्रिदोषशामक, उष्ण रसायन — कुछ ही तन्तु असाधारण वर्ण, सुगन्ध एवं शक्ति धारण करते हैं।

वर्गीकरण

इरिडेसी (Iridaceae) कुल का कुंकुम वर्ण्य तथा रसायन द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु-तिक्त रस एवं उष्ण वीर्य तीनों दोषों को सन्तुलित करते हैं और वर्ण को निखारते हैं।

उपयोग एवं लाभ

केसर एक वर्ण्य द्रव्य है जो वर्ण एवं वर्ण-दोष हेतु प्रयुक्त होता है, जो दूध के साथ लिया तथा लेप के रूप में लगाया जाता है। शास्त्र इसे हृद्य भी कहते हैं और मन्द मनोदशा में तथा स्त्री-स्वास्थ्य में कष्टार्तव हेतु देते हैं। यह अत्यल्प मात्रा में प्रयुक्त होता है — कुछ तन्तु ही एक मात्रा हैं।

वर्ण हेतु कुंकुम

इसका सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रयोग — एक वर्ण्य द्रव्य, जो त्वचा-वर्ण एवं कान्ति हेतु दूध के साथ लिया तथा लेप के रूप में लगाया जाता है।

गर्भावस्था में कुंकुम

उत्तर भारत भर में परवर्ती मासों में दूध के साथ परम्परागत रूप से लिया जाता है — यह सुदीर्घ इतिहास वाली सांस्कृतिक परम्परा है।

कष्टार्तव हेतु कुंकुम

कष्टार्तव तथा अनियमित रजोदर्शन में प्रयुक्त; इसका शूलहर स्वभाव मरोड़ को सरल करता है।

मन्द मनोदशा हेतु कुंकुम

विषाद हेतु परम्परागत रूप से प्रयुक्त, और मृदु अवसाद में उचित आधुनिक शोध का विषय।

पाचन हेतु कुंकुम

अरुचि में प्रयुक्त दीपन द्रव्य, जो अत्यल्प मात्रा में लिया जाता है।

वाजीकरण द्रव्य के रूप में कुंकुम

शास्त्रीय प्रजनन-बल्य द्रव्यों में नामित।

कास हेतु कुंकुम

स्वरभेद सहित कास में प्रयुक्त, जो मधु अथवा दूध के साथ लिया जाता है।

शिरःशूल हेतु कुंकुम

शास्त्रीय परम्परा में उष्णताजन्य शिरःशूल हेतु ललाट पर लेप के रूप में लगाया जाता है।

नेत्रों हेतु कुंकुम

चाक्षुष्य कहा गया है और शास्त्रीय नेत्र-कल्पों में प्रयुक्त होता है।

कुमकुमादि तैल में कुंकुम

वर्ण, वर्ण-दोष तथा व्रण-चिह्न हेतु प्रयुक्त शास्त्रीय मुख-तैल का प्रधान द्रव्य।

मात्रा — कितना लें

कुछ तन्तु (30–100 मिग्रा) दूध अथवा योगों में; वर्ण एवं बल्य कल्पों (कुमकुमादि) में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

केसर का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में केसर के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (कर्पूरादि वर्ग).

भावप्रकाश निघण्टु में केसर के विषय में क्या कहा गया है?

वर्ण्य एवं त्रिदोषशामक के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग.

आयुर्वेद में केसर किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

केसर एक वर्ण्य द्रव्य है जो वर्ण एवं वर्ण-दोष हेतु प्रयुक्त होता है, जो दूध के साथ लिया तथा लेप के रूप में लगाया जाता है। शास्त्र इसे हृद्य भी कहते हैं और मन्द मनोदशा में तथा स्त्री-स्वास्थ्य में कष्टार्तव हेतु देते हैं। यह अत्यल्प मात्रा में प्रयुक्त होता है — कुछ तन्तु ही एक मात्रा हैं।

केसर के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, तिक्त, गुण लघु, स्निग्ध, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन. प्रभाव: वर्ण्य (complexion), रसायन.

केसर को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। केसर का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन.

केसर का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: वर्तिकाग्र.

केसर की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

कुछ तन्तु (30–100 मिग्रा) दूध अथवा योगों में; वर्ण एवं बल्य कल्पों (कुमकुमादि) में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

केसर का प्रयोग कब वर्जित है?

अत्यल्प मात्रा (कुछ तन्तु) में प्रयुक्त; बड़ी मात्रा अनावश्यक है और गर्भावस्था में वर्जित रखनी श्रेष्ठ है।

केसर कहाँ पाया जाता है?

केसर Crocus sativus पुष्प के वर्तिकाग्रों से संचित होता है, जो कश्मीर घाटी तथा कुछ अन्य शीतल, शुष्क उच्चभूमियों में उगाया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग
    वर्ण्य एवं त्रिदोषशामक के रूप में वर्णित।
  • शास्त्रीय सौन्दर्य ग्रन्थ — Kumkumadi Taila
    शास्त्रीय सौन्दर्य-तैल का प्रधान द्रव्य।

Modern research

  1. Saffron (Crocus sativus L.) and major depressive disorder: a meta-analysis of randomized clinical trials Hausenblas HA, et al.. Journal of Integrative Medicine (2013)

    A meta-analysis of RCTs finding saffron (Kumkuma) significantly reduced depressive symptoms versus placebo and performed comparably to standard antidepressants.

    View study doi:10.3736/jintegrmed2013056
  2. Crocus sativus L. in the treatment of mild to moderate depression: a double-blind, randomized and placebo-controlled trial (see source). Phytotherapy Research (2005)

    A double-blind placebo-controlled RCT reporting saffron improved mild-to-moderate depression.

    View study doi:10.1002/ptr.1647

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

अत्यल्प मात्रा (कुछ तन्तु) में प्रयुक्त; बड़ी मात्रा अनावश्यक है और गर्भावस्था में वर्जित रखनी श्रेष्ठ है।

प्राप्ति स्थान

केसर Crocus sativus पुष्प के वर्तिकाग्रों से संचित होता है, जो कश्मीर घाटी तथा कुछ अन्य शीतल, शुष्क उच्चभूमियों में उगाया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आयुर्वेद में केसर किसमें प्रयुक्त होता है?

कुंकुम वर्ण एवं त्वचा-वर्ण, कष्टार्तव, मन्द मनोदशा, अरुचि तथा कास में, और रसायन के रूप में प्रयुक्त होता है। यह कुमकुमादि तैल का प्रधान घटक है, जो शास्त्रीय मुख-तैल है।

केसर की मात्रा क्या है?

प्रतिदिन केवल 30 से 125 मिग्रा — कुछ तन्तु, चम्मच भर नहीं। इसे सामान्यतः उष्ण दूध में भिगोया जाता है। एक बार में 5 ग्राम से अधिक मात्रा वस्तुतः विषैली है, अतः यह वह मसाला है जहाँ अल्प मात्रा महत्त्वपूर्ण है।

क्या गर्भावस्था में केसर सुरक्षित है?

दूध में अल्प पाक-मात्रा उत्तर भारत भर में पारम्परिक है और सामान्यतः उचित मानी जाती है। बड़ी औषधीय मात्रा नहीं — मात्रा में केसर गर्भाशय को उत्तेजित करता है। परम्परा का आँख मूँदकर पालन करने के स्थान पर अपने चिकित्सक से पूछें।

असली केसर की पहचान कैसे करें?

असली केसर शीतल जल में धीरे-धीरे रंग छोड़ता है और तन्तु लाल बने रहते हैं; रँगा द्रव्य तत्काल रंग छोड़ता है और श्वेत हो जाता है। असली तन्तु एक सिरे पर तुरही-आकार के होते हैं। मूल्य को देखते हुए कुसुम, हल्दी तथा रँगे मक्का-रेशम से अपमिश्रण अत्यन्त सामान्य है।

क्या केसर अवसाद में सहायक है?

मृदु से मध्यम अवसाद में केसर के पक्ष में उचित आधुनिक प्रमाण हैं, तथा मन्द मनोदशा हेतु पारम्परिक प्रयोग भी। यह नैदानिक अवसाद की चिकित्सा नहीं है, जिसे उचित देखभाल चाहिए — उपचार के स्थान पर इसे रखने के बजाय अपने चिकित्सक से चर्चा करें।

कुमकुमादि तैल क्या है?

केसर पर चन्दन, मञ्जिष्ठा तथा अन्य द्रव्यों सहित बना एक शास्त्रीय मुख-तैल, जो वर्ण, वर्ण-दोष तथा युवान-पिटिका के चिह्नों हेतु रात्रि में लगाया जाता है। यह सर्वाधिक ज्ञात आयुर्वेदीय सौन्दर्य-कल्पों में से एक है।

क्या केसर के दुष्प्रभाव हैं?

सामान्य मात्रा में अत्यल्प। बड़ी मात्रा उत्क्लेश, वमन, भ्रम तथा रक्तस्राव करती है, और 5 ग्राम से अधिक मात्रा विषैली है। रक्त पतला करने वाली अथवा रक्तचाप की औषधि लेने पर परामर्श लें।

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