चित्र: Rillke / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0 de
सनाय, सोनामुखी स्वर्णपत्री
Senna alexandrina · Fabaceae
अन्य नाम: सेना, सनाय, सोनामुखी, स्वर्णपत्री
प्रयोज्य अंग: पत्र
स्वर्णपत्री (Senna alexandrina) सोनामुखी है, विश्व के सर्वाधिक प्रयुक्त विरेचकों में से एक तथा आयुर्वेदीय एवं आधुनिक दोनों परम्पराओं में सुस्थापित रेचक। इसके एन्थ्राक्विनोन बृहदान्त्र पर कार्य करते हैं, और यह प्रभावी, विश्वसनीय तथा — महत्त्वपूर्ण रूप से — अभ्यासजन्य प्रयोग हेतु नहीं है।
| रस | कटु, तिक्त, मधुर |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और पित्त का शमन |
| प्रभाव | Rechana (laxative) |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Senna alexandrina
- प्रयोज्य अंग: पत्र
- दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
- सामान्य मात्रा: पत्र 1–3 ग्राम हिम अथवा चूर्ण के रूप में, विबन्ध हेतु अल्पकाल तक।
सनाय, सोनामुखी के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
स्वर्णपत्री (सोनामुखी, Senna alexandrina), अथवा सनाय, एक विश्वसनीय शास्त्रीय रेचक है जिसके पत्ते आन्त्र को उत्तेजित कर विबन्ध का शमन करते हैं। लघु एवं शोधक होकर यह पित्त तथा कफ का अधोमार्ग से हरण करती है।
वर्गीकरण
फ़ैबेसी (Fabaceae) कुल की स्वर्णपत्री रेचन द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु-तिक्त रस, लघु-रूक्ष गुण तथा उष्ण वीर्य आन्त्र को गतिशील करते हैं और आम का हरण करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
सोनामुखी एक उत्तेजक विरेचक है जो विबन्ध में तथा शास्त्रीय विरेचन-कल्पों में प्रयुक्त होती है। यह बृहदान्त्र पर कार्य करती है और न्यूनतम प्रभावी मात्रा में दी जाती है, प्रायः शूल रोकने हेतु शुण्ठी अथवा मिश्रेया जैसे वातानुलोमक द्रव्यों के साथ।
विबन्ध हेतु स्वर्णपत्री
बृहदान्त्र पर कार्य करने वाला विश्वसनीय उत्तेजक रेचक, जो 8 से 12 घण्टे के भीतर प्रभावी होता है।
विरेचन में स्वर्णपत्री
पंचकर्म के अंग रूप में शास्त्रीय चिकित्सकीय विरेचन में, निगरानी के अन्तर्गत प्रयुक्त।
प्रक्रियाओं से पूर्व स्वर्णपत्री
शल्य-क्रिया अथवा एण्डोस्कोपी से पूर्व आन्त्र स्वच्छ करने हेतु प्रयुक्त, यह प्रयोग आधुनिक परम्परा से साझा है।
अर्श हेतु स्वर्णपत्री
अर्श में वहाँ प्रयुक्त जहाँ कठिन मल स्थिति बिगाड़ता हो, जो मल-मार्ग को मृदु बनाती है।
त्वचा-रोग हेतु स्वर्णपत्री
इस शास्त्रीय सिद्धान्त पर कुष्ठघ्न द्रव्यों में नामित कि आन्त्र-शुद्धि त्वचा को शुद्ध करती है।
कृमि हेतु स्वर्णपत्री
विरेचन द्वारा आन्त्रगत परजीवियों को बाहर निकालने हेतु प्रयुक्त।
उदर-आध्मान हेतु स्वर्णपत्री
वहाँ प्रयुक्त जहाँ आध्मान एवं गौरव का मूल कारण विबन्ध हो।
स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण में स्वर्णपत्री
शास्त्रीय सुस्वादु विरेचक चूर्ण का एक घटक।
अल्पकालिक उपाय के रूप में स्वर्णपत्री
इसकी उचित भूमिका — अधिक से अधिक कुछ दिन, न कि स्थायी अभ्यास, और यही इसे त्रिफला से पृथक् करता है।
वातानुलोमक द्रव्यों के साथ स्वर्णपत्री
अन्यथा होने वाले उदर-शूल को घटाने हेतु शास्त्रोक्त रूप से मिश्रेया अथवा शुण्ठी के साथ संयुक्त।
मात्रा — कितना लें
पत्र 1–3 ग्राम हिम अथवा चूर्ण के रूप में, विबन्ध हेतु अल्पकाल तक। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
सनाय, सोनामुखी का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में सनाय, सोनामुखी के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग).
भावप्रकाश निघण्टु में सनाय, सोनामुखी के विषय में क्या कहा गया है?
रेचन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में सनाय, सोनामुखी किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
सोनामुखी एक उत्तेजक विरेचक है जो विबन्ध में तथा शास्त्रीय विरेचन-कल्पों में प्रयुक्त होती है। यह बृहदान्त्र पर कार्य करती है और न्यूनतम प्रभावी मात्रा में दी जाती है, प्रायः शूल रोकने हेतु शुण्ठी अथवा मिश्रेया जैसे वातानुलोमक द्रव्यों के साथ।
सनाय, सोनामुखी के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कटु, तिक्त, मधुर, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: Rechana (laxative).
सनाय, सोनामुखी को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। सनाय, सोनामुखी का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.
सनाय, सोनामुखी का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: पत्र.
सनाय, सोनामुखी की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
पत्र 1–3 ग्राम हिम अथवा चूर्ण के रूप में, विबन्ध हेतु अल्पकाल तक। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
सनाय, सोनामुखी का प्रयोग कब वर्जित है?
एक उत्तेजक रेचक — अल्पकाल तथा उचित मात्रा में प्रयोग करें। गर्भावस्था, उदर-शूल तथा दीर्घ प्रयोग में वर्जित।
सनाय, सोनामुखी कहाँ पाया जाता है?
सोनामुखी भारत के शुष्क प्रदेशों में, विशेषतः दक्षिण में, अपने औषधीय पत्तों हेतु उगाया जाने वाला छोटा क्षुप है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
रेचन के रूप में वर्णित। - शास्त्रीय विबन्ध ग्रन्थ — —
रेचक द्रव्यों में उल्लिखित।
Modern research
-
Effectiveness of senna vs polyethylene glycol as laxative therapy in children with constipation related to anorectal malformation
(see source). Journal of Pediatric Surgery (2017)
A randomized controlled trial reporting senna (Svarnapatri) was effective as laxative therapy for constipation, supporting its use as a stimulant laxative.
View study doi:10.1016/j.jpedsurg.2016.10.021
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
एक उत्तेजक रेचक — अल्पकाल तथा उचित मात्रा में प्रयोग करें। गर्भावस्था, उदर-शूल तथा दीर्घ प्रयोग में वर्जित।
प्राप्ति स्थान
सोनामुखी भारत के शुष्क प्रदेशों में, विशेषतः दक्षिण में, अपने औषधीय पत्तों हेतु उगाया जाने वाला छोटा क्षुप है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
स्वर्णपत्री किसमें प्रयुक्त होती है?
मुख्यतः विबन्ध में। यह बृहदान्त्र पर कार्य करने वाला उत्तेजक रेचक है जो 8 से 12 घण्टे में प्रभावी होता है, और शास्त्रीय चिकित्सकीय विरेचन तथा प्रक्रियाओं से पूर्व आन्त्र-शुद्धि में भी प्रयुक्त होता है।
क्या सोनामुखी दीर्घकाल तक लेना सुरक्षित है?
नहीं। दीर्घ प्रयोग से निर्भरता, विद्युत्-अपघट्य हानि तथा मेलानोसिस कोलाई नामक अवस्था होती है, और आन्त्र उसके बिना कम प्रतिक्रिया देने लगती है। इसे अधिक से अधिक कुछ दिन तक लें। दीर्घकालिक आन्त्र-सहारे हेतु त्रिफला शास्त्रीय चयन है, क्योंकि वह उत्तेजित करने के स्थान पर बल देती है।
सोनामुखी की मात्रा क्या है?
पत्र-चूर्ण रात्रि में 1–3 ग्राम, अथवा निर्देशानुसार। न्यून मात्रा से आरम्भ करें — प्रभावी मात्रा तथा उदर-शूल एवं ऐंठन उत्पन्न करने वाली मात्रा के बीच अन्तर अल्प है, और व्यक्ति-व्यक्ति में भिन्न है।
सोनामुखी किसे नहीं लेनी चाहिए?
गर्भावस्था एवं स्तनपान में, बालकों में, शोथयुक्त आन्त्र-रोग में, तथा किसी भी सम्भावित आन्त्र-अवरोध में वर्जित — जहाँ उत्तेजक रेचक संकटपूर्ण है। मूत्रल औषधि अथवा डाइजॉक्सिन लेने पर चिकित्सकीय परामर्श लें, क्योंकि पोटैशियम-हानि संचित होती है।
सोनामुखी से उदर-शूल क्यों होता है?
यह आन्त्र-संकोच को उत्तेजित कर कार्य करती है, और वही उत्तेजना शूल उत्पन्न करती है। शास्त्रीय परम्परा इसे घटाने हेतु मिश्रेया अथवा शुण्ठी जैसे वातानुलोमक द्रव्यों के साथ मिलाती है, इसीलिए यह योग में विरले ही अकेली आती है।
सोनामुखी को हिन्दी में क्या कहते हैं?
सोनामुखी अथवा सनाय। अंग्रेज़ी में एलेक्ज़ैण्ड्रियन अथवा इण्डियन सेना। वानस्पतिक नाम Senna alexandrina है, जो Cassia angustifolia से संशोधित हुआ है और प्राचीन स्रोत उसी का प्रयोग करते हैं।
सोनामुखी एवं त्रिफला में क्या अन्तर है?
सोनामुखी उत्तेजक रेचक है — शीघ्र, प्रभावी, तथा दीर्घ प्रयोग से अभ्यासजनक। त्रिफला आन्त्र-बल्य है जो अधिक मृदुता से कार्य करती है और निर्भरता उत्पन्न नहीं करती, इसीलिए दीर्घकालिक प्रयोग हेतु वही शास्त्रोक्त रूप से अनुमोदित है।