चित्र: Vinayaraj / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
Agaru अगर
Aquilaria agallocha
अन्य नाम: अगुरु
प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ
| रस | तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent) |
|---|---|
| गुण | लघु (Light), रूक्ष (Dry) |
| वीर्य | उष्ण (Hot) |
| विपाक | कटु (Pungent) |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | Classical systemic action |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Aquilaria agallocha
- प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: काष्ठ चूर्ण प्रतिदिन 500 मिग्रा – 2 ग्राम, योग के भीतर।
Agaru के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
अगर (Aquilaria agallocha) अगरु अथवा ऊद है — साधारण सारकाष्ठ नहीं, अपितु वह राल-सिक्त काष्ठ जो वृक्ष द्वारा कवक-संक्रमण की प्रतिक्रिया में बनता है। स्वस्थ अगर काष्ठ पीला और निरर्थक होता है; गहरे, घने एवं सुगन्धित प्रकार ही औषधि हैं।
आयुर्वेद इसे कफ एवं वात हेतु उष्ण सुगन्धित द्रव्य के रूप में प्रयुक्त करता है: कास एवं शीत-जन्य अवरोध में दिया जाता है तथा शूल एवं सुगन्ध हेतु बाह्य रूप से लगाया जाता है।
वर्गीकरण
कुल थाइमेलिएसी (Thymelaeaceae)। राल-अनुप्रविष्ट सारकाष्ठ औषधीय अंग है। रस: कटु, तिक्त। गुण: लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण। वीर्य: उष्ण। विपाक: कटु। दोषघ्नता: कफ एवं वात का शमन।
उपयोग एवं लाभ
कास, प्रतिश्याय तथा उरःअवरोध में और शूलयुक्त वात-व्याधियों में दिया जाता है। बाह्य रूप से इसका लेप एवं तैल शिरःशूल, सन्धि-शूल तथा त्वचा-विकारों में लगाया जाता है, तथा काष्ठ धूप के रूप में जलाया जाता है। इस संग्रह में यह इरिमेदादि तैल तथा महानारायण तैल में सम्मिलित है।
प्रतिश्याय एवं अवरोध में अगर
उष्ण एवं भेदक होने से यह वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ उर एवं शिर शीत, घने कफ से अवरुद्ध हों।
सिद्ध तैलों में अगर
शास्त्रीय तैलों में इसकी सुगन्धित उष्णता तथा गन्ध, दोनों महत्त्वपूर्ण हैं; वहाँ यह शूल एवं जकड़न हेतु तथा योग को सुगन्धित करने हेतु प्रयुक्त होता है।
मात्रा — कितना लें
काष्ठ चूर्ण प्रतिदिन 500 मिग्रा – 2 ग्राम, योग के भीतर। बाह्य रूप से तैलों एवं लेपों में, मात्रा-सीमा के बिना।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
Agaru का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में Agaru के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (सूत्रस्थान — Anuvasanopaga एवं external applications); भावप्रकाश निघण्टु (कर्पूरादि वर्ग — Aguru).
चरक संहिता में Agaru के विषय में क्या कहा गया है?
अगुरु सिद्ध तैलों तथा धूपन में प्रयुक्त। सन्दर्भ: चरक संहिता — सूत्रस्थान — Anuvasanopaga एवं external applications.
भावप्रकाश निघण्टु में Agaru के विषय में क्या कहा गया है?
कटु-तिक्त रस, उष्ण वीर्य; कफवातहर तथा बाह्य प्रयोग में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग — Aguru.
आयुर्वेद में Agaru किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
कास, प्रतिश्याय तथा उरःअवरोध में और शूलयुक्त वात-व्याधियों में दिया जाता है। बाह्य रूप से इसका लेप एवं तैल शिरःशूल, सन्धि-शूल तथा त्वचा-विकारों में लगाया जाता है, तथा काष्ठ धूप के रूप में जलाया जाता है। इस संग्रह में यह इरिमेदादि तैल तथा महानारायण तैल में सम्मिलित है।
Agaru के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.
Agaru को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। Agaru का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
Agaru का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ.
Agaru की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
काष्ठ चूर्ण प्रतिदिन 500 मिग्रा – 2 ग्राम, योग के भीतर। बाह्य रूप से तैलों एवं लेपों में, मात्रा-सीमा के बिना। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
Agaru का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। उष्ण है; पित्त को बढ़ा सकता है। Aquilaria CITES-सूचीबद्ध है और वन्य आबादी अत्यन्त क्षीण हो चुकी है — प्रलेखित, विधिसम्मत स्रोत का द्रव्य ही लें। अगरु समस्त द्रव्यों में सर्वाधिक अपमिश्रित होने वाले द्रव्यों में है, जिसे प्रायः रँगे और सुगन्धित साधारण काष्ठ से नकली बनाया जाता है।
Agaru कहाँ पाया जाता है?
उत्तर-पूर्वी भारत के आर्द्र वनों — मुख्यतः असम, मेघालय, नागालैण्ड तथा त्रिपुरा — और दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी। अब अधिकांशतः प्रेरित राल-निर्माण सहित रोपण-कृषि से प्राप्त।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग — Aguru
कटु-तिक्त रस, उष्ण वीर्य; कफवातहर तथा बाह्य प्रयोग में वर्णित। - चरक संहिता — सूत्रस्थान — Anuvasanopaga एवं external applications
अगुरु सिद्ध तैलों तथा धूपन में प्रयुक्त।
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। उष्ण है; पित्त को बढ़ा सकता है। Aquilaria CITES-सूचीबद्ध है और वन्य आबादी अत्यन्त क्षीण हो चुकी है — प्रलेखित, विधिसम्मत स्रोत का द्रव्य ही लें। अगरु समस्त द्रव्यों में सर्वाधिक अपमिश्रित होने वाले द्रव्यों में है, जिसे प्रायः रँगे और सुगन्धित साधारण काष्ठ से नकली बनाया जाता है।
प्राप्ति स्थान
उत्तर-पूर्वी भारत के आर्द्र वनों — मुख्यतः असम, मेघालय, नागालैण्ड तथा त्रिपुरा — और दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी। अब अधिकांशतः प्रेरित राल-निर्माण सहित रोपण-कृषि से प्राप्त।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अगरु इतना महँगा क्यों है?
क्योंकि केवल वही काष्ठ प्रयोज्य है जिसमें कवक-संक्रमण के पश्चात् राल भर गई हो, और यह अल्प संख्या में वृक्षों में ही होता है। यह जाति CITES-सूचीबद्ध भी है और वन्य भण्डार क्षीण हैं।
अपमिश्रण की पहचान कैसे हो?
असली अगरु घना होता है, जल में डूब जाता है या लगभग डूब जाता है, और केवल जलाने पर नहीं अपितु मन्द ऊष्मा पर ही सुगन्ध छोड़ता है। रँगे हुए नकली काष्ठ जल में रंग छोड़ देते हैं।