अमलतास (Cassia fistula) — fruit
अमलतास — Cassia fistula. प्रयोज्य अंग: फल, बीज.
चित्र: Didier Descouens / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

अमलतास अमलतास

Cassia fistula

प्रयोज्य अंग: फल, बीज

अमलतास — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसमधुर, तिक्त
गुणगुरु
वीर्यउष्ण
विपाकमधुर

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Cassia fistula
  • प्रयोज्य अंग: फल, बीज
  • सामान्य मात्रा: फल-गूदा 5–10 ग्राम रात्रि में उष्ण जल अथवा दूध के साथ।

अमलतास के अन्य भाषाओं में नाम

अंग्रेज़ीAmaltas
लैटिन (वानस्पतिक)Cassia fistula
संस्कृतअमलतास

परिचय

अमलतास (Cassia fistula) स्वर्ण-वर्षा वृक्ष है, जो ग्रीष्म ऋतु में पीले पुष्पों की लटकती मंजरियों तथा लम्बी बेलनाकार फलियों से सहज पहचाना जाता है। उन फलियों में बीजों के बीच का गूदा ही औषधि है।

आयुर्वेद इसे आरग्वध कहता है और समस्त विरेचकों में सर्वाधिक मृदु मानता है — इतना मृदु कि बालकों, वृद्धों तथा गर्भावस्था में भी, जहाँ विरेचन वास्तव में आवश्यक हो, दिया जा सके।

वर्गीकरण

कुल फैबेसी (Fabaceae)। फल-गूदा औषधीय अंग है; कुछ योगों में मूल, पत्र एवं पुष्प भी प्रयुक्त होते हैं। रस: मधुर। गुण: गुरु, स्निग्ध, मृदु। वीर्य: शीत। विपाक: मधुर। दोषघ्नता: वात एवं पित्त का शमन।

उपयोग एवं लाभ

विबन्ध में मृदु विरेचन द्रव्य के रूप में तथा ज्वर में बद्ध कोष्ठ की स्थिति में दिया जाता है। शास्त्रों ने इसे त्वचा-रोगों में तथा कुष्ठघ्न द्रव्य के रूप में भी गिना है। इस संग्रह में यह महामञ्जिष्ठादि क्वाथ तथा महारास्नादि क्वाथ में सम्मिलित है।

मृदुतम विरेचक के रूप में अमलतास

इसका माधुर्य तथा मृदु गुण ही कारण है कि शास्त्र इसे वहाँ चुनते हैं जहाँ तीव्र विरेचक असुरक्षित होगा — दुर्बल, वृद्ध तथा बालकों में।

त्वचा हेतु अमलतास

इस शास्त्रीय सिद्धान्त पर कि कोष्ठ-शुद्धि से रक्त-शुद्धि होती है, यह जीर्ण त्वचा-रोगों में प्रयुक्त होता है, तथा कण्डू में पत्र-कल्क के रूप में बाह्य लगाया जाता है।

मात्रा — कितना लें

फल-गूदा 5–10 ग्राम रात्रि में उष्ण जल अथवा दूध के साथ। बालकों हेतु चिकित्सक के निर्देशानुसार अनुपात में कम।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

अमलतास का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में अमलतास के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (सूत्रस्थान 4 — Kushtaghna गण); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग — Aragvadha).

चरक संहिता में अमलतास के विषय में क्या कहा गया है?

त्वचा-रोग में प्रयुक्त द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — Kushtaghna गण.

भावप्रकाश निघण्टु में अमलतास के विषय में क्या कहा गया है?

मधुर रस, शीत वीर्य, मृदु विरेचन। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — Aragvadha.

आयुर्वेद में अमलतास किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

विबन्ध में मृदु विरेचन द्रव्य के रूप में तथा ज्वर में बद्ध कोष्ठ की स्थिति में दिया जाता है। शास्त्रों ने इसे त्वचा-रोगों में तथा कुष्ठघ्न द्रव्य के रूप में भी गिना है। इस संग्रह में यह महामञ्जिष्ठादि क्वाथ तथा महारास्नादि क्वाथ में सम्मिलित है।

अमलतास के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस मधुर, तिक्त, गुण गुरु, वीर्य उष्ण, विपाक मधुर.

अमलतास का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: फल, बीज.

अमलतास की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

फल-गूदा 5–10 ग्राम रात्रि में उष्ण जल अथवा दूध के साथ। बालकों हेतु चिकित्सक के निर्देशानुसार अनुपात में कम। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

अमलतास का प्रयोग कब वर्जित है?

यह सर्वाधिक सुरक्षित विरेचकों में है, किन्तु कोई भी विरेचक अभ्यासवश लेने पर निर्भरता उत्पन्न करता है और उसे दैनिक उपाय नहीं बनाना चाहिए। अधिक मात्रा से मरोड़ एवं द्रव मल होते हैं। गर्भावस्था में केवल चिकित्सकीय परामर्श पर। दीर्घकालीन विबन्ध के कारण की जाँच आवश्यक है।

अमलतास कहाँ पाया जाता है?

सम्पूर्ण भारत में वनों तथा मार्ग-किनारों का पर्णपाती वृक्ष, जो वर्षा से पूर्व ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त मनोहर रूप से पुष्पित होता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — Aragvadha
    मधुर रस, शीत वीर्य, मृदु विरेचन।
  • चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — Kushtaghna गण
    त्वचा-रोग में प्रयुक्त द्रव्यों में उल्लिखित।

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

यह सर्वाधिक सुरक्षित विरेचकों में है, किन्तु कोई भी विरेचक अभ्यासवश लेने पर निर्भरता उत्पन्न करता है और उसे दैनिक उपाय नहीं बनाना चाहिए। अधिक मात्रा से मरोड़ एवं द्रव मल होते हैं। गर्भावस्था में केवल चिकित्सकीय परामर्श पर। दीर्घकालीन विबन्ध के कारण की जाँच आवश्यक है।

प्राप्ति स्थान

सम्पूर्ण भारत में वनों तथा मार्ग-किनारों का पर्णपाती वृक्ष, जो वर्षा से पूर्व ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त मनोहर रूप से पुष्पित होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमलतास को मृदुतम विरेचक क्यों कहा जाता है?

क्योंकि इसका कर्म मृदु है और यह तीव्र विरेचकों की मरोड़ के बिना कार्य करता है। इसीलिए शास्त्र इसे वहाँ अनुमत करते हैं जहाँ प्रबल द्रव्य वर्जित हों।

फली का कौन-सा भाग प्रयुक्त होता है?

बीज-विभाजनों के बीच का गहरा चिपचिपा गूदा — न काष्ठीय फली-भित्ति, न स्वयं बीज।

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