अरलु (Ailanthus excelsa) — bark
अरलु — Ailanthus excelsa. प्रयोज्य अंग: त्वक्.
चित्र: S.K. Gawali / Wikimedia Commons, Public domain
आयुर्वेदीय द्रव्य

अरलु अरलु

Ailanthus excelsa

प्रयोज्य अंग: त्वक्

अरलु — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त (Bitter), कषाय (Astringent)
गुणलघु (Light), रूक्ष (Dry)
वीर्यउष्ण (Hot)
विपाककटु (Pungent)
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावClassical systemic action

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Ailanthus excelsa
  • प्रयोज्य अंग: त्वक्
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार।

अरलु के अन्य भाषाओं में नाम

अंग्रेज़ीArlu
लैटिन (वानस्पतिक)Ailanthus excelsa
संस्कृतअरलु

परिचय

अरलू (Ailanthus excelsa) महारुख है — शुष्क भारतीय मैदानों का शीघ्र बढ़ने वाला वृक्ष, जिसके पत्ते बड़े एवं संयुक्त होते हैं और त्वक् हल्की तथा तिक्त।

आयुर्वेद इस त्वक् को प्रवाहिका तथा मन्दाग्नि-युक्त ज्वरों में दीपन एवं ग्राही द्रव्य के रूप में प्रयुक्त करता है, और प्रसवोत्तर काल में इसका सुदीर्घ प्रयोग रहा है।

वर्गीकरण

कुल सिमारूबेसी (Simaroubaceae)। काण्ड-त्वक् औषधीय अंग है। रस: तिक्त, कषाय। गुण: लघु, रूक्ष। वीर्य: शीत। विपाक: कटु। दोषघ्नता: कफ एवं पित्त का शमन।

उपयोग एवं लाभ

प्रवाहिका एवं जीर्ण अतिसार में, अरुचि-युक्त ज्वरों में, तथा प्रसव के पश्चात् के सप्ताहों में अग्नि पुनः स्थापित करने हेतु दिया जाता है। शास्त्र एवं लोक-परम्परा इसे श्वास तथा कृमि-रोग में भी प्रयुक्त करते हैं। इस संग्रह में यह महानारायण तैल में सम्मिलित है।

प्रवाहिका में अरलू

तिक्त एवं कषाय होने से यह द्रव मल को रोकते हुए अरुचि भी दूर करता है — यही संयोग उन ज्वरों में उपयुक्त है जिनमें कोष्ठ विकृत हो।

प्रसव के पश्चात् अरलू

एक पारम्परिक प्रसवोत्तर द्रव्य, जो प्रसव के बाद के सप्ताहों में अग्नि को पुनः प्रदीप्त करने हेतु प्रयुक्त होता है।

मात्रा — कितना लें

त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

अरलु का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में अरलु के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग — Aralu).

भावप्रकाश निघण्टु में अरलु के विषय में क्या कहा गया है?

तिक्त-कषाय रस, शीत वीर्य; ग्राही एवं दीपन। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग — Aralu.

आयुर्वेद में अरलु किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

प्रवाहिका एवं जीर्ण अतिसार में, अरुचि-युक्त ज्वरों में, तथा प्रसव के पश्चात् के सप्ताहों में अग्नि पुनः स्थापित करने हेतु दिया जाता है। शास्त्र एवं लोक-परम्परा इसे श्वास तथा कृमि-रोग में भी प्रयुक्त करते हैं। इस संग्रह में यह महानारायण तैल में सम्मिलित है।

अरलु के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.

अरलु को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। अरलु का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

अरलु का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: त्वक्.

अरलु की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

अरलु का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। तिक्त एवं रूक्ष होने से दीर्घ प्रयोग वात बढ़ा सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें; इसका प्रसवोत्तर प्रयोग एक पृथक् संकेत है।

अरलु कहाँ पाया जाता है?

भारत भर के शुष्क पर्णपाती वनों एवं मैदानों का वृक्ष, जो चारे एवं छाया हेतु गुजरात, राजस्थान तथा दक्कन में व्यापक रूप से लगाया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग — Aralu
    तिक्त-कषाय रस, शीत वीर्य; ग्राही एवं दीपन।
  • आयुर्वेदिक फार्माकोपिया ऑफ़ इंडिया — Aralu
    Ailanthus excelsa की काण्ड-त्वक्; पहचान एवं मात्रा।

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। तिक्त एवं रूक्ष होने से दीर्घ प्रयोग वात बढ़ा सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें; इसका प्रसवोत्तर प्रयोग एक पृथक् संकेत है।

प्राप्ति स्थान

भारत भर के शुष्क पर्णपाती वनों एवं मैदानों का वृक्ष, जो चारे एवं छाया हेतु गुजरात, राजस्थान तथा दक्कन में व्यापक रूप से लगाया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह वही आक्रामक 'ट्री ऑफ़ हेवन' है?

यह भिन्न जाति है। आक्रामक जाति Ailanthus altissima है, जो चीनी वृक्ष है। Ailanthus excelsa भारत का मूल निवासी है और यहाँ यही औषधीय द्रव्य है।

कौन-सा अंग प्रयुक्त होता है?

काण्ड-त्वक्, जो चूर्ण अथवा क्वाथ के रूप में ली जाती है।

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