आयुर्वेदीय द्रव्य

अतीस अतिविषा

Aconitum heterophyllum · Ranunculaceae

अन्य नाम: अतीस, अतिविषा, अतीश

प्रयोज्य अंग: मूल

अतिविषा (Aconitum heterophyllum) एक हिमालयी द्रव्य है जिसका शुष्क मूल उन थोड़ी-सी वत्सनाभ जातियों में है जो बिना शोधन के प्रयोग योग्य हैं। आयुर्वेद इसे बालकों के ज्वर, अतिसार तथा अजीर्ण में प्रयुक्त करता है, और शास्त्रों में यह बाल-चिकित्सा के सर्वाधिक निर्दिष्ट द्रव्यों में है।

अतीस — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कटु
गुणलघु, रूक्ष
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मत्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन
प्रभावदीपन, ग्राही, safe for children

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Aconitum heterophyllum
  • प्रयोज्य अंग: मूल
  • दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन
  • सामान्य मात्रा: मूल चूर्ण 0.5–2 ग्राम, प्रायः मधु के साथ; बालकों के पाचक एवं ज्वरहर योगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त।

अतीस के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीअतीस
अंग्रेज़ीAtis, Indian Atees
संस्कृतअतिविषा, विश्वा
बंगालीআতইচ
गुजरातीઅતિવિષ
मराठीअतिविष
तमिलஅதிவிடயம்
तेलुगुఅతివస
कन्नड़ಅತಿವಿಷ
लैटिन (वानस्पतिक)Aconitum heterophyllum

परिचय

अतिविषा (Aconitum heterophyllum), अर्थात् अतीस, वत्सनाभ जाति में असाधारण है — एक अविषैला, त्रिदोषशामक मूल जो बालकों के लिए भी सुरक्षित है। यह शास्त्रोक्त पाचक एवं ज्वरघ्न द्रव्य है, जो बालकों के अतिसार, ज्वर तथा मन्दाग्नि में प्रयुक्त होता है।

वर्गीकरण

रैनन्कुलेसी (Ranunculaceae) कुल का यह द्रव्य दीपन (पाचक), ग्राही (शोषक) तथा ज्वरघ्न द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-कटु रस एवं उष्ण वीर्य अग्नि को प्रदीप्त करता है और आम का पाचन करता है।

उपयोग एवं लाभ

अतिविषा समस्त वत्सनाभ जातियों में सर्वाधिक सुरक्षित है और यही वह द्रव्य है जिसे आयुर्वेद बालकों को देता है। यह अतिसार एवं प्रवाहिका में, मन्दाग्नि-युक्त ज्वरों में, तथा उन आम-अवस्थाओं में प्रयुक्त होता है जहाँ जिह्वा पर लेप हो। अन्य Aconitum जातियों के विपरीत इसे प्रयोग से पूर्व शोधन की आवश्यकता नहीं।

बालकों के ज्वर में अतिविषा

शास्त्रोक्त बाल-ज्वरघ्न, जो पाचन-विकार सहित ज्वरों में दिया जाता है। अपनी विषैली सजातीय जातियों के विपरीत इस जाति को प्रयोग से पूर्व शोधन की आवश्यकता नहीं।

अतिसार में अतिविषा

दीपन एवं ग्राही, दोनों — यह अरुचि दूर करते हुए द्रव मल को भी रोकता है, और संक्रमणजन्य अतिसार में ठीक इसी संयोग की आवश्यकता होती है।

अजीर्ण में अतिविषा

तिक्त एवं उष्ण होने से बालक और वयस्क, दोनों में अरुचि तथा मन्दाग्नि में प्रयुक्त।

आम में अतिविषा

शास्त्रों में आमपाचन द्रव्य, जो वहाँ दिया जाता है जहाँ ज्वर, गौरव तथा लिप्त जिह्वा के मूल में अपक्व अन्न-शेष माना जाता है।

वमन में अतिविषा

पाचन-विकार से जुड़ी उत्क्लेश एवं छर्दि में प्रयुक्त, प्रायः अन्य तिक्त द्रव्यों के योग में।

कास में अतिविषा

एक गौण संकेत, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ कास के साथ ज्वर एवं अरुचि भी हो।

कृमि में अतिविषा

कृमिघ्न द्रव्यों में नामित, जो बालकों के आन्त्र-कृमि में दिया जाता है।

बालचातुर्भद्र में अतिविषा

बालचातुर्भद्र चूर्ण के चार द्रव्यों में से एक — यह ज्वर, कास एवं अतिसार हेतु शास्त्रोक्त बाल-चूर्ण है।

कफज अवस्थाओं में अतिविषा

इसका तिक्त एवं रूक्ष स्वभाव उसे वहाँ उपयोगी बनाता है जहाँ अवरोध तथा मन्दाग्नि साथ-साथ हों।

सुरक्षित Aconitum के रूप में अतिविषा

यही इसकी विशेषता है: प्रचलित Aconitum जातियों में केवल यही अपनी स्वाभाविक अवस्था में अविषैली है, और इसीलिए इसे बालकों को दिया जा सकता है।

मात्रा — कितना लें

मूल चूर्ण 0.5–2 ग्राम, प्रायः मधु के साथ; बालकों के पाचक एवं ज्वरहर योगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

अतीस का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में अतीस के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (अतिसार एवं ज्वर प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग).

चरक संहिता में अतीस के विषय में क्या कहा गया है?

अतिसार एवं ज्वर हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — अतिसार एवं ज्वर प्रकरण.

भावप्रकाश निघण्टु में अतीस के विषय में क्या कहा गया है?

त्रिदोषशामक, दीपन एवं ग्राही के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.

आयुर्वेद में अतीस किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

अतिविषा समस्त वत्सनाभ जातियों में सर्वाधिक सुरक्षित है और यही वह द्रव्य है जिसे आयुर्वेद बालकों को देता है। यह अतिसार एवं प्रवाहिका में, मन्दाग्नि-युक्त ज्वरों में, तथा उन आम-अवस्थाओं में प्रयुक्त होता है जहाँ जिह्वा पर लेप हो। अन्य Aconitum जातियों के विपरीत इसे प्रयोग से पूर्व शोधन की आवश्यकता नहीं।

अतीस के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कटु, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन. प्रभाव: दीपन, ग्राही, safe for children.

अतीस को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। अतीस का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन.

अतीस का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: मूल.

अतीस की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

मूल चूर्ण 0.5–2 ग्राम, प्रायः मधु के साथ; बालकों के पाचक एवं ज्वरहर योगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

अतीस का प्रयोग कब वर्जित है?

असली अतिविषा (A. heterophyllum) अविषैली है; सही स्रोत सुनिश्चित करें। निर्देशन में ही प्रयोग करें।

अतीस कहाँ पाया जाता है?

अतिविषा हिमालय के अल्पाइन क्षेत्रों में उगती है; इसका कन्दिल मूल उत्तरी भारत के उच्च पर्वतीय प्रदेशों से संचित किया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
    त्रिदोषशामक, दीपन एवं ग्राही के रूप में वर्णित।
  • चरक संहिता — अतिसार एवं ज्वर प्रकरण
    अतिसार एवं ज्वर हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Antisecretory and antimotility activity of Aconitum heterophyllum and its significance in treatment of diarrhea (see source). Journal of Ayurveda and Integrative Medicine (2014)

    A study reporting Aconitum heterophyllum (Ativisha) has antisecretory and antimotility activity, supporting its classical use in diarrhoea.

    View study doi:10.4103/0253-7613.125182

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

असली अतिविषा (A. heterophyllum) अविषैली है; सही स्रोत सुनिश्चित करें। निर्देशन में ही प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

अतिविषा हिमालय के अल्पाइन क्षेत्रों में उगती है; इसका कन्दिल मूल उत्तरी भारत के उच्च पर्वतीय प्रदेशों से संचित किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या अतिविषा अन्य Aconitum जातियों की भाँति विषैली है?

नहीं, और यही इस द्रव्य की विशेषता है। Aconitum heterophyllum इस वंश की एकमात्र जाति है जिसे आयुर्वेद बिना पूर्व-शोधन के प्रयुक्त करता है। इसकी सजातीय जातियाँ — वत्सनाभ तथा अन्य — वस्तुतः विषैली हैं और किसी भी प्रयोग से पूर्व कठोर शोधन अपेक्षित है।

क्या अतिविषा बालकों को दी जा सकती है?

शास्त्रों में यह सर्वाधिक निर्दिष्ट बाल-औषधियों में से एक है, विशेषतः अतिसार सहित ज्वर में। मात्रा अनुमान से नहीं, चिकित्सक के निर्देश से निर्धारित करें, और छोटे बालक के किसी भी ज्वर में चिकित्सक को अवश्य दिखाएँ।

अतिविषा की मात्रा क्या है?

वयस्कों हेतु मूल चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, मधु के साथ। बालकों की मात्रा अनुपात में कम होती है और चिकित्सक द्वारा निर्धारित होनी चाहिए। यह प्रायः बालचातुर्भद्र चूर्ण जैसे योग के भीतर दी जाती है।

अतिविषा किसमें प्रयुक्त होती है?

ज्वर, अतिसार, अजीर्ण, वमन तथा कृमि-रोग में — विशेषतः बालकों में। दीपन (अग्नि प्रदीप्त करना) तथा ग्राही (मल रोकना), इन दोनों का संयोग ही उसे उस बालक हेतु शास्त्रोक्त चयन बनाता है जिसे ज्वर के साथ उदर-विकार भी हो।

क्या अतिविषा संकटग्रस्त है?

हाँ। Aconitum heterophyllum एक संकटग्रस्त हिमालयी जाति है जो गम्भीर संग्रह-दबाव में है और संकटापन्न (endangered) श्रेणी में सूचीबद्ध है। देखें कि उत्पाद कृषित अथवा सतत स्रोत का नाम देता है — अपमिश्रण तथा प्रतिस्थापन व्यापक हैं।

अतिविषा को हिन्दी में क्या कहते हैं?

अतीस अथवा अतीश। कहीं-कहीं पटीस भी मिलता है। संस्कृत 'अतिविषा' का अर्थ है "विष से परे" — यह संकेत इसी ओर है कि यह एक संकटपूर्ण वंश का सुरक्षित सदस्य है।

क्या इसके दुष्प्रभाव हैं?

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। यह तिक्त एवं रूक्ष है, अतः दीर्घ प्रयोग वात बढ़ा सकता है। वस्तुतः विषैली Aconitum जातियों से प्रतिस्थापन के जोखिम के कारण इसे केवल अनुज्ञप्त निर्माता से ही लें, अपुष्ट स्रोत से खुला कभी नहीं।

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