चित्र: Piyush Kothari / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
बाबची बाकुची
Cullen corylifolium · Fabaceae
अन्य नाम: Psoralea corylifolia, बाबची, बावची
प्रयोज्य अंग: बीज
बाकुची (Cullen corylifolium, पूर्व नाम Psoralea corylifolia) एक भारतीय द्रव्य है जिसके बीज श्वित्र तथा हठी त्वचा-रोगों की शास्त्रोक्त चिकित्सा हैं। यह त्वचा को सूर्य-प्रकाश के प्रति अधिक संवेदनशील बनाकर कार्य करता है, और इसीलिए इसका प्रयोग सावधानी से करना आवश्यक है — यही गुण मात्रा अथवा धूप का समय अनुचित होने पर दाह उत्पन्न करता है।
| रस | कटु, तिक्त |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | कुष्ठघ्न, skin-pigment support |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Cullen corylifolium
- प्रयोज्य अंग: बीज
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: बीज चूर्ण 0.5–2 ग्राम तथा बाकुची तैल बाह्य रूप से, त्वचा-विकारों में निगरानी के अन्तर्गत।
बाबची के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
बाकुची (Cullen corylifolium), अर्थात् बाबची, एक शास्त्रीय त्वचा-द्रव्य है जो श्वित्र एवं ल्यूकोडर्मा में वर्ण-पुनर्स्थापन हेतु सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके बीज त्वचा को उत्तेजित करते हैं और हठी कफ-वातज त्वचा-विकारों को दूर करते हैं।
वर्गीकरण
फैबेसी (Fabaceae) कुल का यह द्रव्य कुष्ठघ्न (त्वचा-रोगहर) द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु-तिक्त रस एवं उष्ण वीर्य कफ का शमन करता है तथा त्वचा की वर्णक-प्रतिक्रिया को उत्तेजित करता है।
उपयोग एवं लाभ
बाकुची श्वित्र — ल्यूकोडर्मा एवं विटिलिगो — की शास्त्रोक्त चिकित्सा है, जो आन्तरिक रूप से तथा बाह्य कल्क या तैल के रूप में, परम्परागत रूप से मापी हुई सूर्य-किरण के साथ प्रयुक्त होती है। यह हठी कुष्ठ (जीर्ण त्वचा-रोग) तथा त्वचा के कवकजन्य विकारों में भी दी जाती है।
श्वित्र में बाकुची
शास्त्रोक्त श्वित्र-द्रव्य, जो वर्ण की पुनर्स्थापना हेतु नियन्त्रित सूर्य-किरण के साथ प्रयुक्त होता है। यही इसका प्रधान तथा सर्वाधिक प्रलेखित प्रयोग है।
सोरायसिस में बाकुची
जीर्ण शल्कयुक्त त्वचा-रोग में प्रयुक्त, जो निगरानी के अन्तर्गत तैल रूप में लगाया तथा आन्तरिक रूप से लिया जाता है।
ल्यूकोडर्मा के धब्बों में बाकुची
वर्णहीन धब्बों पर सीधे बाकुची तैल के रूप में लगाया जाता है — भारतीय त्वचा-चिकित्सा परम्परा की यही प्रचलित विधि है।
कवकजन्य त्वचा-संक्रमण में बाकुची
इसकी कवकनाशक ख्याति दद्रु तथा तत्सदृश विकारों तक फैली है, जिसमें यह तैल अथवा कल्क रूप में लगाया जाता है।
कुष्ठ में बाकुची
जीर्ण त्वचा-रोग के व्यापक वर्ग में प्रयुक्त कुष्ठघ्न द्रव्यों में इसे समस्त शास्त्रों ने नामित किया है।
बाकुचिओल के रूप में बाकुची
इसका प्रधान घटक आधुनिक सौन्दर्य-उत्पादों में त्वचा-नवीकरण हेतु रेटिनॉल के मृदु विकल्प के रूप में व्यापक रूप से प्रयुक्त होने लगा है।
केश हेतु बाकुची
उसी वर्ण-पुनर्स्थापक एवं उत्तेजक सिद्धान्त पर, खण्डित केश-पात में परम्परागत रूप से शिर पर लगाया जाता है।
कृमि हेतु बाकुची
एक गौण शास्त्रीय संकेत, जिसमें बीज कृमिघ्न द्रव्य के रूप में प्रयुक्त होता है।
अतिसार में बाकुची
जीर्ण द्रव मल में शास्त्रीय परम्परा में प्रयुक्त, यद्यपि यह इसके त्वचा-सम्बन्धी प्रयोग की तुलना में कहीं कम प्रचलित है।
शास्त्रीय योगों में बाकुची
बाकुची तैल का प्रधान द्रव्य तथा अधिकांश पारम्परिक श्वित्र-योगों का घटक, प्रायः खदिर एवं मञ्जिष्ठा के साथ।
मात्रा — कितना लें
बीज चूर्ण 0.5–2 ग्राम तथा बाकुची तैल बाह्य रूप से, त्वचा-विकारों में निगरानी के अन्तर्गत। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
बाबची का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में बाबची के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग).
भावप्रकाश निघण्टु में बाबची के विषय में क्या कहा गया है?
कुष्ठघ्न एवं त्वचा-हितकर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में बाबची किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
बाकुची श्वित्र — ल्यूकोडर्मा एवं विटिलिगो — की शास्त्रोक्त चिकित्सा है, जो आन्तरिक रूप से तथा बाह्य कल्क या तैल के रूप में, परम्परागत रूप से मापी हुई सूर्य-किरण के साथ प्रयुक्त होती है। यह हठी कुष्ठ (जीर्ण त्वचा-रोग) तथा त्वचा के कवकजन्य विकारों में भी दी जाती है।
बाबची के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कटु, तिक्त, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: कुष्ठघ्न, skin-pigment support.
बाबची को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। बाबची का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
बाबची का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: बीज.
बाबची की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
बीज चूर्ण 0.5–2 ग्राम तथा बाकुची तैल बाह्य रूप से, त्वचा-विकारों में निगरानी के अन्तर्गत। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
बाबची का प्रयोग कब वर्जित है?
प्रकाश-संवेदनकारी; मात्रा तथा सूर्य-किरण सम्बन्धी निर्देशों का सावधानीपूर्वक पालन करें। केवल निर्देशन में ही प्रयोग करें।
बाबची कहाँ पाया जाता है?
बाकुची भारत भर के खुले मैदानों तथा बंजर भूमि की एक वार्षिक ओषधि है, जिसके बीज औषधि हेतु संचित किए जाते हैं।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
कुष्ठघ्न एवं त्वचा-हितकर के रूप में वर्णित। - शास्त्रीय श्वित्र ग्रन्थ — कुष्ठ चिकित्सा
श्वित्र (ल्यूकोडर्मा) हेतु उल्लिखित।
Modern research
-
Psoralea corylifolia L: Ethnobotanical, biological, and chemical aspects: A review
(see source). Phytotherapy Research (2020)
A review of Psoralea corylifolia (Bakuchi) documenting its use in vitiligo and skin conditions and its bakuchiol/psoralen chemistry.
View study doi:10.1002/ptr.6006
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
प्रकाश-संवेदनकारी; मात्रा तथा सूर्य-किरण सम्बन्धी निर्देशों का सावधानीपूर्वक पालन करें। केवल निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
बाकुची भारत भर के खुले मैदानों तथा बंजर भूमि की एक वार्षिक ओषधि है, जिसके बीज औषधि हेतु संचित किए जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बाकुची श्वित्र में किस प्रकार कार्य करती है?
बाकुची में सोरैलन होते हैं, जो त्वचा को पराबैंगनी प्रकाश के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं। वर्णहीन धब्बों पर लगाकर उसके पश्चात् अल्प एवं नियन्त्रित सूर्य-किरण देने से वर्ण लौटने में सहायता मिलती है। आधुनिक PUVA चिकित्सा का पारम्परिक आधार यही है।
क्या बाकुची से त्वचा जल सकती है?
हाँ, और यही प्रधान जोखिम है। त्वचा को सूर्य-प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाने के कारण अधिक तैल अथवा धूप में अधिक समय रहने से फफोले तथा दाह होते हैं। अल्प समय से आरम्भ करें, ठीक निर्देशानुसार प्रयोग करें, और शीघ्रता हेतु धूप का समय कभी न बढ़ाएँ।
श्वित्र में बाकुची का प्रभाव दिखने में कितना समय लगता है?
मास लगते हैं, सप्ताह नहीं। वर्ण-पुनर्स्थापन मन्द तथा प्रायः आंशिक होता है, और परिणाम व्यक्ति-व्यक्ति एवं धब्बे-धब्बे में बहुत भिन्न होते हैं। श्वित्र में त्वचा-रोग विशेषज्ञ का सम्मिलित होना आवश्यक है — यह एक सहायक पारम्परिक उपचार है, निदान नहीं।
बाकुचिओल क्या है, क्या वह यही वस्तु है?
बाकुचिओल बाकुची के बीजों से पृथक् किया गया एक एकल यौगिक है, जो अब त्वचा-देखभाल में रेटिनॉल के मृदु विकल्प के रूप में प्रचलित है। यह सम्पूर्ण बाकुची के समान नहीं है, जिसमें प्रकाश-संवेदनशीलता के लिए उत्तरदायी सोरैलन भी होते हैं।
बाकुची की मात्रा क्या है?
आन्तरिक रूप से बीज चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, केवल चिकित्सक की निगरानी में। बाह्य रूप से बाकुची तैल प्रभावित धब्बे पर पतला लगाया जाता है। यह किसी भी मात्रा में सहज स्वयं-चिकित्सा का द्रव्य नहीं है।
बाकुची किसे नहीं लेनी चाहिए?
गर्भावस्था तथा स्तनपान में, यकृत्-रोग में, तथा यदि आप कोई ऐसी औषधि लेते हैं जो पहले से ही प्रकाश-संवेदनशीलता उत्पन्न करती है, तो वर्जित। त्वचा-कर्कट का इतिहास रखने वाले व्यक्ति बिना त्वचा-विशेषज्ञ के परामर्श के प्रकाश-संवेदनकारी उपचार न लें।
बाकुची को हिन्दी में क्या कहते हैं?
बाबची। कहीं-कहीं बावची अथवा बाकुची भी सीधे प्रयुक्त होता है। वानस्पतिक नाम हाल ही में Psoralea corylifolia से बदलकर Cullen corylifolium किया गया है, अतः पुराने स्रोत पहला नाम देते हैं।