चित्र: Delince / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
Chhaldila (Stone Flower) छड़ीला
Parmelia perlata
अन्य नाम: छड़ीला (शिलापुष्प)
प्रयोज्य अंग: Lichen
| रस | तिक्त, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, स्निग्ध |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | पित्त और कफ का शमन |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Parmelia perlata
- प्रयोज्य अंग: Lichen
- दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन
- सामान्य मात्रा: चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम; तैलों एवं लेपों में बाह्य रूप से मात्रा-सीमा के बिना।
Chhaldila (Stone Flower) के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
छड़ीला, अर्थात् शिलापुष्प, वस्तुतः वनस्पति है ही नहीं, अपितु एक लाइकेन है — Parmelia perlata — कवक एवं शैवाल का सहजीवन, जो पर्वतों में शिलाओं तथा वृक्ष-त्वक् पर धूसर चक्रों के रूप में उगता है।
भारतीय पाकशास्त्र इसे महाराष्ट्रीय एवं हैदराबादी मसालों में एक द्रव्य के रूप में जानता है। आयुर्वेद इसे दाह, तृष्णा तथा त्वचा-विकारों हेतु शीत, सुगन्धित द्रव्य के रूप में प्रयुक्त करता है।
वर्गीकरण
एक लाइकेन (Parmeliaceae), पुष्पीय वनस्पति नहीं। सम्पूर्ण थैलस प्रयुक्त होता है। रस: तिक्त, कषाय, मधुर। गुण: लघु, रूक्ष। वीर्य: शीत। विपाक: कटु। दोषघ्नता: पित्त एवं कफ का शमन।
उपयोग एवं लाभ
दाह, अत्यधिक तृष्णा तथा उष्णता-युक्त ज्वरों में, और दाहयुक्त मूत्र-विकारों में दिया जाता है। त्वचा-पिटिका एवं शोथ में बाह्य रूप से लगाया जाता है। इस संग्रह में यह महानारायण तैल में सम्मिलित है।
दाह एवं तृष्णा हेतु छड़ीला
शीत एवं लघु होने से यह उन पित्त-अवस्थाओं में प्रयुक्त होता है जहाँ उष्णता एवं तृष्णा प्रधान हों, और शीत योगों में सम्मिलित रहता है।
सुगन्धित द्रव्य के रूप में छड़ीला
इसकी मन्द सुगन्ध ही कारण है कि यह मसालों तथा सिद्ध तैलों, दोनों में सम्मिलित रहता है, जहाँ यह शीत कर्म के साथ गन्ध का भी योगदान करता है।
मात्रा — कितना लें
चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम; तैलों एवं लेपों में बाह्य रूप से मात्रा-सीमा के बिना।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
Chhaldila (Stone Flower) का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में Chhaldila (Stone Flower) के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (कर्पूरादि वर्ग — Shaileya).
भावप्रकाश निघण्टु में Chhaldila (Stone Flower) के विषय में क्या कहा गया है?
तिक्त-कषाय रस, शीत वीर्य; दाह एवं तृष्णा में प्रयुक्त। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग — Shaileya.
आयुर्वेद में Chhaldila (Stone Flower) किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
दाह, अत्यधिक तृष्णा तथा उष्णता-युक्त ज्वरों में, और दाहयुक्त मूत्र-विकारों में दिया जाता है। त्वचा-पिटिका एवं शोथ में बाह्य रूप से लगाया जाता है। इस संग्रह में यह महानारायण तैल में सम्मिलित है।
Chhaldila (Stone Flower) के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, स्निग्ध, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन.
Chhaldila (Stone Flower) को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। Chhaldila (Stone Flower) का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: पित्त और कफ का शमन.
Chhaldila (Stone Flower) का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: Lichen.
Chhaldila (Stone Flower) की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम; तैलों एवं लेपों में बाह्य रूप से मात्रा-सीमा के बिना। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
Chhaldila (Stone Flower) का प्रयोग कब वर्जित है?
सुसह्य। लाइकेन अपने परिवेश से वायुजनित प्रदूषक तथा भारी धातुएँ संचित करते हैं, अतः मार्गों या उद्योगों के निकट से संचित द्रव्य से बचना श्रेष्ठ है — इस द्रव्य में स्रोत सामान्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है। कुछ व्यक्तियों में लाइकेन अम्लों से सम्पर्क-त्वचाशोथ हो जाता है।
Chhaldila (Stone Flower) कहाँ पाया जाता है?
भारत की पहाड़ियों में शिलाओं तथा वृक्ष-त्वक् पर उगता है, मुख्यतः पश्चिमी घाट, नीलगिरि तथा हिमालय की तलहटी में। हाथ से संचित।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग — Shaileya
तिक्त-कषाय रस, शीत वीर्य; दाह एवं तृष्णा में प्रयुक्त। - आयुर्वेदिक फार्माकोपिया ऑफ़ इंडिया — Shaileyam
Parmelia जाति; पहचान एवं मात्रा।
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सुसह्य। लाइकेन अपने परिवेश से वायुजनित प्रदूषक तथा भारी धातुएँ संचित करते हैं, अतः मार्गों या उद्योगों के निकट से संचित द्रव्य से बचना श्रेष्ठ है — इस द्रव्य में स्रोत सामान्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है। कुछ व्यक्तियों में लाइकेन अम्लों से सम्पर्क-त्वचाशोथ हो जाता है।
प्राप्ति स्थान
भारत की पहाड़ियों में शिलाओं तथा वृक्ष-त्वक् पर उगता है, मुख्यतः पश्चिमी घाट, नीलगिरि तथा हिमालय की तलहटी में। हाथ से संचित।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या शिलापुष्प एक वनस्पति है?
नहीं — यह एक लाइकेन है, कवक एवं शैवाल की साझेदारी। हम इसे जड़ी-बूटियों के अन्तर्गत रखते हैं क्योंकि यह घटक-पत्रक में आता है, किन्तु वनस्पति-विज्ञान की दृष्टि से यह दोनों में से कोई नहीं है।
स्रोत क्यों महत्त्वपूर्ण है?
लाइकेन अपने चारों ओर की वायु में जो कुछ है उसे शोषित कर लेते हैं, जिसमें भारी धातुएँ भी सम्मिलित हैं। मार्गों एवं उद्योगों से दूर संचित द्रव्य वरीय है।