शास्त्रीय योग

दशमूल दशमूल

अन्य नाम: दशमूल, दस पवित्र मूल

प्रयोज्य अंग: दस मूल (दशमूल)

दशमूल कोई एक द्रव्य नहीं, अपितु दस मूलों का शास्त्रीय समूह है — पाँच वृक्षों के और पाँच क्षुप एवं ओषधियों के। मिलकर ये आयुर्वेद के प्रधान वातशामक तथा शोथहर योग बनते हैं, जो सन्धि-शूल, श्वसन-विकार, ज्वर तथा प्रसवोत्तर पुनर्लाभ में प्रयुक्त होते हैं।

दशमूल — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कषाय, मधुर, कटु
गुणलघु
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मवात और कफ का शमन, विशेषतः वात शामक
प्रभावशोथहर, वातहर (the ten roots)

सार-संक्षेप

  • प्रयोज्य अंग: दस मूल (दशमूल)
  • दोष-कर्म: वात और कफ का शमन, विशेषतः वात शामक
  • सामान्य मात्रा: दशमूल क्वाथ 40–80 मिली, अथवा दशमूलारिष्ट के रूप में; सिद्ध बस्ति एवं तैलों में भी प्रयुक्त।

दशमूल के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीदशमूल
अंग्रेज़ीThe Ten Roots
संस्कृतदशमूल
लैटिन (वानस्पतिक)Dashamula (ten-root compound)

परिचय

दशमूल ("दस मूल") आयुर्वेद के सर्वाधिक बहुउपयोगी शास्त्रीय समूहों में से एक है — दस मूलों का ऐसा संयोग जो मिलकर वात का शमन करता है, शोथ घटाता है, तथा श्वसन-मार्ग, सन्धियों और प्रसवोत्तर पुनर्लाभ को सहारा देता है।

घटक द्रव्य

वर्गीकरण

दशमूल दस मूलों का योग है — पाँच बृहत् मूल (बृहत् पञ्चमूल: बिल्व, अग्निमन्थ, श्योनाक, पाटला, गम्भारी) तथा पाँच लघु मूल (लघु पञ्चमूल: शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारी, गोक्षुर)। उष्ण एवं वातशामक होकर ये मिलकर शोथहर तथा वातहर हैं।

उपयोग एवं लाभ

दशमूल एक द्रव्य नहीं, अपितु एक साथ लिए जाने वाले दस मूल हैं — पाँच बृहत् और पाँच लघु। यह आयुर्वेद के वात-प्रबन्धन का आधार है: अङ्गमर्द, जकड़न, गृध्रसी तथा ज्वर के पश्चात् आने वाली दुर्बलता में, और श्वसन सम्बन्धी वात-कफज अवस्थाओं में प्रयुक्त। यह शास्त्रोक्त प्रसवोत्तर द्रव्य भी है।

सन्धि-शूल हेतु दशमूल

शास्त्रोक्त वातहर समूह, जो सन्धिवात, कटिशूल तथा जकड़न में वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ व्याधि रूक्षता एवं शूल की हो।

श्वसन-विकारों हेतु दशमूल

कास, श्वास तथा श्वास-कष्ट में प्रयुक्त, विशेषतः शुष्क एवं कसाव वाले प्रकार में, न कि अवरोध-युक्त में।

ज्वर हेतु दशमूल

ज्वर में नामित, विशेषतः उस मन्द ज्वर में जो संक्रमण के पश्चात् बना रहता है।

प्रसव के पश्चात् दशमूल

इसका सर्वाधिक स्थापित प्रयोगों में से एक — प्रसवोत्तर सप्ताहों में बल पुनः स्थापित करने तथा वात को शान्त करने हेतु क्वाथ दिया जाता है।

गृध्रसी हेतु दशमूल

गृध्रसी में प्रयुक्त, जो आन्तरिक रूप से लिया जाता है तथा बस्ति हेतु उष्ण क्वाथ के रूप में प्रयुक्त होता है।

बस्ति के रूप में दशमूल

दशमूल क्वाथ पञ्चकर्म में वात-व्याधियों हेतु मानक सिद्ध बस्ति है।

शिरःशूल हेतु दशमूल

ग्रीवा एवं स्कन्ध की जकड़न सहित वातज शिरःशूल में प्रयुक्त।

शोथ हेतु दशमूल

इसका शोथहर स्वभाव सूजन तक विस्तृत है, जहाँ यह क्वाथ रूप में लिया जाता है।

उदर-शूल हेतु दशमूल

मरोड़युक्त वातज शूल में प्रयुक्त, प्रायः पाचक द्रव्यों के साथ।

दशमूलारिष्ट में दशमूल

इसी समूह पर बना सन्धान-कल्प, जो प्रसवोत्तर पुनर्लाभ तथा जीर्ण वात-विकारों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है।

मात्रा — कितना लें

दशमूल क्वाथ 40–80 मिली, अथवा दशमूलारिष्ट के रूप में; सिद्ध बस्ति एवं तैलों में भी प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

दशमूल का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में दशमूल के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (वात एवं शोथ प्रकरण); शार्ङ्गधर संहिता (Kwatha एवं Arishta Kalpana).

चरक संहिता में दशमूल के विषय में क्या कहा गया है?

दसों मूल वातशामक, शोथहर समूहों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — वात एवं शोथ प्रकरण.

शार्ङ्गधर संहिता में दशमूल के विषय में क्या कहा गया है?

दशमूल क्वाथ तथा दशमूलारिष्ट का वर्णन। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Kwatha एवं Arishta Kalpana.

आयुर्वेद में दशमूल किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

दशमूल एक द्रव्य नहीं, अपितु एक साथ लिए जाने वाले दस मूल हैं — पाँच बृहत् और पाँच लघु। यह आयुर्वेद के वात-प्रबन्धन का आधार है: अङ्गमर्द, जकड़न, गृध्रसी तथा ज्वर के पश्चात् आने वाली दुर्बलता में, और श्वसन सम्बन्धी वात-कफज अवस्थाओं में प्रयुक्त। यह शास्त्रोक्त प्रसवोत्तर द्रव्य भी है।

दशमूल के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कषाय, मधुर, कटु, गुण लघु, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: वात और कफ का शमन, विशेषतः वात शामक. प्रभाव: शोथहर, वातहर (the ten roots).

दशमूल को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। दशमूल का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और कफ का शमन, विशेषतः वात शामक.

दशमूल का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: दस मूल (दशमूल).

दशमूल की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

दशमूल क्वाथ 40–80 मिली, अथवा दशमूलारिष्ट के रूप में; सिद्ध बस्ति एवं तैलों में भी प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

दशमूल का प्रयोग कब वर्जित है?

निर्देशन में शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; यह व्यापक रूप से प्रयुक्त आधारभूत समूह है।

दशमूल कहाँ पाया जाता है?

दसों मूल भारत भर के वृक्षों एवं ओषधियों से संचित होते हैं और शास्त्रोक्त अनुपात में मिलाए जाते हैं।

दशमूल किन द्रव्यों से बनता है?

घटक द्रव्य: Bilva, Arni, Syonaka, Parhal, Gambhari, Shalparni, Prashnaparni, Brihati, Kantakari, Gokshura.

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • शार्ङ्गधर संहिता — Kwatha एवं Arishta Kalpana
    दशमूल क्वाथ तथा दशमूलारिष्ट का वर्णन।
  • चरक संहिता — वात एवं शोथ प्रकरण
    दसों मूल वातशामक, शोथहर समूहों में उल्लिखित।

Modern research

  1. Anti-inflammatory effects of Dashmula, an Ayurvedic preparation, versus Diclofenac in animal models (see source). Journal of Chemical and Pharmaceutical Research (2012)

    A study reporting the classical ten-root Dashamula preparation reduced acute and chronic inflammation in animal models, comparably to standard anti-inflammatory drugs.

    View study

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

निर्देशन में शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; यह व्यापक रूप से प्रयुक्त आधारभूत समूह है।

प्राप्ति स्थान

दसों मूल भारत भर के वृक्षों एवं ओषधियों से संचित होते हैं और शास्त्रोक्त अनुपात में मिलाए जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दशमूल के दस मूल कौन-से हैं?

पाँच वृक्षों से — बिल्व, अग्निमन्थ, श्योनाक, पाटला तथा गम्भारी — और पाँच छोटे पौधों से: शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारी तथा गोक्षुर। प्रथम पाँच बृहत् पञ्चमूल कहलाते हैं, द्वितीय पाँच लघु पञ्चमूल।

दशमूल किसमें प्रयुक्त होता है?

यह आयुर्वेद का प्रधान वातशामक समूह है, जो सन्धि-शूल, गृध्रसी, शुष्क कास एवं श्वास, दीर्घकालीन ज्वर, प्रसवोत्तर पुनर्लाभ तथा उदर-शूल में प्रयुक्त होता है। इसे क्वाथ, दशमूलारिष्ट अथवा सिद्ध बस्ति के रूप में लिया जाता है।

दशमूल की मात्रा क्या है?

क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। दशमूलारिष्ट के रूप में 15–30 मिली समान मात्रा जल के साथ भोजनोपरान्त। क्वाथ शास्त्रोक्त रूप है और प्रायः ताज़ा बनाया जाता है।

क्या प्रसव के पश्चात् दशमूल सुरक्षित है?

भारतीय परम्परा में प्रसवोत्तर प्रयोग इसके प्राचीनतम एवं सर्वाधिक स्थापित संकेतों में है। फिर भी अपनी स्थिति के अनुसार काल एवं मात्रा की पुष्टि चिकित्सक से कराएँ, विशेषतः स्तनपान अथवा सिज़ेरियन से पुनर्लाभ की अवस्था में।

क्या दशमूल प्रतिदिन लिया जा सकता है?

इसे सामान्यतः अनिश्चित काल तक नहीं, अपितु किसी विशिष्ट व्याधि हेतु कुछ सप्ताहों के क्रम में लिया जाता है। दशमूलारिष्ट प्रायः लम्बी अवधि तक दिया जाता है, चिकित्सक के निर्देशानुसार।

क्या दशमूल के दुष्प्रभाव हैं?

सुसह्य। यह उष्ण है, अतः पित्त बढ़ा सकता है और अम्लपित्त वाले व्यक्ति के लिए कम उपयुक्त है। अरिष्ट रूप में स्वतः उत्पन्न मद्य होता है, जो उन व्यक्तियों हेतु विचारणीय है जो मद्य से बचते हैं अथवा उससे प्रतिक्रिया करने वाली औषधि लेते हैं।

क्या दशमूल कास में अच्छा है?

हाँ, विशेषतः शुष्क, कसाव वाली, निष्फल कास में जिसमें उर में असुविधा हो — यही वात-प्रकार है। आर्द्र, अवरुद्ध कास हेतु बिभीतकी अथवा तालीसादि जैसे कफ-निर्हरक द्रव्य श्रेष्ठ हैं।

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