धतूरा (Datura metel) — seed
धतूरा — Datura metel. प्रयोज्य अंग: बीज, पत्र.
चित्र: Swallowtail Garden Seeds from Santa Rosa, California, United States / Wikimedia Commons, CC BY 2.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

धतूरा धत्तूर

Datura metel · Solanaceae

अन्य नाम: कनक, धतूरा, धतूरा बीज

प्रयोज्य अंग: बीज, पत्र

धत्तूर (Datura metel) एक विषैली वनस्पति है जो आयुर्वेद में केवल कठोर शोधन के पश्चात् तथा अत्यन्त अल्प मात्रा में प्रयुक्त होती है। उपविष — उप-विषों — में वर्गीकृत यह शूल हेतु बाह्य रूप से तथा श्वास एवं आक्षेप में सूक्ष्म मात्रा में आन्तरिक रूप से प्रयुक्त होती है। अनुज्ञप्त योगों के बाहर यह संकटपूर्ण है।

धतूरा — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कटु
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावशूलहर, analgesic (external)

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Datura metel
  • प्रयोज्य अंग: बीज, पत्र
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: केवल शोधित धत्तूर, चिकित्सक द्वारा निर्धारित योगों के भीतर सूक्ष्म मात्रा में; शूल हेतु पत्र/तैल बाह्य रूप से।

धतूरा के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीधतूरा
अंग्रेज़ीThorn Apple, Datura
संस्कृतधत्तूर, कनक
बंगालीধুতুরা
गुजरातीધતૂરો
मराठीधोतरा
तमिलஊமத்தை
तेलुगुఉమ్మెత్త
कन्नड़ದತ್ತೂರಿ
लैटिन (वानस्पतिक)Datura metel

परिचय

धत्तूर (Datura metel), अर्थात् कण्टकयुक्त फल वाला धतूरा, एक प्रबल, विषैली वनस्पति है जो शास्त्रीय आयुर्वेद में केवल सावधान शोधन के पश्चात् और अत्यल्प, नियन्त्रित मात्रा में प्रयुक्त होती है — मुख्यतः शूल, आक्षेप एवं त्वचा हेतु बाह्य रूप से, तथा कनकासव जैसे योगों में।

वर्गीकरण

सोलेनेसी (Solanaceae) कुल का धत्तूर एक प्रबल वात-कफ शामक, आक्षेपहर तथा वेदनाहर द्रव्य है। यह उपविष (अर्ध-विषैले) द्रव्यों में से एक है, जिसे प्रयोग से पूर्व शोधन अपेक्षित है।

उपयोग एवं लाभ

धत्तूर अनुसूची E1 का विषैला द्रव्य है, जो केवल शोधन के पश्चात् और केवल चिकित्सक के निर्देशन में प्रयुक्त होता है। इसके शास्त्रोक्त प्रयोग बाह्य हैं — शूल, आक्षेप एवं त्वचा-रोग में कल्क या तैल के रूप में — तथा श्वास एवं तीव्र शूल में सावधानी से मापी गई आन्तरिक मात्रा में। इसकी कभी स्वयं-चिकित्सा नहीं की जाती।

सन्धि-शूल हेतु धत्तूर

पत्र को उष्ण कर शूलयुक्त सन्धि पर लगाना इसका सर्वाधिक प्रचलित एवं सर्वाधिक सुरक्षित प्रयोग है — बाह्य, स्थानिक, और वात-शूल में प्रभावी।

श्वास हेतु धत्तूर

शास्त्रों में श्वास में प्रयुक्त। इसका प्रतिकोलिनर्जिक कर्म श्वास-मार्ग के आक्षेप को शिथिल करता है, और यही पुरानी 'अस्थमा सिगरेट' का आधार था।

मांसपेशी-आक्षेप हेतु धत्तूर

मरोड़ तथा आक्षेपयुक्त पेशी-अवस्थाओं में बाह्य रूप से तैल के रूप में लगाया जाता है।

केश हेतु धत्तूर

पत्र-स्वरस परम्परागत रूप से दारुणक तथा केश-पात में शिर-त्वचा पर लगाया जाता है।

शोथ हेतु धत्तूर

पत्र का पुल्टिस विद्रधि, फोड़ों तथा शूलयुक्त गाँठों पर लगाया जाता है।

दन्तशूल हेतु धत्तूर

एक पारम्परिक स्थानिक प्रयोग, यद्यपि लवङ्ग जैसे सुरक्षित विकल्प सामान्यतः वरीय हैं।

उपविष वर्ग में धत्तूर

वर्गीकृत उप-विषों में से एक, जिसे किसी भी आन्तरिक प्रयोग से पूर्व शोधन अपेक्षित है — यह औपचारिक वर्ग है, केवल चेतावनी नहीं।

त्वचा-परजीवियों हेतु धत्तूर

पामा तथा तत्सदृश अवस्थाओं में बाह्य रूप से प्रयुक्त।

शास्त्रीय योगों में धत्तूर

कनकासव तथा अनेक श्वसन एवं वेदनाहर योगों में उपस्थित, सदैव कठोरता से नियन्त्रित मात्रा में।

अर्श हेतु धत्तूर

शूलयुक्त अर्श में पत्र स्थानिक रूप से लगाया जाता है।

मात्रा — कितना लें

केवल शोधित धत्तूर, चिकित्सक द्वारा निर्धारित योगों के भीतर सूक्ष्म मात्रा में; शूल हेतु पत्र/तैल बाह्य रूप से। कठोर निगरानी के अन्तर्गत।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

धतूरा का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में धतूरा के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भैषज्य रत्नावली (Kanakasava).

भैषज्य रत्नावली में धतूरा के विषय में क्या कहा गया है?

शास्त्रीय श्वसन योग में प्रयुक्त। सन्दर्भ: भैषज्य रत्नावली — Kanakasava.

आयुर्वेद में धतूरा किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

धत्तूर अनुसूची E1 का विषैला द्रव्य है, जो केवल शोधन के पश्चात् और केवल चिकित्सक के निर्देशन में प्रयुक्त होता है। इसके शास्त्रोक्त प्रयोग बाह्य हैं — शूल, आक्षेप एवं त्वचा-रोग में कल्क या तैल के रूप में — तथा श्वास एवं तीव्र शूल में सावधानी से मापी गई आन्तरिक मात्रा में। इसकी कभी स्वयं-चिकित्सा नहीं की जाती।

धतूरा के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कटु, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: शूलहर, analgesic (external).

धतूरा को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। धतूरा का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

धतूरा का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: बीज, पत्र.

धतूरा की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

केवल शोधित धत्तूर, चिकित्सक द्वारा निर्धारित योगों के भीतर सूक्ष्म मात्रा में; शूल हेतु पत्र/तैल बाह्य रूप से। कठोर निगरानी के अन्तर्गत। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

धतूरा का प्रयोग कब वर्जित है?

विषैला। केवल शास्त्रीय शोधन के पश्चात्, सूक्ष्म निगरानीयुक्त मात्रा में, मुख्यतः बाह्य रूप से प्रयुक्त। कभी स्वयं सेवन न करें। बालकों की पहुँच से दूर रखें।

धतूरा कहाँ पाया जाता है?

धत्तूर भारत भर की बंजर भूमि तथा मार्ग-किनारों की एक स्थूल वार्षिक वनस्पति है, जिसमें बड़े तुरही-आकार पुष्प तथा कण्टकयुक्त फल लगते हैं।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • रस तरङ्गिणी — Upavisha Shodhana
    शोधन तथा नियन्त्रित प्रयोग का वर्णन।
  • भैषज्य रत्नावली — Kanakasava
    शास्त्रीय श्वसन योग में प्रयुक्त।

Modern research

  1. Ethnobotanical uses and phytochemical, biological, and toxicological profiles of Datura metel L.: A review (see source). Toxicology Reports (2023)

    A review of Datura metel (Dhattura) documenting its analgesic, antispasmodic and antimicrobial actions alongside its tropane-alkaloid toxicity, underscoring supervised use only.

    View study doi:10.1016/j.crtox.2023.100106

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

विषैला। केवल शास्त्रीय शोधन के पश्चात्, सूक्ष्म निगरानीयुक्त मात्रा में, मुख्यतः बाह्य रूप से प्रयुक्त। कभी स्वयं सेवन न करें। बालकों की पहुँच से दूर रखें।

प्राप्ति स्थान

धत्तूर भारत भर की बंजर भूमि तथा मार्ग-किनारों की एक स्थूल वार्षिक वनस्पति है, जिसमें बड़े तुरही-आकार पुष्प तथा कण्टकयुक्त फल लगते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या धत्तूर विषैला है?

हाँ। धतूरा वस्तुतः विषैला है — अधिक मात्रा में यह भ्रम, प्रलाप, हृद्गति-वृद्धि, तीव्र ज्वर तथा मृत्यु तक कर देता है, और भारत में प्रतिवर्ष विषाक्तता की घटनाएँ होती हैं। आयुर्वेद इसे उपविषों में गिनता है और किसी भी आन्तरिक प्रयोग से पूर्व शोधन तथा सूक्ष्म मात्रा अपेक्षित करता है।

धत्तूर का सुरक्षित प्रयोग कैसे होता है?

केवल शोधित द्रव्य के रूप में, अनुज्ञप्त योग के भीतर, चिकित्सक द्वारा निर्धारित मात्रा में। इसका सर्वाधिक सुरक्षित प्रयोग बाह्य है — शूलयुक्त सन्धि पर उष्ण किया हुआ पत्र। इसे घर पर कभी न बनाएँ और कभी खुला न लें।

धत्तूर किसमें प्रयुक्त होता है?

बाह्य रूप से सन्धि-शूल, पेशी-आक्षेप, शोथ तथा त्वचा-परजीवियों में। आन्तरिक रूप से, योगों के भीतर सूक्ष्म शोधित मात्रा में, श्वास एवं आक्षेपयुक्त अवस्थाओं में। यह शास्त्रीय श्वसन योगों में कनकासव में सम्मिलित है।

धतूरा विषाक्तता के लक्षण क्या हैं?

मुख-शोष, फैली हुई पुतलियाँ, धुँधली दृष्टि, लाल-उष्ण त्वचा, तीव्र नाड़ी, भ्रम, उद्वेग तथा मतिविभ्रम। यह चिकित्सकीय आपात है — तत्काल अस्पताल जाएँ। बालक अत्यन्त अल्प मात्रा से भी प्रभावित होते हैं।

विषैली वनस्पति औषधि के रूप में क्यों प्रयुक्त होती है?

क्योंकि शोधन एवं मात्रा-नियन्त्रण विष को औषधि बना देते हैं — यही सिद्धान्त अनेक प्रचलित औषधियों के पीछे भी है। आयुर्वेद इसे शोधन प्रक्रिया में औपचारिक रूप देता है, और परिणामी योग अनुज्ञप्ति के अन्तर्गत बनते हैं, घर पर नहीं।

क्या मैं घर पर धतूरा उगा सकता हूँ?

यह भारत भर में स्वतः उगता है और प्रायः उद्यानों में मिल जाता है, किन्तु बालकों को इससे दूर रखें। बीज सर्वाधिक विषैला भाग हैं और आकस्मिक विषाक्तता का सामान्य कारण भी। उद्यान की वनस्पति का औषधीय प्रयोग न करें।

धत्तूर को हिन्दी में क्या कहते हैं?

धतूरा। अंग्रेज़ी में इसे थॉर्न ऐपल, डेविल्स ट्रम्पेट अथवा मेटल कहते हैं। मन्दिरों में यह शिव को अर्पित किया जाता है, इसीलिए यह अनेक मन्दिरों के निकट उगता मिलता है।

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