घृतकुमारी, ग्वारपाठा (Aloe vera) — leaf
घृतकुमारी, ग्वारपाठा — Aloe vera. प्रयोज्य अंग: पत्र.
चित्र: Vojtěch Zavadil / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

घृतकुमारी, ग्वारपाठा कुमारी

Aloe vera · Asphodelaceae

अन्य नाम: एलोवेरा, घृतकुमारी, ग्वारपाठा, एलुआ

प्रयोज्य अंग: पत्र

कुमारी (Aloe vera) घृतकुमारी है, जिसके पत्र का गूदा आयुर्वेद में दग्ध, त्वचा-विकार, यकृत्-क्रिया तथा स्त्री-स्वास्थ्य हेतु प्रयुक्त होता है। एक ही पत्र से दो अत्यन्त भिन्न द्रव्य निकलते हैं: भीतर का स्वच्छ गूदा शान्तिदायक एवं सुरक्षित है, जबकि छिलके के ठीक नीचे का तिक्त पीला क्षीर प्रबल विरेचक है।

घृतकुमारी, ग्वारपाठा — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, मधुर
गुणगुरु, स्निग्ध, पिच्छिल
वीर्यशीत
विपाककटु
दोष-कर्मत्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः पित्त शामक
प्रभावभेदन, रसायन, स्त्री-रोग बल्य

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Aloe vera
  • प्रयोज्य अंग: पत्र
  • दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः पित्त शामक
  • सामान्य मात्रा: ताज़ा गूदा/स्वरस 10–20 मिली; कुमारीआसव प्रचलित योग है।

घृतकुमारी, ग्वारपाठा के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीघृतकुमारी, ग्वारपाठा
अंग्रेज़ीAloe Vera
संस्कृतकुमारी, घृतकुमारी
बंगालीঘৃতকুমারী
गुजरातीકુંવારપાઠું
मराठीकोरफड
तमिलசோற்றுக்கற்றாழை
तेलुगुకలబంద
कन्नड़ಲೋಳೆಸರ
लैटिन (वानस्पतिक)Aloe vera

परिचय

कुमारी (Aloe vera), अर्थात् घृतकुमारी, एक शीत, शान्तिदायक रसीली वनस्पति है जो यकृत्, त्वचा, पाचन तथा स्त्री-स्वास्थ्य हेतु प्रयुक्त होती है। इसका गूदा एवं स्वरस मृदु विरेचक तथा गहरे शीत हैं।

वर्गीकरण

एस्फ़ोडेलेसी (Asphodelaceae) कुल की कुमारी भेदन (मृदु विरेचक), रसायन तथा स्त्री-बल्य द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-मधुर रस, स्निग्ध-पिच्छिल गुण एवं शीत वीर्य पित्त को शान्त करते हैं और पोषण देते हैं।

उपयोग एवं लाभ

घृतकुमारी यकृत्, कोष्ठ तथा गर्भाशय हेतु प्रयुक्त होती है। ताज़ा गूदा मृदु विरेचक एवं यकृत्-द्रव्य है; संस्कारित स्वरस एक शास्त्रीय आर्तवजनन द्रव्य है, जो विलम्बित अथवा अल्प रजोदर्शन में दिया जाता है। बाह्य रूप से गूदा दग्ध तथा शोथयुक्त त्वचा पर लगाया जाता है।

दग्ध हेतु कुमारी गूदा

विश्व भर में इसका सर्वाधिक ज्ञात प्रयोग। ताज़ा गूदा छोटे दग्ध तथा सूर्य-दाह पर लगाने से शीतलता मिलती है और रोपण को सहारा मिलता है।

यकृत् हेतु कुमारी

कामला तथा मन्द यकृत्-क्रिया में आन्तरिक रूप से लिया जाता है — यह प्रधान शास्त्रीय संकेतों में से एक है।

रजोविकारों हेतु कुमारी

संस्कृत नाम का अर्थ 'कन्या' है, जो स्त्री-प्रजनन स्वास्थ्य तथा विलम्बित रजोदर्शन में इसके शास्त्रीय प्रयोग को दर्शाता है।

विबन्ध हेतु कुमारी

तिक्त क्षीर प्रबल विरेचक है — गूदे से पूर्णतः भिन्न, और सावधानी से प्रयुक्त।

त्वचा-विकारों हेतु कुमारी

विचर्चिका, युवान-पिटिका तथा शुष्क क्षुब्ध त्वचा पर लगाई जाती है, और जीर्ण कुष्ठ में आन्तरिक रूप से ली जाती है।

अम्लपित्त हेतु कुमारी

गूदा आन्तरिक रूप से लेने पर आमाशय-शोथ तथा उदर-दाह को शान्ति देता है।

केश हेतु कुमारी

रूक्षता, दारुणक तथा क्षोभ में गूदा शिर-त्वचा पर लगाया जाता है।

व्रण हेतु कुमारी

कटने तथा छिलने पर शीत, आर्द्र आवरण के रूप में लगाई जाती है।

नेत्र-विकारों हेतु कुमारी

थके, शोथयुक्त नेत्रों हेतु गूदा बन्द पलकों पर लगाया जाता है।

कुमारीआसव में कुमारी

यकृत्-विकारों तथा रजोविकारों हेतु शास्त्रीय सन्धान-कल्प का प्रधान द्रव्य।

मात्रा — कितना लें

ताज़ा गूदा/स्वरस 10–20 मिली; कुमारीआसव प्रचलित योग है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

घृतकुमारी, ग्वारपाठा का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में घृतकुमारी, ग्वारपाठा के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).

भावप्रकाश निघण्टु में घृतकुमारी, ग्वारपाठा के विषय में क्या कहा गया है?

भेदन एवं रसायन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.

आयुर्वेद में घृतकुमारी, ग्वारपाठा किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

घृतकुमारी यकृत्, कोष्ठ तथा गर्भाशय हेतु प्रयुक्त होती है। ताज़ा गूदा मृदु विरेचक एवं यकृत्-द्रव्य है; संस्कारित स्वरस एक शास्त्रीय आर्तवजनन द्रव्य है, जो विलम्बित अथवा अल्प रजोदर्शन में दिया जाता है। बाह्य रूप से गूदा दग्ध तथा शोथयुक्त त्वचा पर लगाया जाता है।

घृतकुमारी, ग्वारपाठा के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, मधुर, गुण गुरु, स्निग्ध, पिच्छिल, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः पित्त शामक. प्रभाव: भेदन, रसायन, स्त्री-रोग बल्य.

घृतकुमारी, ग्वारपाठा को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। घृतकुमारी, ग्वारपाठा का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः पित्त शामक.

घृतकुमारी, ग्वारपाठा का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: पत्र.

घृतकुमारी, ग्वारपाठा की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

ताज़ा गूदा/स्वरस 10–20 मिली; कुमारीआसव प्रचलित योग है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

घृतकुमारी, ग्वारपाठा का प्रयोग कब वर्जित है?

तिक्त क्षीर प्रबल विरेचक है — भीतर का गूदा/स्वरस मृदुतर है। गर्भावस्था तथा रजोदर्शन में बिना निर्देशन वर्जित।

घृतकुमारी, ग्वारपाठा कहाँ पाया जाता है?

घृतकुमारी भारत के शुष्क प्रदेशों तथा विश्व की उष्ण जलवायु में उगाई जाने वाली सहनशील रसीली वनस्पति है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
    भेदन एवं रसायन के रूप में वर्णित।
  • शास्त्रीय स्त्रीरोग ग्रन्थ — Kumariasava
    शास्त्रीय यकृत् एवं स्त्री-बल्य का आधार।

Modern research

  1. The Effect of Aloe Vera Clinical Trials on Prevention and Healing of Skin Wound: A Systematic Review (see source). (2019)

    A systematic review of clinical trials finding Aloe vera supports the prevention and healing of skin wounds.

    View study
  2. Efficacy of Aloe Vera Supplementation on Prediabetes and Early Non-Treated Diabetic Patients: A Systematic Review and Meta-Analysis of Randomized Controlled Trials (see source). Nutrients (2016)

    A meta-analysis of RCTs finding Aloe vera (Kumari) supplementation improved fasting glucose and HbA1c in prediabetes and early diabetes.

    View study doi:10.3390/nu8070388

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

तिक्त क्षीर प्रबल विरेचक है — भीतर का गूदा/स्वरस मृदुतर है। गर्भावस्था तथा रजोदर्शन में बिना निर्देशन वर्जित।

प्राप्ति स्थान

घृतकुमारी भारत के शुष्क प्रदेशों तथा विश्व की उष्ण जलवायु में उगाई जाने वाली सहनशील रसीली वनस्पति है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एलोवेरा गूदे और क्षीर में क्या अन्तर है?

भीतर का स्वच्छ गूदा शान्तिदायक, सुरक्षित तथा दग्ध एवं त्वचा हेतु प्रयुक्त होता है। पत्र-छिलके के ठीक नीचे का तिक्त पीला क्षीर एन्थ्राक्विनोन धारण करता है और प्रबल विरेचक है। दोनों एक ही पत्र से आते हैं किन्तु प्रभाव में पूर्णतः भिन्न हैं — अधिकांश सुरक्षा-चिन्ताएँ क्षीर से सम्बन्धित हैं।

क्या एलोवेरा गूदा खाया जा सकता है?

विधिवत् तैयार भीतरी गूदा आयुर्वेद में यकृत्-विकारों तथा अम्लपित्त हेतु आन्तरिक रूप से लिया जाता है। इसे सावधानी से बनाएँ ताकि पीला क्षीर सम्मिलित न हो, क्योंकि वह मरोड़ एवं अतिसार करता है। व्यापारिक खाद्य-श्रेणी एलो से क्षीर हटा दिया जाता है।

कुमारी की मात्रा क्या है?

ताज़ा गूदा प्रतिदिन 10–20 मिली। कुमारीआसव के रूप में 15–30 मिली समान मात्रा जल के साथ भोजनोपरान्त। क्षीर, जहाँ विरेचक के रूप में प्रयुक्त हो, मिलीग्राम मात्रा में निर्देशन के अन्तर्गत दिया जाता है।

क्या गर्भावस्था में एलोवेरा सुरक्षित है?

आन्तरिक रूप से नहीं। एलो क्षीर गर्भाशय को उत्तेजित करता है और गर्भावस्था में वर्जित है, तथा किसी भी एलो-कल्प का आन्तरिक प्रयोग टालना चाहिए। त्वचा पर गूदे का बाह्य प्रयोग सामान्यतः उचित माना जाता है।

क्या एलोवेरा अम्लपित्त में सहायक है?

भीतरी गूदा उदर-दाह तथा आमाशय-शोथ हेतु परम्परागत रूप से प्रयुक्त होता है, और शीत एवं स्निग्ध है। दीर्घकालीन अम्लपित्त की उचित जाँच आवश्यक है — वह व्रण अथवा प्रतिवाह रोग का संकेत हो सकता है जिसे चिकित्सा चाहिए।

कुमारी को हिन्दी में क्या कहते हैं?

घृतकुमारी अथवा ग्वारपाठा। संस्कृत 'कुमारी' का अर्थ कन्या है, जो वनस्पति के रूप की नहीं, अपितु स्त्री-प्रजनन स्वास्थ्य में इसके शास्त्रीय प्रयोग की ओर संकेत है।

क्या एलो के दुष्प्रभाव हैं?

गूदा अत्यन्त सुसह्य है। क्षीर मरोड़, अतिसार तथा इलेक्ट्रोलाइट-हानि करता है, और दीर्घ प्रयोग कोष्ठ-क्रिया को क्षति पहुँचाता है — इसे नित्य विरेचक के रूप में प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। मधुमेह अथवा मूत्रल औषधि लेने पर परामर्श लें।

Consult a registered BAMS Vaidya Consult Us