लौंग (Syzygium aromaticum) — flower bud
लौंग — Syzygium aromaticum. प्रयोज्य अंग: पुष्प कलिका.
चित्र: unknown / Wikimedia Commons, CC BY 4.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

लौंग लवङ्ग

Syzygium aromaticum · Myrtaceae

अन्य नाम: लौंग, लवंग

प्रयोज्य अंग: पुष्प कलिका

लवङ्ग (Syzygium aromaticum) लौंग है, एक शुष्क पुष्प-कलिका जो रसोई-मसाला होने के साथ वास्तविक स्थानिक निश्चेतक भी है। आयुर्वेद इसे दन्तशूल, उत्क्लेश, कास तथा अजीर्ण में प्रयुक्त करता है। इसमें उपस्थित यूजेनॉल ही कारण है कि दुखते दाँत पर दबाई गई लौंग वस्तुतः कार्य करती है।

लौंग — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु, तिक्त
गुणलघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण
वीर्यशीत
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और पित्त का शमन
प्रभावदीपन, antiemetic

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Syzygium aromaticum
  • प्रयोज्य अंग: पुष्प कलिका
  • दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
  • सामान्य मात्रा: कलिका चूर्ण 0.25–1 ग्राम, अथवा दन्तशूल हेतु लौंग तैल बाह्य रूप से; पाचक एवं श्वसन योगों में प्रयुक्त।

लौंग के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीलौंग
अंग्रेज़ीClove
संस्कृतलवङ्ग, देवकुसुम
बंगालीলবঙ্গ
गुजरातीલવિંગ
मराठीलवंग
तमिलகிராம்பு
तेलुगुలవంగాలు
कन्नड़ಲವಂಗ
लैटिन (वानस्पतिक)Syzygium aromaticum

परिचय

लवङ्ग (लौंग, Syzygium aromaticum) वह सुगन्धित पुष्प-कलिका है जो दन्तशूल, उत्क्लेश, कास तथा पाचन हेतु प्रयुक्त होती है। कटु होते हुए भी प्रभाव में शीत, यह एक प्रबल, सुगन्धित औषधीय मसाला है।

वर्गीकरण

मिर्टेसी (Myrtaceae) कुल का लवङ्ग दीपन तथा छर्दिघ्न (वमनहर) द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु रस, भेदक गुण एवं शीत वीर्य आमाशय को शान्त करते हैं और कफ का हरण करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

लौंग दन्तशूल में स्थानिक रूप से लगाई जाती है, और उत्क्लेश, छर्दि तथा अरुचि में आन्तरिक रूप से ली जाती है। यह कासहर द्रव्य भी है, जो पतले, जलीय कफ सहित कास में दिया जाता है। इसका तैल प्रबल उष्ण है और बूँद-मात्रा में प्रयुक्त होता है।

दन्तशूल हेतु लवङ्ग

विश्व भर में इसका सर्वाधिक ज्ञात प्रयोग। यूजेनॉल वास्तविक स्थानिक निश्चेतक एवं कीटाणुनाशक है — लौंग तैल आज भी दन्त-चिकित्सा में प्रयुक्त होता है।

उत्क्लेश हेतु लवङ्ग

एक शास्त्रीय छर्दिनिग्रहण द्रव्य, जो उत्क्लेश एवं छर्दि में चबाया अथवा चूर्ण रूप में लिया जाता है।

कास हेतु लवङ्ग

कास एवं कण्ठ-क्षोभ में धीरे-धीरे चूसी जाती है अथवा मधु के साथ ली जाती है; इसकी उष्णता अवरोध को सरल करती है।

अजीर्ण हेतु लवङ्ग

दीपन एवं पाचन, जो अरुचि तथा आध्मान में प्रयुक्त होती है।

मुखदुर्गन्ध हेतु लवङ्ग

भोजन के पश्चात् कीटाणुनाशक सुगन्धित द्रव्य के रूप में चबाई जाती है — यह प्रयोग मसाला-व्यापार जितना ही पुराना है।

हिक्का हेतु लवङ्ग

शास्त्रों में हिक्का में नामित।

कण्ठ-शूल हेतु लवङ्ग

क्वाथ में गण्डूष के रूप में, अथवा कलिका मुख में रखकर प्रयुक्त।

श्वास हेतु लवङ्ग

सितोपलादि तथा तालीसादि जैसे श्वसन योगों के भीतर श्वास में प्रयुक्त।

शिरःशूल हेतु लवङ्ग

लौंग का लेप ललाट पर लगाना शीतजन्य शिरःशूल का पारम्परिक उपाय है।

लवङ्गादि वटी में लवङ्ग

शास्त्रीय कास-वटी का प्रधान द्रव्य, जो कण्ठ एवं कास के विकारों में धीरे-धीरे चूसी जाती है।

मात्रा — कितना लें

कलिका चूर्ण 0.25–1 ग्राम, अथवा दन्तशूल हेतु लौंग तैल बाह्य रूप से; पाचक एवं श्वसन योगों में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

लौंग का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में लौंग के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (Chardi एवं कास प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (कर्पूरादि वर्ग).

चरक संहिता में लौंग के विषय में क्या कहा गया है?

उत्क्लेश एवं कास हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — Chardi एवं कास प्रकरण.

भावप्रकाश निघण्टु में लौंग के विषय में क्या कहा गया है?

दीपन एवं छर्दिघ्न (वमनहर) के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग.

आयुर्वेद में लौंग किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

लौंग दन्तशूल में स्थानिक रूप से लगाई जाती है, और उत्क्लेश, छर्दि तथा अरुचि में आन्तरिक रूप से ली जाती है। यह कासहर द्रव्य भी है, जो पतले, जलीय कफ सहित कास में दिया जाता है। इसका तैल प्रबल उष्ण है और बूँद-मात्रा में प्रयुक्त होता है।

लौंग के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, तिक्त, गुण लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: दीपन, antiemetic.

लौंग को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। लौंग का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.

लौंग का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: पुष्प कलिका.

लौंग की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

कलिका चूर्ण 0.25–1 ग्राम, अथवा दन्तशूल हेतु लौंग तैल बाह्य रूप से; पाचक एवं श्वसन योगों में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

लौंग का प्रयोग कब वर्जित है?

आहारीय मसाले के रूप में सुरक्षित; लौंग तैल प्रबल है — बाह्य रूप से सावधानी से प्रयोग करें।

लौंग कहाँ पाया जाता है?

लौंग दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी सदाबहार वृक्ष है, जो दक्षिण भारत के आर्द्र उष्णकटिबन्ध में उगाया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग
    दीपन एवं छर्दिघ्न (वमनहर) के रूप में वर्णित।
  • चरक संहिता — Chardi एवं कास प्रकरण
    उत्क्लेश एवं कास हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Clove Essential Oil (Syzygium aromaticum L. Myrtaceae): Extraction, Chemical Composition, Food Applications, and Essential Bioactivity for Human Health (see source). Nutrients (2021)

    A review of clove (Lavanga) essential oil documenting its antimicrobial, anti-inflammatory, antioxidant and analgesic (including dental) bioactivity, driven by eugenol.

    View study doi:10.3390/molecules26216387

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

आहारीय मसाले के रूप में सुरक्षित; लौंग तैल प्रबल है — बाह्य रूप से सावधानी से प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

लौंग दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी सदाबहार वृक्ष है, जो दक्षिण भारत के आर्द्र उष्णकटिबन्ध में उगाया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या लौंग सचमुच दन्तशूल में सहायक है?

हाँ — यह उन थोड़े-से पारम्परिक उपायों में है जिनके पीछे स्पष्ट भेषजगुण है। यूजेनॉल स्थानिक निश्चेतक एवं कीटाणुनाशक है, और लौंग तैल आज भी दन्त-चिकित्सा में प्रयुक्त होता है। साबुत लौंग दाँत पर दबाएँ अथवा पतला किया तैल लगाएँ, और दन्त-चिकित्सक को दिखाएँ: यह शूल शान्त करती है, कारण की चिकित्सा नहीं।

लवङ्ग की मात्रा क्या है?

कलिका चूर्ण प्रतिदिन 125–500 मिग्रा — अल्प मात्रा, क्योंकि यह प्रबल है। भोजन के पश्चात् एक-दो साबुत लौंग चबाकर। लौंग तैल बाह्य रूप से, पतला करके, और एक बार में केवल एक बूँद।

क्या लौंग तैल मसूड़ों पर लगाना सुरक्षित है?

पतला करके, और थोड़े समय के लिए। बिना पतला किया लौंग तैल मसूड़े एवं श्लेष्मकला को जला देता है और बारम्बार प्रयोग से ऊतक को क्षति पहुँचा सकता है। वाहक तैल में पतला करें, रुई पर थोड़ी मात्रा लगाएँ, और एक-दो दिन से अधिक निरन्तर प्रयोग न करें।

क्या लौंग उत्क्लेश में सहायक है?

यह शास्त्रीय छर्दिनिग्रहण द्रव्य है और एक लौंग चबाना अथवा चूर्ण मधु के साथ लेना उत्क्लेश का मानक उपाय है, जिसमें आहारीय मात्रा में गर्भावस्था भी सम्मिलित है।

लौंग किसे नहीं लेनी चाहिए?

गर्भावस्था में तथा रक्त पतला करने वाली औषधि लेने वालों को औषधीय मात्रा वर्जित रखनी चाहिए, क्योंकि यूजेनॉल रक्त-स्कन्दन को प्रभावित करता है। बालकों को लौंग तैल न दें — छोटे बालकों में इसके सेवन से यकृत्-क्षति तथा आक्षेप हुए हैं।

लवङ्ग को हिन्दी में क्या कहते हैं?

लौंग। अंग्रेज़ी में क्लोव। यह मसाला वस्तुतः शुष्क अनखुली पुष्प-कलिका है, इसीलिए उसका आकार कील जैसा होता है — क्लोव लैटिन clavus से आया है, जिसका अर्थ कील है।

क्या लौंग उष्ण है या शीत?

उष्ण (उष्ण वीर्य), अतः यह शीत, अवरुद्ध अवस्थाओं के अनुकूल है और मात्रा में पित्त तथा अम्लपित्त बढ़ा सकती है। इलायची के विपरीत यह उष्णतर सुगन्धित द्रव्यों में है।

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