चित्र: Dave Dyet http://www.shutterstone.com http://www.dyet.com / Wikimedia Commons, Public domain
शिलाजीत शिलाजतु
Asphaltum punjabianum · Mineral pitch
अन्य नाम: शिलाजतु, शिलाजीत, मिनरल पिच, एस्फाल्टम
प्रयोज्य अंग: शोधित निर्यास
शिलाजीत कोई वनस्पति नहीं, अपितु एक खनिज निर्यास है जो ग्रीष्म में हिमालय की शिलाओं से रिसता है — शताब्दियों में सम्पीडित वनस्पति-द्रव्य से बनी कृष्ण-भूरी राल। आयुर्वेद इसे रसायन मानता है और ऊर्जा, मूत्र-विकार, प्रमेह तथा पुरुष-ओज में प्रयुक्त करता है। कच्चा शिलाजीत भारी धातुएँ धारण करता है और उसका शोधन अनिवार्य है।
| रस | कटु, तिक्त, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः कफ और वात शामक |
| प्रभाव | Yogavahi रसायन, rejuvenator |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Asphaltum punjabianum
- प्रयोज्य अंग: शोधित निर्यास
- दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः कफ और वात शामक
- सामान्य मात्रा: शोधित शिलाजीत 250–500 मिग्रा उष्ण दूध या जल के साथ; सामान्य रसायन एवं सहायक द्रव्य।
शिलाजीत के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
शिलाजीत (शोधित शिलाजतु) एक पूजनीय आयुर्वेदीय कायाकल्पकारी है — खनिज-समृद्ध निर्यास जो हिमालय की शिलाओं से रिसता है। एक प्रबल रसायन एवं योगवाही, यह बल देता है, ऊर्जा भरता है और अन्य द्रव्यों को गहराई तक ले जाता है।
वर्गीकरण
महान् रसायन तथा योगवाही (सहवर्धक) द्रव्यों में वर्गीकृत, शोधित शिलाजीत फुल्विक अम्ल एवं खनिजों से समृद्ध है। इसका कटु-तिक्त-कषाय रस एवं उष्ण वीर्य कफ का हरण करते हैं, ऊर्जा देते हैं और कायाकल्प करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
शिलाजीत एक खनिज निर्यास है जो दुर्बलता, क्षीण सहनशक्ति तथा प्रमेह में रसायन के रूप में, और अन्य द्रव्यों को धातुओं में गहरे तक ले जाने वाले योगवाही के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे दूध के साथ दीर्घ क्रमों में और केवल शोधित रूप में लिया जाता है।
ऊर्जा एवं सहनशक्ति हेतु शिलाजीत
इसका सर्वाधिक ज्ञात प्रयोग — थकान एवं क्षीण सहनशक्ति में तत्काल उत्तेजक के रूप में नहीं, अपितु सप्ताहों तक लिया जाने वाला रसायन।
मूत्र-विकारों हेतु शिलाजीत
एक शास्त्रीय प्रमेह एवं मूत्ररोग द्रव्य, और उसके प्राचीनतम प्रलेखित संकेतों में से एक।
प्रमेह हेतु शिलाजीत
शास्त्रों में प्रधान प्रमेहहर द्रव्यों में नामित, जो योगों के भीतर प्रयुक्त होता है।
वाजीकरण द्रव्य के रूप में शिलाजीत
पुरुष-प्रजनन ओज हेतु प्रयुक्त, जो उसकी आधुनिक लोकप्रियता के कारणों में से एक है।
सन्धि-शूल हेतु शिलाजीत
जीर्ण वातज सन्धि-विकारों में प्रयुक्त, प्रायः गुग्गुलु के साथ।
पाण्डु हेतु शिलाजीत
इसकी लौह-मात्रा तथा पाण्डु में शास्त्रीय प्रयोग एक साथ आते हैं, और यह कुछ लौह-कल्पों में सम्मिलित रहता है।
अश्मरी हेतु शिलाजीत
छोटी अश्मरी निकालने में सहायता हेतु प्रयुक्त शास्त्रीय अश्मरी द्रव्य।
योगवाही के रूप में शिलाजीत
अपने साथ लिए गए द्रव्यों के कर्म को वहन तथा वर्धित करने वाला कहा गया है, इसीलिए यह अन्य रसायनों के साथ सम्मिलित रहता है।
बौद्धिक क्रिया हेतु शिलाजीत
स्मृति तथा मानसिक थकान हेतु एक पारम्परिक प्रयोग, जिसमें कुछ प्रारम्भिक आधुनिक रुचि भी है।
शास्त्रीय योगों में शिलाजीत
चन्द्रप्रभा वटी तथा अधिकांश शास्त्रीय मूत्र एवं रसायन योगों में उपस्थित।
मात्रा — कितना लें
शोधित शिलाजीत 250–500 मिग्रा उष्ण दूध या जल के साथ; सामान्य रसायन एवं सहायक द्रव्य। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
शिलाजीत का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में शिलाजीत के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (रसायन पाद).
चरक संहिता में शिलाजीत के विषय में क्या कहा गया है?
प्रबल खनिज रसायन के रूप में प्रशंसित। सन्दर्भ: चरक संहिता — रसायन पाद.
आयुर्वेद में शिलाजीत किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
शिलाजीत एक खनिज निर्यास है जो दुर्बलता, क्षीण सहनशक्ति तथा प्रमेह में रसायन के रूप में, और अन्य द्रव्यों को धातुओं में गहरे तक ले जाने वाले योगवाही के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे दूध के साथ दीर्घ क्रमों में और केवल शोधित रूप में लिया जाता है।
शिलाजीत के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कटु, तिक्त, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः कफ और वात शामक. प्रभाव: Yogavahi रसायन, rejuvenator.
शिलाजीत को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। शिलाजीत का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः कफ और वात शामक.
शिलाजीत का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: शोधित निर्यास.
शिलाजीत की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
शोधित शिलाजीत 250–500 मिग्रा उष्ण दूध या जल के साथ; सामान्य रसायन एवं सहायक द्रव्य। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
शिलाजीत का प्रयोग कब वर्जित है?
सदैव विश्वसनीय स्रोत का शोधित शिलाजीत ही प्रयुक्त करें। उच्च यूरिक अम्ल अथवा कुछ अवस्थाओं में बिना निर्देशन वर्जित।
शिलाजीत कहाँ पाया जाता है?
शिलाजीत कृष्ण-भूरा निर्यास है जो उष्ण ऋतु में हिमालय तथा अन्य उच्च पर्वत-श्रेणियों की शिला-दरारों से रिसता है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- चरक संहिता — रसायन पाद
प्रबल खनिज रसायन के रूप में प्रशंसित। - रस तरङ्गिणी — Shilajatu Kalpana
इसके शोधन तथा कायाकल्पकारी प्रयोग का वर्णन।
Modern research
-
The effects of Shilajit supplementation on fatigue-induced decreases in muscular strength and serum hydroxyproline levels
(see source). Journal of the International Society of Sports Nutrition (2019)
A randomized placebo-controlled trial in men reporting Shilajit (500 mg/day for 8 weeks) helped retain muscular strength against fatigue.
View study doi:10.1186/s12970-019-0270-2 -
Clinical evaluation of purified Shilajit on testosterone levels in healthy volunteers
Pandit S, et al.. Andrologia (2016)
A randomized double-blind placebo-controlled trial reporting purified Shilajit (250 mg twice daily for 90 days) significantly increased total and free testosterone and DHEAS in healthy men aged 45–55.
View study doi:10.1111/and.12482
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सदैव विश्वसनीय स्रोत का शोधित शिलाजीत ही प्रयुक्त करें। उच्च यूरिक अम्ल अथवा कुछ अवस्थाओं में बिना निर्देशन वर्जित।
प्राप्ति स्थान
शिलाजीत कृष्ण-भूरा निर्यास है जो उष्ण ऋतु में हिमालय तथा अन्य उच्च पर्वत-श्रेणियों की शिला-दरारों से रिसता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिलाजीत क्या है?
एक खनिज निर्यास जो ग्रीष्म की उष्णता में हिमालय की शिलाओं से रिसता है — शताब्दियों में सम्पीडित वनस्पति-द्रव्य से बनी कृष्ण-भूरी राल। यह वनस्पति नहीं है, और आयुर्वेद इसे ओषधि-द्रव्यों के स्थान पर खनिज द्रव्यों में गिनता है।
शिलाजीत की मात्रा क्या है?
शोधित राल प्रतिदिन 250–500 मिग्रा, प्रायः उष्ण दूध के साथ। यह अल्प मात्रा है और उसकी शक्ति को दर्शाती है — इसे ओषधि-चूर्ण की भाँति ग्राम में नहीं मापा जाता।
क्या कच्चा शिलाजीत सुरक्षित है?
नहीं। कच्चा शिलाजीत भारी धातुएँ, माइकोटॉक्सिन तथा मुक्त मूलक धारण करता है, और प्रयोग से पूर्व उसे शास्त्रीय शोधन से गुज़रना चाहिए। केवल उस अनुज्ञप्त निर्माता से शोधित राल लें जो भारी-धातु परीक्षण प्रकाशित करता हो।
असली शिलाजीत की पहचान कैसे करें?
असली शोधित राल उष्ण जल या दूध में पूर्णतः घुल जाती है, कोई कण शेष नहीं रहते, वह चिपचिपी होती है और ऊष्मा से मृदु हो जाती है, तथा उसकी विशिष्ट डामर-सदृश गन्ध होती है। जो चूर्ण या कैप्सूल घुलते नहीं, अथवा जो द्रव्य अत्यन्त सस्ता बिकता हो, उस पर सन्देह उचित है।
क्या शिलाजीत से टेस्टोस्टेरोन बढ़ता है?
यह शास्त्रोक्त वाजीकरण द्रव्य है और कुछ प्रारम्भिक आधुनिक कार्य भी है, किन्तु प्रमाण सीमित हैं। उसके बेहतर स्थापित शास्त्रीय प्रयोग ऊर्जा, मूत्र-विकार तथा प्रमेह हैं।
शिलाजीत किसे नहीं लेना चाहिए?
गर्भावस्था एवं स्तनपान में, वातरक्त तथा उच्च यूरिक अम्ल में, हीमोक्रोमैटोसिस अथवा लौह-आधिक्य में, और सक्रिय अश्मरी होने पर वर्जित। मधुमेह की औषधि लेने पर चिकित्सकीय परामर्श लें।
शिलाजीत का प्रभाव दिखने में कितना समय लगता है?
यह रसायन है, अतः आठ से बारह सप्ताह का नियमित सेवन। यह उत्तेजक नहीं है और तत्काल प्रभाव नहीं देगा — जो कुछ ऐसा वचन देता हो, वह किसी और वस्तु का वर्णन कर रहा है।