थूहर, सेहुंड (Euphorbia neriifolia) — latex
थूहर, सेहुंड — Euphorbia neriifolia. प्रयोज्य अंग: क्षीर.
चित्र: Dinesh Valke from Thane, India / Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

थूहर, सेहुंड स्नुही

Euphorbia neriifolia · Euphorbiaceae

अन्य नाम: थूहर, सेहुण्ड, सेहुण्ड का दूध, सहुण्ड

प्रयोज्य अंग: क्षीर

स्नुही (Euphorbia neriifolia) थूहर है, एक रसीली वनस्पति जिसका दुग्ध-क्षीर प्रबल शास्त्रीय विरेचक है। यह उपविष — उप-विषों — में वर्गीकृत है और प्रयोग से पूर्व शोधन अपेक्षित करती है। क्षीर त्वचा एवं नेत्रों के लिए तीव्र क्षोभक है, और यह स्वच्छन्द प्रयोग का द्रव्य नहीं है।

थूहर, सेहुंड — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु
गुणलघु, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावभेदन (विरेचक), external use

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Euphorbia neriifolia
  • प्रयोज्य अंग: क्षीर
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: शोधित क्षीर/कल्प सूक्ष्म निगरानीयुक्त मात्रा में; शोथ हेतु बाह्य लेप।

थूहर, सेहुंड के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीथूहर, सेहुंड
अंग्रेज़ीIndian Spurge Tree
संस्कृतस्नुही, वज्री
बंगालीমনসা
गुजरातीથોર
मराठीनिवडुंग
तमिलஇலைக்கள்ளி
तेलुगुఆకుజెముడు
कन्नड़ಎಲೆ ಕಳ್ಳಿ
लैटिन (वानस्पतिक)Euphorbia neriifolia

परिचय

स्नुही (Euphorbia neriifolia) कैक्टस-सदृश वनस्पति है जिसका दुग्ध-क्षीर एक प्रबल शास्त्रीय विरेचक तथा बाह्य औषधि है। तीक्ष्ण एवं उष्ण होकर यह — उचित सावधानी सहित — हठी विबन्ध, शोथ तथा त्वचा में प्रयुक्त होती है।

वर्गीकरण

यूफ़ोर्बिएसी (Euphorbiaceae) कुल की स्नुही भेदन (विरेचक) तथा कफ-वात हर द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु रस, तीक्ष्ण गुण एवं उष्ण वीर्य दोषों को गतिशील करते हैं और त्वचा पर कार्य करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

स्नुही क्षीर एक तीव्र विरेचक है जो केवल शोधन के पश्चात् तथा केवल शास्त्रीय कल्पों में, हठी विबन्ध एवं उदर-शोथ में प्रयुक्त होता है। बाह्य रूप से क्षीर मस्सों, अर्श तथा हठी वृद्धियों पर लगाया जाता है। यह दाहक द्रव्य है और इसकी कभी स्वयं-चिकित्सा नहीं की जाती।

विरेचक के रूप में स्नुही

एक तीव्र विरेचन द्रव्य जो शास्त्रीय परम्परा में वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ मृदुतर विरेचक विफल रहे हों, सदैव अल्प मात्रा में तथा शोधन के पश्चात्।

उदर-शोथ हेतु स्नुही

उदर-रोग में प्रयुक्त, जहाँ उदरस्थ जल एवं विस्तार हेतु विरेचन ही शास्त्रोक्त मार्ग है।

अर्श हेतु स्नुही

अर्श में स्थानिक रूप से लगाई जाती है, तथा योगों के भीतर आन्तरिक रूप से भी प्रयुक्त होती है।

त्वचा-रोग हेतु स्नुही

जीर्ण त्वचा-विकारों तथा मस्सों में बाह्य रूप से प्रयुक्त; उसका क्षोभक कर्म ही क्रियाविधि है।

क्षार के रूप में स्नुही

क्षीर स्थानिक प्रयोग हेतु शास्त्रीय दाहक क्षारों के निर्माण में प्रयुक्त होता है।

कृमि हेतु स्नुही

एक कृमिघ्न द्रव्य, जो विरेचन द्वारा परजीवियों को बाहर निकालता है।

प्लीहा-वृद्धि हेतु स्नुही

शास्त्रों में प्लीहा-रोग में नामित, जो योगों के भीतर प्रयुक्त होती है।

श्वास हेतु स्नुही

कुछ ग्रन्थों में एक शास्त्रीय संकेत, जो अत्यल्प शोधित मात्रा में प्रयुक्त होता है।

जीवित बाड़ के रूप में स्नुही

ग्रामीण भारत भर में सीमा-बाड़ के रूप में लगाई जाती है — यह व्यावहारिक प्रयोग है, औषधीय नहीं, किन्तु इसीलिए यह इतनी व्यापक रूप से उपलब्ध है।

शास्त्रीय योगों में स्नुही

स्नुही क्षार तथा अनेक शास्त्रीय विरेचक एवं बाह्य कल्पों में उपस्थित।

मात्रा — कितना लें

शोधित क्षीर/कल्प सूक्ष्म निगरानीयुक्त मात्रा में; शोथ हेतु बाह्य लेप। कठोर निगरानी के अन्तर्गत।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

थूहर, सेहुंड का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में थूहर, सेहुंड के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: शार्ङ्गधर संहिता (Bhedana Kalpana).

शार्ङ्गधर संहिता में थूहर, सेहुंड के विषय में क्या कहा गया है?

विरेचक द्रव्यों में वर्णित। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Bhedana Kalpana.

आयुर्वेद में थूहर, सेहुंड किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

स्नुही क्षीर एक तीव्र विरेचक है जो केवल शोधन के पश्चात् तथा केवल शास्त्रीय कल्पों में, हठी विबन्ध एवं उदर-शोथ में प्रयुक्त होता है। बाह्य रूप से क्षीर मस्सों, अर्श तथा हठी वृद्धियों पर लगाया जाता है। यह दाहक द्रव्य है और इसकी कभी स्वयं-चिकित्सा नहीं की जाती।

थूहर, सेहुंड के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, गुण लघु, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: भेदन (विरेचक), external use.

थूहर, सेहुंड को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। थूहर, सेहुंड का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

थूहर, सेहुंड का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: क्षीर.

थूहर, सेहुंड की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

शोधित क्षीर/कल्प सूक्ष्म निगरानीयुक्त मात्रा में; शोथ हेतु बाह्य लेप। कठोर निगरानी के अन्तर्गत। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

थूहर, सेहुंड का प्रयोग कब वर्जित है?

क्षीर क्षोभक एवं प्रबल है — केवल शोधित रूप में तथा निगरानीयुक्त मात्रा में, मुख्यतः बाह्य रूप से प्रयुक्त। नेत्रों तथा बालकों से दूर रखें।

थूहर, सेहुंड कहाँ पाया जाता है?

स्नुही एक रसीला, कैक्टस-सदृश क्षुप है जो भारत के शुष्क प्रदेशों में बाड़ के रूप में उगाया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • शार्ङ्गधर संहिता — Bhedana Kalpana
    विरेचक द्रव्यों में वर्णित।
  • रस ग्रन्थ — Snuhi Kshara
    शास्त्रीय क्षार-कल्पों में प्रयुक्त।

Modern research

  1. Euphorbia neriifolia L.: Review on botany, ethnomedicinal uses, phytochemistry and biological activities (see source). Journal of Traditional and Complementary Medicine (2017)

    A review of Euphorbia neriifolia (Snuhi) documenting its anti-inflammatory, wound-healing, purgative and antimicrobial activities — a semi-toxic (Upavisha) plant used under supervision.

    View study

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

क्षीर क्षोभक एवं प्रबल है — केवल शोधित रूप में तथा निगरानीयुक्त मात्रा में, मुख्यतः बाह्य रूप से प्रयुक्त। नेत्रों तथा बालकों से दूर रखें।

प्राप्ति स्थान

स्नुही एक रसीला, कैक्टस-सदृश क्षुप है जो भारत के शुष्क प्रदेशों में बाड़ के रूप में उगाया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या स्नुही संकटपूर्ण है?

हाँ, असावधानी से सँभालने पर। क्षीर तीव्र क्षोभक है — यह त्वचा पर फफोले लाता है और नेत्र को गम्भीर क्षति, जिसमें स्वच्छपटल-क्षति तथा अस्थायी अन्धता सम्मिलित है, कर सकता है। आयुर्वेद इसे उपविषों में गिनता है और किसी भी आन्तरिक प्रयोग से पूर्व शोधन अपेक्षित करता है।

स्नुही किसमें प्रयुक्त होती है?

शास्त्रीय परम्परा में तीव्र विरेचक के रूप में, उदर-शोथ, अर्श, कृमि तथा प्लीहा-वृद्धि में। बाह्य रूप से यह जीर्ण त्वचा-विकारों एवं मस्सों में प्रयुक्त होती है। यह केवल योगों के भीतर अल्प शोधित मात्रा में दी जाती है।

यदि स्नुही का क्षीर नेत्र में चला जाए तो क्या करें?

तत्काल प्रचुर स्वच्छ जल से प्रक्षालन करें और अस्पताल जाएँ। Euphorbia का क्षीर गम्भीर नेत्र-क्षति करता है और रासायनिक स्वच्छपटल-शोथ का मान्य कारण है। यह देखने के लिए प्रतीक्षा न करें कि स्वयं ठीक हो जाएगा।

स्नुही की मात्रा क्या है?

शोधित क्षीर बूँदों में, अथवा किसी शास्त्रीय योग के भीतर निर्दिष्ट मात्रा, केवल चिकित्सक के निर्देशानुसार। यह किसी भी परिस्थिति में घर पर मात्रा निर्धारित करने का द्रव्य नहीं है।

स्नुही को हिन्दी में क्या कहते हैं?

थूहर अथवा सेहुण्ड। अंग्रेज़ी में इण्डियन स्पर्ज ट्री अथवा मिल्क हेज। ग्रामीण भारत भर में यह जीवित सीमा-बाड़ के रूप में व्यापक रूप से लगाई जाती है।

स्नुही किसे नहीं लेनी चाहिए?

चिकित्सक के नुस्खे के बाहर लगभग सभी को। गर्भावस्था, बालकों, वृद्ध एवं दुर्बल व्यक्तियों, तथा किसी भी निर्जलित अवस्था या आन्त्र-अवरोध में पूर्णतः वर्जित। अशोधित द्रव्य कभी प्रयुक्त न करें।

आयुर्वेद विषैली वनस्पति का प्रयोग क्यों करता है?

शोधन तथा सटीक मात्रा-निर्धारण विष को औषधि बना देते हैं — यही सिद्धान्त अनेक प्रचलित औषधियों के पीछे भी है। आयुर्वेद इसे शोधन प्रक्रिया में औपचारिक रूप देता है, और उसे धारण करने वाले कल्प घर पर नहीं, अपितु अनुज्ञप्ति के अन्तर्गत बनते हैं।

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