शास्त्रीय योग

त्रिकटु त्रिकटु

अन्य नाम: त्रिकटु, तीन कटु द्रव्य

प्रयोज्य अंग: तीन कटु द्रव्य (त्रिकटु)

त्रिकटु कोई एक ओषधि नहीं, अपितु तीन कटु द्रव्यों का शास्त्रीय संयोग है: सोंठ, मरिच तथा पिप्पली, समान भाग में। यह मन्दाग्नि हेतु आयुर्वेद का मानक योग है, और इसका दूसरा कार्य — अपने साथ जो भी द्रव्य हो उसका अवशोषण बढ़ाना — यही कारण है कि यह इतने योगों में आता है।

त्रिकटु — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावDeepana-Pachana, Yogavahi (the three pungents)

सार-संक्षेप

  • प्रयोज्य अंग: तीन कटु द्रव्य (त्रिकटु)
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: चूर्ण 0.5–2 ग्राम मधु के साथ भोजन से पूर्व अथवा पश्चात्; अनेक योगों में सामान्य सहायक द्रव्य।

त्रिकटु के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीत्रिकटु
अंग्रेज़ीThe Three Pungents
संस्कृतत्रिकटु, त्र्यूषण
लैटिन (वानस्पतिक)Trikatu (ginger–pepper–long-pepper compound)

परिचय

त्रिकटु ("तीन कटु") आयुर्वेद की उत्कृष्ट पाचन-चयापचय त्रयी है — सोंठ, मरिच तथा पिप्पली — जो अग्नि प्रदीप्त करती है, कफ का हरण करती है और अन्य द्रव्यों का अवशोषण बढ़ाती है।

घटक द्रव्य

वर्गीकरण

त्रिकटु शुण्ठी (सोंठ), मरिच (काली मिर्च) तथा पिप्पली (लम्बी मिर्च) का समान संयोग है। कटु, लघु एवं उष्ण होकर यह दीपन-पाचन तथा योगवाही है — यह अन्य औषधियों के कर्म को वहन एवं वर्धित करती है।

उपयोग एवं लाभ

त्रिकटु तीन कटु द्रव्य हैं — सोंठ, मरिच तथा पिप्पली — जो एक साथ लिए जाते हैं। यह अग्निमान्द्य तथा गौरव एवं अवरोध सहित कफज अवस्थाओं का शास्त्रीय द्रव्य है, और अन्य योगों में योगवाही के रूप में मिलाई जाती है ताकि उनका अवशोषण सुधरे और वे गहराई तक पहुँचें।

मन्दाग्नि हेतु त्रिकटु

शास्त्रीय दीपन संयोग, जो वहाँ भोजन से पूर्व लिया जाता है जहाँ अरुचि हो और भोजन गौरव करता हो।

जैव-उपलब्धता वर्धक के रूप में त्रिकटु

योग-निर्माण में इसकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका। पाइपरीन अन्य द्रव्यों का अवशोषण पर्याप्त रूप से बढ़ाता है, इसीलिए त्रिकटु सम्पूर्ण भैषज्य-संग्रह में आती है।

कफज अवस्थाओं हेतु त्रिकटु

उष्ण एवं रूक्ष होने से अवरोध, गौरव तथा मान्द्य में व्यापक रूप से प्रयुक्त।

कास एवं अवरोध हेतु त्रिकटु

घने श्लेष्मा सहित कफज कास में मधु के साथ प्रयुक्त।

स्थौल्य हेतु त्रिकटु

मेदोहर द्रव्यों में नामित तथा मेदोहर गुग्गुलु का एक घटक।

उच्च कोलेस्ट्रॉल हेतु त्रिकटु

शास्त्रीय मेद-योगों में गुग्गुलु के साथ मेदोरोग में प्रयुक्त।

आध्मान हेतु त्रिकटु

इसकी कटुता अवरुद्ध वायु को गतिशील करती है और उदर-विस्तार का शमन करती है।

आम हेतु त्रिकटु

एक आमपाचन संयोग, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ अपचित अवशेष गौरव तथा जिह्वा-लेप का मूल हो।

श्वास हेतु त्रिकटु

श्वास में वहाँ प्रयुक्त जहाँ रूक्षता के स्थान पर अवरोध चित्र हो।

शास्त्रीय योगों में त्रिकटु

आयुर्वेदीय भैषज्य-संग्रह के अत्यन्त बड़े भाग में उपस्थित, अपने कर्म हेतु भी और अन्य द्रव्यों को वहन करने हेतु भी।

मात्रा — कितना लें

चूर्ण 0.5–2 ग्राम मधु के साथ भोजन से पूर्व अथवा पश्चात्; अनेक योगों में सामान्य सहायक द्रव्य। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

त्रिकटु का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में त्रिकटु के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (Deepana-Pachana प्रकरण); शार्ङ्गधर संहिता (Churna Kalpana).

चरक संहिता में त्रिकटु के विषय में क्या कहा गया है?

तीन कटु द्रव्य पाचन एवं कफ-हर वर्गों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — Deepana-Pachana प्रकरण.

शार्ङ्गधर संहिता में त्रिकटु के विषय में क्या कहा गया है?

त्रिकटु तथा उसके पाचन-चयापचय प्रयोग का वर्णन। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Churna Kalpana.

आयुर्वेद में त्रिकटु किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

त्रिकटु तीन कटु द्रव्य हैं — सोंठ, मरिच तथा पिप्पली — जो एक साथ लिए जाते हैं। यह अग्निमान्द्य तथा गौरव एवं अवरोध सहित कफज अवस्थाओं का शास्त्रीय द्रव्य है, और अन्य योगों में योगवाही के रूप में मिलाई जाती है ताकि उनका अवशोषण सुधरे और वे गहराई तक पहुँचें।

त्रिकटु के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Deepana-Pachana, Yogavahi (the three pungents).

त्रिकटु को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। त्रिकटु का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

त्रिकटु का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: तीन कटु द्रव्य (त्रिकटु).

त्रिकटु की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

चूर्ण 0.5–2 ग्राम मधु के साथ भोजन से पूर्व अथवा पश्चात्; अनेक योगों में सामान्य सहायक द्रव्य। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

त्रिकटु का प्रयोग कब वर्जित है?

उष्ण — उच्च पित्त, अम्लता अथवा व्रण में संयम से प्रयोग करें। अल्प मात्रा ही प्रभावी है।

त्रिकटु कहाँ पाया जाता है?

इसके तीनों घटक भारत भर में उगाए जाते हैं — अदरक तथा पिप्पली उष्णतर प्रदेशों में, काली मिर्च पश्चिमी घाट में।

त्रिकटु किन द्रव्यों से बनता है?

घटक द्रव्य: Shunthi, Maricha, Pippali.

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • शार्ङ्गधर संहिता — Churna Kalpana
    त्रिकटु तथा उसके पाचन-चयापचय प्रयोग का वर्णन।
  • चरक संहिता — Deepana-Pachana प्रकरण
    तीन कटु द्रव्य पाचन एवं कफ-हर वर्गों में उल्लिखित।

Modern research

  1. Influence of piperine on the pharmacokinetics of curcumin in animals and human volunteers Shoba G, et al.. Planta Medica (1998)

    A landmark study showing piperine — the key active of two of Trikatu's three herbs — increased curcumin bioavailability by up to 2000% in humans, illustrating Trikatu's Yogavahi (bioenhancer) role.

    View study doi:10.1055/s-2006-957450
  2. An Ayurvedic formulation "Trikatu" and its constituents (see source). Journal of Ethnopharmacology (1992)

    A study of the classical Trikatu formulation (black pepper, long pepper, dry ginger) and its constituents as bioavailability enhancers, an action mediated chiefly by piperine.

    View study

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

उष्ण — उच्च पित्त, अम्लता अथवा व्रण में संयम से प्रयोग करें। अल्प मात्रा ही प्रभावी है।

प्राप्ति स्थान

इसके तीनों घटक भारत भर में उगाए जाते हैं — अदरक तथा पिप्पली उष्णतर प्रदेशों में, काली मिर्च पश्चिमी घाट में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

त्रिकटु क्या है?

समान भाग में तीन कटु द्रव्यों का शास्त्रीय संयोग: सोंठ (शुण्ठी), काली मिर्च (मरिच) तथा लम्बी मिर्च (पिप्पली)। यह पाचन प्रदीप्त करती है, कफ का हरण करती है, और अपने साथ लिए गए अन्य द्रव्यों का अवशोषण बढ़ाती है।

त्रिकटु की मात्रा क्या है?

भोजन से पूर्व 1–2 ग्राम, प्रायः मधु अथवा उष्ण जल के साथ। यह प्रबल एवं उष्ण है, अतः इसे अनिश्चित काल के स्थान पर कुछ सप्ताहों के क्रमों में लिया जाता है।

त्रिकटु किसे नहीं लेनी चाहिए?

अम्लपित्त, परिणामशूल, आमाशय-शोथ अथवा शोथयुक्त आन्त्र-रोग वाले किसी भी व्यक्ति को — यह प्रबल उष्ण है और पित्त बढ़ाती है। गर्भावस्था में वर्जित। जो पहले से ही उष्ण प्रकृति का हो, उसके लिए यह अनुकूल नहीं।

इतने आयुर्वेदीय योगों में त्रिकटु क्यों रहती है?

दो कारण। यह पाचन प्रदीप्त करती है, और आयुर्वेद मानता है कि दुर्बल अग्नि पर कोई भी द्रव्य भली भाँति कार्य नहीं करता। तथा पाइपरीन अन्य घटकों का अवशोषण पर्याप्त रूप से बढ़ाता है — अतः त्रिकटु शेष योग को अधिक कार्यशील बनाती है।

क्या त्रिकटु प्रतिदिन ली जा सकती है?

कुछ सप्ताहों के क्रमों में, हाँ। प्रबल कटु द्रव्यों का सतत दीर्घ प्रयोग आन्त्र-आवरण को रूक्ष करता है और पित्त बढ़ाता है, अतः शास्त्रीय परम्परा इसे तब तक प्रयुक्त करती है जब तक पाचन स्थिर न हो जाए, फिर रोक देती है।

क्या त्रिकटु भार घटाने में सहायक है?

यह मेदोहर द्रव्यों में नामित है और मेदोहर गुग्गुलु में आती है। यह पाचन एवं चयापचय सुधार कर प्रक्रिया को सहारा देती है; आहार तथा क्रिया-परिवर्तन के बिना यह मेद-क्षय नहीं करती।

क्या त्रिकटु औषधियों के साथ प्रतिक्रिया करती है?

हाँ, और यह अपने चिकित्सक को बताने योग्य है। पाइपरीन अनेक औषधियों का अवशोषण बढ़ाता है, जिससे साथ ली गई औषधियों का रक्त-स्तर ऊँचा हो सकता है। इसे निर्धारित औषधियों से लगभग दो घण्टे का अन्तर देकर लें।

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