वरुण, बरना (Crataeva nurvala) — bark
वरुण, बरना — Crataeva nurvala. प्रयोज्य अंग: त्वक्.
चित्र: Dinesh Valke from Thane, India / Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

वरुण, बरना वरुण

Crataeva nurvala · Capparaceae

अन्य नाम: वरुण, बरना, वरुण की छाल, बरुण छाल

प्रयोज्य अंग: त्वक्

वरुण (Crataeva nurvala) त्रिपर्ण कैपर है, जिसकी छाल मूत्राश्मरी हेतु आयुर्वेद का विशिष्ट द्रव्य है। शास्त्र इसे अश्मरी तथा मूत्रकृच्छ्र में नामित करते हैं, और यह आयुर्वेदीय मूत्र-चिकित्सा की प्रधान ओषधि बनी हुई है, जो गोक्षुर एवं पाषाणभेद के साथ प्रयुक्त होती है।

वरुण, बरना — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कषाय
गुणलघु, रूक्ष
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावAshmarihara (anti-stone), लेखन

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Crataeva nurvala
  • प्रयोज्य अंग: त्वक्
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: छाल-चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; मूत्राश्मरी तथा प्रोस्टेट योगों में प्रयुक्त।

वरुण, बरना के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीवरुण, बरना
अंग्रेज़ीThree-leaved Caper
संस्कृतवरुण, सेतु
बंगालीবরুণ
गुजरातीવાયવરણો
मराठीवायवर्ण
तमिलமாவிலங்கம்
तेलुगुఉలిమిడి
कन्नड़ನೀರ್ವಾಳ
लैटिन (वानस्पतिक)Crataeva nurvala

परिचय

वरुण (Crataeva nurvala) मूत्राश्मरी हेतु आयुर्वेद की प्रधान ओषधि है। इसकी छाल अश्मरी को तोड़ने एवं बहाने में सहायता करती है तथा स्वस्थ मूत्र-प्रवाह एवं प्रोस्टेट-सुख को सहारा देती है।

वर्गीकरण

कैपरेसी (Capparaceae) कुल की वरुण अश्मरीहर तथा लेखन द्रव्यों में प्रधान है। इसका तिक्त-कषाय रस तथा उष्ण वीर्य कफ का हरण करते हैं और अश्मरी-जनक निक्षेपों को छीलते हैं।

उपयोग एवं लाभ

वरुण शास्त्रीय अश्मरीघ्न द्रव्य है — वही जो मूत्राश्मरी तथा मूत्र-सिकता में दिया जाता है। यह कष्ट-मूत्रता, प्रोस्टेट-वृद्धि तथा मूत्र-अवरोध में प्रयुक्त होती है, और कांचनार गुग्गुलु में आती है, जहाँ यह ग्रन्थि-शोथ के शोधन को सहारा देती है।

मूत्राश्मरी हेतु वरुण

इसका परिभाषक संकेत। शास्त्रीय अश्मरी द्रव्य, जो छोटी अश्मरी निकालने तथा पुनरावृत्ति घटाने में सहायता हेतु प्रयुक्त होता है।

कष्ट-मूत्रता हेतु वरुण

मूत्रकृच्छ्र में प्रयुक्त, जहाँ प्रवाह मन्द, शूलयुक्त अथवा अपूर्ण हो।

प्रोस्टेट-वृद्धि हेतु वरुण

वृद्ध पुरुषों में प्रोस्टेट-वृद्धि के मूत्र-लक्षणों हेतु व्यापक रूप से प्रयुक्त।

मूत्र-संक्रमण हेतु वरुण

दाह सहित मूत्राशय-शोथ में प्रयुक्त, प्रायः गोक्षुर एवं चन्दन के साथ।

मूत्राशय-क्रिया हेतु वरुण

पारम्परिक रूप से वहाँ प्रयुक्त जहाँ मूत्राशय अपूर्ण रूप से रिक्त होता हो।

शोथ हेतु वरुण

इसका मूत्रल कर्म जल-संचय तक विस्तृत है, जो पुनर्नवा के साथ प्रयुक्त होता है।

उदर-गुल्म हेतु वरुण

शास्त्रों में गुल्म तथा ग्रन्थि में नामित, जो योगों के भीतर प्रयुक्त होती है।

कृमि हेतु वरुण

एक कृमिघ्न द्रव्य, एक गौण शास्त्रीय संकेत।

पाचन हेतु वरुण

अरुचि में प्रयुक्त एक दीपन द्रव्य, इसीलिए दीर्घ क्रमों के बावजूद यह गुरु नहीं पड़ती।

वरुणादि क्वाथ में वरुण

शास्त्रीय मूत्र-क्वाथ की प्रधान ओषधि, तथा अधिकांश आयुर्वेदीय अश्मरी-योगों में उपस्थित।

मात्रा — कितना लें

छाल-चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; मूत्राश्मरी तथा प्रोस्टेट योगों में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

वरुण, बरना का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में वरुण, बरना के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (मूत्रकृच्छ्र एवं Ashmari); भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग).

सुश्रुत संहिता में वरुण, बरना के विषय में क्या कहा गया है?

मूत्राश्मरी हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — मूत्रकृच्छ्र एवं Ashmari.

भावप्रकाश निघण्टु में वरुण, बरना के विषय में क्या कहा गया है?

अश्मरीहर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग.

आयुर्वेद में वरुण, बरना किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

वरुण शास्त्रीय अश्मरीघ्न द्रव्य है — वही जो मूत्राश्मरी तथा मूत्र-सिकता में दिया जाता है। यह कष्ट-मूत्रता, प्रोस्टेट-वृद्धि तथा मूत्र-अवरोध में प्रयुक्त होती है, और कांचनार गुग्गुलु में आती है, जहाँ यह ग्रन्थि-शोथ के शोधन को सहारा देती है।

वरुण, बरना के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Ashmarihara (anti-stone), लेखन.

वरुण, बरना को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। वरुण, बरना का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

वरुण, बरना का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: त्वक्.

वरुण, बरना की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

छाल-चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; मूत्राश्मरी तथा प्रोस्टेट योगों में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

वरुण, बरना का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रीय मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था अथवा गम्भीर वृक्क-रोग में निर्देशन में प्रयोग करें।

वरुण, बरना कहाँ पाया जाता है?

वरुण भारत भर की नदी-तटों तथा आर्द्र भूमि का मध्यम वृक्ष है, जिसकी छाल औषधि हेतु एकत्र की जाती है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग
    अश्मरीहर के रूप में वर्णित।
  • सुश्रुत संहिता — मूत्रकृच्छ्र एवं Ashmari
    मूत्राश्मरी हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Urolithic property of Varuna (Crataeva nurvala): An experimental study (see source). AYU (2010)

    An experimental study reporting Crataeva nurvala (Varuna) prevented formation of urinary calculi and reduced preformed stone size through anti-lithogenic and diuretic action.

    View study doi:10.4103/0974-8520.77161

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रीय मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था अथवा गम्भीर वृक्क-रोग में निर्देशन में प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

वरुण भारत भर की नदी-तटों तथा आर्द्र भूमि का मध्यम वृक्ष है, जिसकी छाल औषधि हेतु एकत्र की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वरुण किसमें प्रयुक्त होती है?

सर्वोपरि मूत्राश्मरी में — यह शास्त्रीय अश्मरी द्रव्य है — तथा कष्ट-मूत्रता, प्रोस्टेट-वृद्धि, मूत्र-संक्रमण एवं शोथ में भी। यह आयुर्वेदीय मूत्र-चिकित्सा की प्रधान ओषधि है।

क्या वरुण मूत्राश्मरी को घोल देती है?

यह स्थापित अश्मरी को घोलने के स्थान पर छोटी अश्मरी निकालने तथा पुनरावृत्ति घटाने में सहायता हेतु प्रयुक्त होती है। तीव्र शूल, ज्वर अथवा अवरुद्ध प्रवाह उत्पन्न करने वाली अश्मरी मूत्र-शल्य आपात है और उसे किसी ओषधि की नहीं, तत्काल चिकित्सकीय सेवा की आवश्यकता है।

वरुण की मात्रा क्या है?

छाल-चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। अश्मरी-निवारण हेतु इसे मासों तक लिया जाता है, और प्रायः गोक्षुर एवं पाषाणभेद के साथ संयुक्त किया जाता है।

क्या वरुण प्रोस्टेट-लक्षणों में सहायक है?

प्रोस्टेट-वृद्धि के मूत्र-लक्षणों — आरम्भ में विलम्ब, दुर्बल प्रवाह, अपूर्ण रिक्तीकरण — हेतु यह व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है, प्रायः गोक्षुर के साथ। मूत्र-लक्षणों का कारण मान लेने के स्थान पर प्रोस्टेट का उचित परीक्षण कराएँ।

वरुण को हिन्दी में क्या कहते हैं?

बरना अथवा बरुण। अंग्रेज़ी में थ्री-लीव्ड कैपर अथवा गार्लिक पियर ट्री। वानस्पतिक नाम Crataeva nurvala कभी-कभी Crataeva religiosa दिया जाता है।

क्या वरुण के दुष्प्रभाव हैं?

शास्त्रीय मात्रा में सुसह्य। वृक्क-रोग हो अथवा मूत्रल औषधि लेते हों तो चिकित्सकीय परामर्श लें। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें। अश्मरी हेतु प्रयुक्त किसी भी द्रव्य की भाँति, इसे लेते समय जल-सेवन बढ़ाएँ।

अश्मरी-निवारण हेतु वरुण कितने समय तक लेनी चाहिए?

तीन से छह मास शास्त्रीय क्रम है, साथ ही पर्याप्त जल-सेवन तथा आहार-परिवर्तन। पुनरावर्ती अश्मरी का कारण खोजना आवश्यक है — कुछ प्रकारों को ओषधीय उपक्रम के स्थान पर विशिष्ट चिकित्सकीय प्रबन्धन चाहिए।

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