चित्र: unknown / Wikimedia Commons, CC BY 4.0
अजवाइन यवानी
Trachyspermum ammi · Apiaceae
अन्य नाम: अजवायन, यवानी, अजवाइन, कैरम
प्रयोज्य अंग: फल
यवानी (Trachyspermum ammi) अजवायन है, भारतीय रसोई के सर्वाधिक तीक्ष्ण पाचक द्रव्यों में से एक। यह आध्मान, उदर-शूल, अजीर्ण तथा कास में प्रयुक्त होती है, और उसकी थाइमॉल-मात्रा उसे वास्तविक सूक्ष्मजीव-रोधी एवं आक्षेप-रोधी कर्म देती है।
| रस | कटु, तिक्त |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | दीपन, पाचन, शूलहर |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Trachyspermum ammi
- प्रयोज्य अंग: फल
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: बीज 0.5–2 ग्राम, वायु हेतु प्रायः चुटकी भर सैन्धव सहित उष्ण जल में।
अजवाइन के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
यवानी (अजवायन, Trachyspermum ammi) एक तीक्ष्ण, उष्ण बीज है जो पाचन तथा वायु हेतु प्रसिद्ध है। प्रबल एवं भेदक होकर यह आयुर्वेदीय रसोई का शास्त्रीय दीपन-पाचन तथा आक्षेप-रोधी द्रव्य है।
वर्गीकरण
एपिएसी (Apiaceae) कुल की यवानी दीपन-पाचन तथा वातानुलोमन द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु-तिक्त रस, तीक्ष्ण गुण तथा उष्ण वीर्य अग्नि प्रज्वलित करते हैं और अवरुद्ध वात का हरण करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
अजवायन एक प्रबल उष्ण पाचक है जो वायु, उदर-शूल तथा उदर-आक्षेप में, और उर के शीतजन्य अवरोध में प्रयुक्त होती है। यह शूल सहित अजीर्ण का गृह-द्रव्य है, जो उष्ण जल अथवा सैन्धव के साथ ली जाती है, और प्रसवोपरान्त पाचन हेतु स्तनपान कराती माताओं को दी जाती है।
आध्मान हेतु यवानी
इसका सर्वाधिक सामान्य प्रयोग — एक चम्मच सैन्धव तथा उष्ण जल के साथ अवरुद्ध वायु हेतु भारत का मानक गृह-उपाय है।
उदर-शूल हेतु यवानी
आक्षेप-रोधी होकर वयस्कों में ऐंठनयुक्त उदर-शूल में तथा शिशुओं में मृदु जल के रूप में प्रयुक्त।
अजीर्ण हेतु यवानी
अरुचि तथा भोजनोपरान्त गौरव हेतु एक तीक्ष्ण दीपन एवं पाचन द्रव्य।
कास हेतु यवानी
कफज कास में प्रयुक्त; अजवायन के स्वेदन से निकलती थाइमॉल वाष्प एक पारम्परिक अवरोध-नाशक है।
कृमि हेतु यवानी
एक कृमिघ्न द्रव्य, जिसकी थाइमॉल-मात्रा वास्तविक परजीवी-रोधी क्रिया देती है।
दन्त-शूल हेतु यवानी
अजवायन-तैल एक पारम्परिक स्थानिक प्रयोग है, जिसका थाइमॉल पूतिरोधी तथा मृदु संवेदनाहारी है।
कष्टार्तव हेतु यवानी
अपने आक्षेप-रोधी कर्म के आधार पर कष्टार्तव में प्रयुक्त।
अजवायन पोटली के रूप में यवानी
बीजों को शुष्क भूनकर, वस्त्र में बाँधकर उदर अथवा उर पर उष्ण लगाया जाता है — एक व्यापक गृह-परम्परा।
अम्लता हेतु यवानी
सावधानी से प्रयुक्त — यह पाचन-सम्बन्धी असुख में सहायक है किन्तु उष्ण है और वास्तविक अम्लपित्त बढ़ा सकती है।
हिंग्वाष्टक चूर्ण में यवानी
हिंग तथा मिर्चों के साथ शास्त्रीय पाचक चूर्ण का एक घटक।
मात्रा — कितना लें
बीज 0.5–2 ग्राम, वायु हेतु प्रायः चुटकी भर सैन्धव सहित उष्ण जल में। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
अजवाइन का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में अजवाइन के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (दीपनीय प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग).
चरक संहिता में अजवाइन के विषय में क्या कहा गया है?
प्रबलतम पाचक बीजों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — दीपनीय प्रकरण.
भावप्रकाश निघण्टु में अजवाइन के विषय में क्या कहा गया है?
दीपन तथा पाचन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में अजवाइन किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
अजवायन एक प्रबल उष्ण पाचक है जो वायु, उदर-शूल तथा उदर-आक्षेप में, और उर के शीतजन्य अवरोध में प्रयुक्त होती है। यह शूल सहित अजीर्ण का गृह-द्रव्य है, जो उष्ण जल अथवा सैन्धव के साथ ली जाती है, और प्रसवोपरान्त पाचन हेतु स्तनपान कराती माताओं को दी जाती है।
अजवाइन के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कटु, तिक्त, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: दीपन, पाचन, शूलहर.
अजवाइन को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। अजवाइन का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
अजवाइन का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: फल.
अजवाइन की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
बीज 0.5–2 ग्राम, वायु हेतु प्रायः चुटकी भर सैन्धव सहित उष्ण जल में। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
अजवाइन का प्रयोग कब वर्जित है?
आहारीय मसाले के रूप में सुरक्षित; बड़ी मात्रा पित्त बढ़ा सकती है। गर्भावस्था में संयम से प्रयोग करें।
अजवाइन कहाँ पाया जाता है?
अजवायन एक वार्षिक ओषधि है जो भारत भर में, विशेषतः राजस्थान, गुजरात तथा मध्य प्रदेश में उगाई जाती है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
दीपन तथा पाचन के रूप में वर्णित। - चरक संहिता — दीपनीय प्रकरण
प्रबलतम पाचक बीजों में उल्लिखित।
Modern research
-
Spasmolytic and Anti-Spasmodic Action of Trachyspermum ammi Essence on Rat's Ileum Contraction
(see source). Jundishapur Journal of Natural Pharmaceutical Products (2015)
A study reporting the essential oil of Trachyspermum ammi (Yavani / ajwain), rich in thymol, exerted a potent antispasmodic effect on intestinal smooth muscle.
View study doi:10.4103/1947-2714.147982 -
Carum copticum L.: A Herbal Medicine with Various Pharmacological Effects
(see source). BioMed Research International (2014)
A review of ajwain (Trachyspermum ammi / Carum copticum) documenting its digestive, antispasmodic, antimicrobial and bronchodilatory pharmacology.
View study doi:10.1155/2014/569087
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
आहारीय मसाले के रूप में सुरक्षित; बड़ी मात्रा पित्त बढ़ा सकती है। गर्भावस्था में संयम से प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
अजवायन एक वार्षिक ओषधि है जो भारत भर में, विशेषतः राजस्थान, गुजरात तथा मध्य प्रदेश में उगाई जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अजवायन किसमें प्रयुक्त होती है?
आध्मान, अवरुद्ध वायु, उदर-शूल, अजीर्ण, कास तथा कृमि में। एक चम्मच चुटकी भर सैन्धव के साथ, तत्पश्चात् उष्ण जल — वायु हेतु भारत का मानक गृह-उपाय है, और यह विश्वसनीय रूप से कार्य करता है।
यवानी की मात्रा क्या है?
बीज-चूर्ण प्रतिदिन 1–2 ग्राम, अथवा एक चम्मच बीज सैन्धव के साथ चबाकर। अजवायन-जल के रूप में, एक चम्मच बीज एक कप जल में क्वथित। पाक-मात्रा हेतु कोई सीमा आवश्यक नहीं।
क्या शिशुओं को अजवायन-जल दिया जा सकता है?
अत्यन्त मृदु अजवायन-जल भारत भर में शिशु-शूल हेतु पारम्परिक रूप से दिया जाता है, और उदर पर लगाई गई उष्ण अजवायन पोटली अधिक सुरक्षित बाह्य रूप है। इसे मृदु ही रखें, और शिशु के सतत रुदन हेतु चिकित्सक से मिलें।
क्या अम्लता में अजवायन अच्छी है?
केवल उस प्रकार की अम्लता में जो मन्द पाचन एवं अवरुद्ध वायु से हो। यह उष्ण है और वास्तविक अम्लपित्त तथा ऊर्ध्व-प्रवाह बढ़ा सकती है, जहाँ यष्टिमधु अथवा शतावरी जैसे शीत स्निग्धकारी श्रेष्ठ चयन हैं।
अजवायन किसे नहीं लेनी चाहिए?
अम्लपित्त, परिणामशूल अथवा शोथयुक्त आन्त्र-अवस्था वाले किसी भी व्यक्ति को, क्योंकि यह प्रबल उष्ण है। गर्भावस्था में औषधीय मात्रा वर्जित। रक्त पतला करने वाली औषधि लेते हों तो परामर्श लें।
अजवायन पोटली क्या है?
बीजों को शुष्क भूनकर, वस्त्र की पोटली में बाँधकर उदर अथवा उर पर उष्ण लगाया जाता है। यह उदर-शूल, आर्तव-शूल तथा उर के अवरोध में प्रयुक्त होती है, और एक वस्तुतः उपयोगी गृह-उपाय है जिसमें आन्तरिक प्रयोग की कोई सावधानी नहीं आती।
अजवायन को अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं?
कैरम सीड, बिशप्स वीड अथवा अजोवान। वानस्पतिक नाम Trachyspermum ammi है। इसका तीक्ष्ण थाइम-सदृश स्वाद थाइमॉल से आता है, जो उसके सूक्ष्मजीव-रोधी कर्म का भी स्रोत है।