Agnimantha (Clerodendrum phlomidis) — root
Agnimantha — Clerodendrum phlomidis. चित्र में सम्पूर्ण वनस्पति है; प्रयोज्य अंग का चित्र उपलब्ध नहीं था। प्रयोज्य अंग: मूल, पञ्चाङ्ग, काण्ड.
चित्र: Deoxyribose12 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

Agnimantha अरनी

Clerodendrum phlomidis

अन्य नाम: अग्निमन्थ

प्रयोज्य अंग: मूल, पञ्चाङ्ग, काण्ड

Agnimantha — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त (Bitter), कषाय (Astringent)
गुणलघु (Light), रूक्ष (Dry)
वीर्यउष्ण (Hot)
विपाककटु (Pungent)
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावClassical systemic action

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Clerodendrum phlomidis
  • प्रयोज्य अंग: मूल, पञ्चाङ्ग, काण्ड
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: मूलत्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 50–100 मिली दिन में दो बार।

Agnimantha के अन्य भाषाओं में नाम

अंग्रेज़ीArni
लैटिन (वानस्पतिक)Clerodendrum phlomidis
संस्कृतअरनी
हिन्दीAgnimantha

परिचय

अरनी, शास्त्रीय नाम अग्निमन्थ (Clerodendrum phlomidis), शुष्क भारतीय झाड़ियों का एक कण्टकयुक्त क्षुप है। इसके नाम का अर्थ है 'अग्नि मथने वाला' — इसकी लकड़ी से परम्परागत रूप से घर्षण द्वारा यज्ञाग्नि प्रज्वलित की जाती थी, और द्रव्य को उसी प्रकार जठराग्नि प्रदीप्त करने का श्रेय दिया जाता है।

यह दशमूल के दस मूलों में से एक है और शोथ, मन्दाग्नि तथा वात-शूल में प्रयुक्त होता है।

वर्गीकरण

कुल लैमिएसी (Lamiaceae)। मूल तथा मूलत्वक् औषधीय अंग हैं। रस: तिक्त, कटु, कषाय। गुण: लघु, रूक्ष। वीर्य: उष्ण। विपाक: कटु। दोषघ्नता: कफ एवं वात का शमन; बृहत् पञ्चमूल में से एक।

उपयोग एवं लाभ

शोफ एवं सूजन में, अरुचि तथा उदर-गौरव में, और शूल एवं जकड़न-युक्त वात-व्याधियों में दिया जाता है। दशमूल के अंग के रूप में यह उष्णता एवं कफ-निर्हरण का योगदान करता है। शास्त्रों ने इसे प्रमेह तथा गौरव-युक्त ज्वर में भी गिना है।

शोथ में अग्निमन्थ

एक शोथहर द्रव्य, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ शोथ उष्ण नहीं अपितु शीत एवं गुरु हो, तथा जहाँ मन्दाग्नि के साथ जल-संचय हो।

दशमूल में अग्निमन्थ

बृहत् पञ्चमूल में से एक होने के कारण यह योग को उष्णता एवं रूक्षता देता है, और यही कारण है कि दशमूल वात-कफज अवस्थाओं में उपयुक्त बैठता है।

मात्रा — कितना लें

मूलत्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 50–100 मिली दिन में दो बार। प्रायः दशमूल के भीतर ही लिया जाता है।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

Agnimantha का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में Agnimantha के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (सूत्रस्थान 4 — बृहत् पञ्चमूल); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग — Agnimantha).

चरक संहिता में Agnimantha के विषय में क्या कहा गया है?

दशमूल के पाँच बृहत् मूलों में से एक। सन्दर्भ: चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — बृहत् पञ्चमूल.

भावप्रकाश निघण्टु में Agnimantha के विषय में क्या कहा गया है?

तिक्त-कटु रस, उष्ण वीर्य; शोथहर एवं दीपन। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — Agnimantha.

आयुर्वेद में Agnimantha किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

शोफ एवं सूजन में, अरुचि तथा उदर-गौरव में, और शूल एवं जकड़न-युक्त वात-व्याधियों में दिया जाता है। दशमूल के अंग के रूप में यह उष्णता एवं कफ-निर्हरण का योगदान करता है। शास्त्रों ने इसे प्रमेह तथा गौरव-युक्त ज्वर में भी गिना है।

Agnimantha के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.

Agnimantha को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। Agnimantha का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

Agnimantha का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: मूल, पञ्चाङ्ग, काण्ड.

Agnimantha की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

मूलत्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 50–100 मिली दिन में दो बार। प्रायः दशमूल के भीतर ही लिया जाता है। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

Agnimantha का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। उष्ण एवं रूक्ष; अकेले तथा अधिक मात्रा में लेने पर पित्त बढ़ा सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।

Agnimantha कहाँ पाया जाता है?

भारत के मैदानों में शुष्क झाड़ियों एवं खुले वनों का क्षुप, जो दक्कन, गुजरात तथा राजस्थान में सामान्य है।

Agnimantha किन शास्त्रीय योगों में सम्मिलित है?

Dashamula.

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — बृहत् पञ्चमूल
    दशमूल के पाँच बृहत् मूलों में से एक।
  • भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — Agnimantha
    तिक्त-कटु रस, उष्ण वीर्य; शोथहर एवं दीपन।

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। उष्ण एवं रूक्ष; अकेले तथा अधिक मात्रा में लेने पर पित्त बढ़ा सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।

प्राप्ति स्थान

भारत के मैदानों में शुष्क झाड़ियों एवं खुले वनों का क्षुप, जो दक्कन, गुजरात तथा राजस्थान में सामान्य है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसे अग्निमन्थ क्यों कहते हैं?

क्योंकि वैदिक यज्ञ में इसकी लकड़ी से घर्षण द्वारा अग्नि प्रज्वलित की जाती थी। यही नाम द्रव्य की जठराग्नि प्रदीप्त करने की ख्याति में भी चला आया।

क्या अरनी और अग्निमन्थ एक ही हैं?

हाँ — अरनी उसी द्रव्य Clerodendrum phlomidis का प्रचलित हिन्दी नाम है। कुछ ग्रन्थ यह नाम Premna जाति को देते हैं, इसीलिए लेबल पर वानस्पतिक नाम अंकित किया जाता है।

इनका घटक: Dashamula

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