Bal Chhad (Jatamansi) (Nardostachys jatamansi) — rhizome
Bal Chhad (Jatamansi) — Nardostachys jatamansi. प्रयोज्य अंग: प्रकन्द, मूल, मूल, प्रकन्द.
चित्र: Ncshah36 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

Bal Chhad (Jatamansi) बालछड़

Nardostachys jatamansi

अन्य नाम: बालछड़ (जटामांसी), जटामांसी

प्रयोज्य अंग: प्रकन्द, मूल, मूल, प्रकन्द

Bal Chhad (Jatamansi) — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त (Bitter), कषाय (Astringent)
गुणलघु (Light), रूक्ष (Dry)
वीर्यउष्ण (Hot)
विपाककटु (Pungent)
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावClassical systemic action

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Nardostachys jatamansi
  • प्रयोज्य अंग: प्रकन्द, मूल, मूल, प्रकन्द
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: प्रकन्द चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, प्रायः रात्रि में उष्ण दूध के साथ; क्वाथ रूप में 40–60 मिली।

Bal Chhad (Jatamansi) के अन्य भाषाओं में नाम

अंग्रेज़ीBalchad
लैटिन (वानस्पतिक)Nardostachys jatamansi
संस्कृतबालछड़
हिन्दीBal Chhad (Jatamansi)

परिचय

बालछड़ ही जटामांसी (Nardostachys jatamansi) है — हिमालयी स्पाइकनार्ड, जिसका गुंथा हुआ, रोमयुक्त मूलस्तम्भ भारी, मृत्तिका-सदृश सुगन्ध लिए रहता है। यह ऊँची अल्पाइन ढलानों पर उगता है और प्राचीन काल से पर्वतों से बाहर व्यापार में आता रहा है।

आयुर्वेद इसे विक्षुब्ध मन हेतु प्रमुखतम मेध्य द्रव्य मानता है: यह जड़ किए बिना शान्त करता है। यह अनिद्रा, उद्वेग तथा मानसिक अस्थिरता में प्रयुक्त होता है, और उसी शीत, स्थिरकारी गुण के कारण केश-तैलों में भी सम्मिलित रहता है।

वर्गीकरण

कुल कैप्रिफ़ोलिएसी (Caprifoliaceae, पूर्व में Valerianaceae)। प्रकन्द तथा उसकी जड़ें औषधीय हैं। रस: तिक्त, कषाय, मधुर। गुण: लघु, स्निग्ध। वीर्य: शीत। विपाक: कटु। दोषघ्नता: तीनों दोषों का शमन, विशेषतः वात एवं पित्त का।

उपयोग एवं लाभ

अनिद्रा, चिन्ता तथा मानसिक उद्वेग में, और उन्माद एवं अपस्मार के योगों में दिया जाता है। इसका शीत, त्रिदोषशामक स्वरूप उसे महाभृंगराज तथा महानारायण जैसे केश-तैलों का मानक घटक भी बनाता है, जहाँ यह केवल केश-वृद्धि हेतु नहीं, अपितु शिर तथा विश्रान्ति हेतु प्रयुक्त होता है।

निद्रा एवं उद्वेग हेतु जटामांसी

शास्त्रों ने इसे निद्राजनन — निद्रा लाने वाला — तथा मेध्य कहा है। जहाँ रात्रि में मन अति-सक्रिय हो, वहाँ यह चयनित द्रव्य है, और प्रायः शयन से पूर्व दूध के साथ दिया जाता है।

केश-तैलों में जटामांसी

इसका शीत गुण शिर के योगों हेतु उपयुक्त है। यह इस संग्रह के महान् सिद्ध तैलों में सम्मिलित है, जहाँ उद्देश्य केश की चिकित्सा जितना ही शिर को शान्त करना भी है।

मात्रा — कितना लें

प्रकन्द चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, प्रायः रात्रि में उष्ण दूध के साथ; क्वाथ रूप में 40–60 मिली। तैलों में यह बाह्य रूप से मात्रा-सीमा के बिना प्रयुक्त होता है।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

Bal Chhad (Jatamansi) का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में Bal Chhad (Jatamansi) के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (सूत्रस्थान 4 — Sanjnasthapana गण); भावप्रकाश निघण्टु (कर्पूरादि वर्ग — Jatamansi).

चरक संहिता में Bal Chhad (Jatamansi) के विषय में क्या कहा गया है?

चेतना पुनः स्थापित करने तथा मन को स्थिर करने वाले द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — Sanjnasthapana गण.

भावप्रकाश निघण्टु में Bal Chhad (Jatamansi) के विषय में क्या कहा गया है?

त्रिदोषहर; शीत वीर्य; मेध्य एवं निद्राजनन। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग — Jatamansi.

आयुर्वेद में Bal Chhad (Jatamansi) किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

अनिद्रा, चिन्ता तथा मानसिक उद्वेग में, और उन्माद एवं अपस्मार के योगों में दिया जाता है। इसका शीत, त्रिदोषशामक स्वरूप उसे महाभृंगराज तथा महानारायण जैसे केश-तैलों का मानक घटक भी बनाता है, जहाँ यह केवल केश-वृद्धि हेतु नहीं, अपितु शिर तथा विश्रान्ति हेतु प्रयुक्त होता है।

Bal Chhad (Jatamansi) के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.

Bal Chhad (Jatamansi) को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। Bal Chhad (Jatamansi) का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

Bal Chhad (Jatamansi) का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: प्रकन्द, मूल, मूल, प्रकन्द.

Bal Chhad (Jatamansi) की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

प्रकन्द चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, प्रायः रात्रि में उष्ण दूध के साथ; क्वाथ रूप में 40–60 मिली। तैलों में यह बाह्य रूप से मात्रा-सीमा के बिना प्रयुक्त होता है। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

Bal Chhad (Jatamansi) का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। शामक होने के कारण निद्राजनक औषधि के साथ लेते समय सावधानी रखें — अपने चिकित्सक को अन्य सेवन की जा रही औषधियाँ अवश्य बताएँ। गर्भावस्था में बिना निगरानी अनुचित। Nardostachys एक संकटग्रस्त हिमालयी जाति है; केवल उन्हीं आपूर्तिकर्ताओं से लें जो विधिसम्मत स्रोत दिखा सकें।

Bal Chhad (Jatamansi) कहाँ पाया जाता है?

लगभग 3,000 से 5,000 मीटर के बीच अल्पाइन एवं उप-अल्पाइन हिमालय में — हिमाचल प्रदेश से उत्तराखण्ड, नेपाल तथा सिक्किम तक। वन्य संग्रह से प्राप्त; कृषि सीमित है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — Sanjnasthapana गण
    चेतना पुनः स्थापित करने तथा मन को स्थिर करने वाले द्रव्यों में उल्लिखित।
  • भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग — Jatamansi
    त्रिदोषहर; शीत वीर्य; मेध्य एवं निद्राजनन।

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। शामक होने के कारण निद्राजनक औषधि के साथ लेते समय सावधानी रखें — अपने चिकित्सक को अन्य सेवन की जा रही औषधियाँ अवश्य बताएँ। गर्भावस्था में बिना निगरानी अनुचित। Nardostachys एक संकटग्रस्त हिमालयी जाति है; केवल उन्हीं आपूर्तिकर्ताओं से लें जो विधिसम्मत स्रोत दिखा सकें।

प्राप्ति स्थान

लगभग 3,000 से 5,000 मीटर के बीच अल्पाइन एवं उप-अल्पाइन हिमालय में — हिमाचल प्रदेश से उत्तराखण्ड, नेपाल तथा सिक्किम तक। वन्य संग्रह से प्राप्त; कृषि सीमित है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या जटामांसी और वेलेरियन एक ही हैं?

वे सजातीय हैं और दोनों की शामक ख्याति है, किन्तु वे भिन्न वनस्पतियाँ हैं। जटामांसी हिमालय की Nardostachys jatamansi है; इस संग्रह में प्रयुक्त वेलेरियन तगर, अर्थात् Valeriana wallichii है।

निद्रा हेतु जटामांसी कब लेनी चाहिए?

परम्परागत रूप से रात्रि में उष्ण दूध के साथ, शयन से लगभग आधा घण्टा पूर्व। यह निद्राजनक की भाँति सुलाता नहीं, अपितु शान्त करता है, अतः प्रायः कई सप्ताह तक निरन्तर लिया जाता है।

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