चित्र: Pantegral / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
Bargad Chhal बरगद
Ficus bengalensis
अन्य नाम: बरगद की छाल, बरजटा (बरगद)
प्रयोज्य अंग: त्वक्, Stem Bark
| रस | तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent) |
|---|---|
| गुण | लघु (Light), रूक्ष (Dry) |
| वीर्य | उष्ण (Hot) |
| विपाक | कटु (Pungent) |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | Classical systemic action |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Ficus bengalensis
- प्रयोज्य अंग: त्वक्, Stem Bark
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 50–100 मिली दिन में दो बार; कवल अथवा व्रण-प्रक्षालन हेतु क्वाथ बाह्य रूप से।
Bargad Chhal के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
बरगद, शास्त्रीय नाम वट अथवा न्यग्रोध (Ficus bengalensis), वह वृक्ष है जो वायवीय जड़ें गिराकर अनिश्चित काल तक फैलता जाता है। इसकी त्वक् तथा वायवीय जड़ें औषधि हैं।
सुश्रुत ने कषाय द्रव्यों के एक सम्पूर्ण गण — न्यग्रोधादि गण — का नेतृत्व इसी को दिया है। यह वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ ऊतक को कसना हो: रक्तस्राव में, द्रव मल में, स्राव में तथा व्रणों में।
वर्गीकरण
कुल मोरेसी (Moraceae)। काण्ड-त्वक्, वायवीय जड़ें तथा क्षीर औषधीय हैं। रस: कषाय। गुण: गुरु, रूक्ष। वीर्य: शीत। विपाक: कटु। दोषघ्नता: कफ एवं पित्त का शमन।
उपयोग एवं लाभ
अतिसार एवं प्रवाहिका में, रक्तपित्त तथा अत्यधिक रजःस्राव में, और श्वेतप्रदर में दिया जाता है, जहाँ इसकी कषायता स्राव को रोकती है। त्वक् का क्वाथ शिथिल मसूड़ों हेतु कवल के रूप में तथा व्रण एवं क्षतों के प्रक्षालन हेतु प्रयुक्त होता है। क्षीर फटी एड़ियों तथा शूलयुक्त सन्धियों पर लगाया जाता है।
रक्तस्राव एवं स्राव हेतु वट त्वक्
शास्त्रोक्त स्तम्भन संकेत। इसकी कषायता किसी भी मार्ग से होने वाले रक्तस्राव में तथा कफज एवं पित्तज मूल के जीर्ण स्रावों में प्रयुक्त होती है।
व्रण एवं मसूड़ों हेतु वट त्वक्
व्रण एवं क्षतों के प्रक्षालन हेतु क्वाथ के रूप में तथा शिथिल, रक्तस्रावी मसूड़ों में गण्डूष के रूप में प्रयुक्त — यह शास्त्रोक्त दन्त्य प्रयोगों में से एक है।
मात्रा — कितना लें
त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 50–100 मिली दिन में दो बार; कवल अथवा व्रण-प्रक्षालन हेतु क्वाथ बाह्य रूप से।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
Bargad Chhal का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में Bargad Chhal के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (सूत्रस्थान 38 — न्यग्रोधादि गण); भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग — वात).
सुश्रुत संहिता में Bargad Chhal के विषय में क्या कहा गया है?
कषाय, व्रणरोपक द्रव्यों के गण का नेतृत्व करता है। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — सूत्रस्थान 38 — न्यग्रोधादि गण.
भावप्रकाश निघण्टु में Bargad Chhal के विषय में क्या कहा गया है?
कषाय रस, शीत वीर्य; स्तम्भन एवं व्रणरोपण। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग — वात.
आयुर्वेद में Bargad Chhal किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
अतिसार एवं प्रवाहिका में, रक्तपित्त तथा अत्यधिक रजःस्राव में, और श्वेतप्रदर में दिया जाता है, जहाँ इसकी कषायता स्राव को रोकती है। त्वक् का क्वाथ शिथिल मसूड़ों हेतु कवल के रूप में तथा व्रण एवं क्षतों के प्रक्षालन हेतु प्रयुक्त होता है। क्षीर फटी एड़ियों तथा शूलयुक्त सन्धियों पर लगाया जाता है।
Bargad Chhal के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.
Bargad Chhal को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। Bargad Chhal का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
Bargad Chhal का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: त्वक्, Stem Bark.
Bargad Chhal की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ 50–100 मिली दिन में दो बार; कवल अथवा व्रण-प्रक्षालन हेतु क्वाथ बाह्य रूप से। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
Bargad Chhal का प्रयोग कब वर्जित है?
सुसह्य। अत्यन्त कषाय होने से दीर्घ एवं अधिक प्रयोग विबन्ध कर सकता है तथा वात बढ़ा सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।
Bargad Chhal कहाँ पाया जाता है?
सम्पूर्ण भारत में लगाया जाता है और स्वतः भी उगता है — ग्राम-उपवनों से मार्ग-किनारों तक; यह उपमहाद्वीप के सर्वाधिक व्यापक वृक्षों में से एक है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- सुश्रुत संहिता — सूत्रस्थान 38 — न्यग्रोधादि गण
कषाय, व्रणरोपक द्रव्यों के गण का नेतृत्व करता है। - भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग — वात
कषाय रस, शीत वीर्य; स्तम्भन एवं व्रणरोपण।
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सुसह्य। अत्यन्त कषाय होने से दीर्घ एवं अधिक प्रयोग विबन्ध कर सकता है तथा वात बढ़ा सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।
प्राप्ति स्थान
सम्पूर्ण भारत में लगाया जाता है और स्वतः भी उगता है — ग्राम-उपवनों से मार्ग-किनारों तक; यह उपमहाद्वीप के सर्वाधिक व्यापक वृक्षों में से एक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बरगद का कौन-सा अंग प्रयुक्त होता है?
मुख्यतः काण्ड-त्वक् तथा वायवीय जड़ें। क्षीर फटी त्वचा एवं सन्धि-शूल हेतु बाह्य रूप से प्रयुक्त होता है।
न्यग्रोधादि गण क्या है?
सुश्रुत द्वारा नामित कषाय द्रव्यों का एक गण, जिसका नेतृत्व बरगद करता है और जो व्रण, स्राव तथा रक्तस्राव में एक साथ प्रयुक्त होता है।