चित्र: J.M.Garg / Wikimedia Commons, CC BY 3.0
भारंगी भारंगी
Clerodendrum serratum
प्रयोज्य अंग: पत्र, मूल
| रस | तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent) |
|---|---|
| गुण | लघु (Light), रूक्ष (Dry) |
| वीर्य | उष्ण (Hot) |
| विपाक | कटु (Pungent) |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | Classical systemic action |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Clerodendrum serratum
- प्रयोज्य अंग: पत्र, मूल
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: मूल चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम; क्वाथ 40–60 मिली दिन में दो बार।
भारंगी के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
भारंगी (Clerodendrum serratum) भारतीय झाड़ी-वनों का एक क्षुप है जिसका तिक्त मूल आयुर्वेद के प्रधान श्वसन-द्रव्यों में से एक है। चरक ने इसे श्वासहर — श्वास-कष्ट दूर करने वाले — द्रव्यों में गिना है।
यह वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ उर घने कफ से अवरुद्ध हो और श्वास कष्टपूर्ण हो, और यह शास्त्रीय श्वास एवं कास योगों का मानक घटक है।
वर्गीकरण
कुल लैमिएसी (Lamiaceae)। मूल तथा मूलत्वक् औषधीय हैं; कुछ योगों में पत्र भी प्रयुक्त होता है। रस: तिक्त, कटु। गुण: लघु, रूक्ष। वीर्य: उष्ण। विपाक: कटु। दोषघ्नता: कफ एवं वात का शमन।
उपयोग एवं लाभ
श्वास, कास तथा श्वसनिका-शोथ में दिया जाता है जहाँ कफ घना हो और कठिनाई से निकले, तथा श्वसन-संलिप्तता वाले ज्वर में। इसे शोथहर भी कहा गया है और सूजन में प्रयुक्त किया जाता है; यह महायोगराज गुग्गुलु तथा इस संग्रह के श्वसन-योगों में सम्मिलित है।
श्वास एवं कास हेतु भारंगी
शास्त्रोक्त श्वासहर संकेत। तिक्त एवं उष्ण होने से यह उर के कफ को पतला एवं शिथिल करता है ताकि वह निकल सके, और प्रायः मधु के साथ दिया जाता है।
अवरोध-युक्त ज्वर में भारंगी
वहाँ प्रयुक्त जहाँ ज्वर के साथ उर भारी एवं अवरुद्ध हो; यह अपने कफ-निर्हरण कर्म को तिक्त ज्वरघ्न प्रभाव से जोड़ देता है।
मात्रा — कितना लें
मूल चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम; क्वाथ 40–60 मिली दिन में दो बार। श्वसन-प्रयोग में मधु सामान्य अनुपान है।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
भारंगी का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में भारंगी के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (सूत्रस्थान 4 — Shwasahara गण); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग — Bharangi).
चरक संहिता में भारंगी के विषय में क्या कहा गया है?
श्वास-कष्ट दूर करने वाले द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — Shwasahara गण.
भावप्रकाश निघण्टु में भारंगी के विषय में क्या कहा गया है?
तिक्त-कटु रस, उष्ण वीर्य; कास एवं श्वास। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — Bharangi.
आयुर्वेद में भारंगी किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
श्वास, कास तथा श्वसनिका-शोथ में दिया जाता है जहाँ कफ घना हो और कठिनाई से निकले, तथा श्वसन-संलिप्तता वाले ज्वर में। इसे शोथहर भी कहा गया है और सूजन में प्रयुक्त किया जाता है; यह महायोगराज गुग्गुलु तथा इस संग्रह के श्वसन-योगों में सम्मिलित है।
भारंगी के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.
भारंगी को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। भारंगी का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
भारंगी का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: पत्र, मूल.
भारंगी की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
मूल चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम; क्वाथ 40–60 मिली दिन में दो बार। श्वसन-प्रयोग में मधु सामान्य अनुपान है। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
भारंगी का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। उष्ण एवं रूक्ष होने से पित्त बढ़ा सकता है और शुष्क, क्षोभयुक्त कास हेतु कम उपयुक्त है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।
भारंगी कहाँ पाया जाता है?
सम्पूर्ण भारत के शुष्क पर्णपाती वनों एवं झाड़ियों का क्षुप, जो पर्वतों में लगभग 1,500 मीटर तक चढ़ता है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — Shwasahara गण
श्वास-कष्ट दूर करने वाले द्रव्यों में उल्लिखित। - भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — Bharangi
तिक्त-कटु रस, उष्ण वीर्य; कास एवं श्वास।
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। उष्ण एवं रूक्ष होने से पित्त बढ़ा सकता है और शुष्क, क्षोभयुक्त कास हेतु कम उपयुक्त है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।
प्राप्ति स्थान
सम्पूर्ण भारत के शुष्क पर्णपाती वनों एवं झाड़ियों का क्षुप, जो पर्वतों में लगभग 1,500 मीटर तक चढ़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अन्य कास-द्रव्यों की अपेक्षा भारंगी कब वरीय है?
जहाँ कास सकफ हो और कफ घना हो। शुष्क, क्षोभयुक्त कास हेतु प्रायः यष्टिमधु अथवा वंशलोचन जैसे शीत द्रव्य चुने जाते हैं।
कौन-सा अंग प्रयुक्त होता है?
मुख्यतः मूल एवं मूलत्वक्। इस संग्रह के कुछ योग सम्बद्ध शास्त्रीय ग्रन्थ के अनुसार पत्र निर्दिष्ट करते हैं।