बेल (Aegle marmelos) — fruit
बेल — Aegle marmelos. प्रयोज्य अंग: फल.
चित्र: Charan Gill / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

बेल बिल्व

Aegle marmelos · Rutaceae

अन्य नाम: बेल, बेलगिरी

प्रयोज्य अंग: फल

बिल्व (Aegle marmelos), अर्थात् बेल, एक पवित्र भारतीय वृक्ष है जिसका कच्चा फल जीर्ण अतिसार एवं प्रवाहिका हेतु आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। कच्चा और पका फल विपरीत कार्य करते हैं: कच्चा ग्राही है और औषधीय रूप से प्रयुक्त होता है, पका विरेचक है और आहार के रूप में खाया जाता है।

बेल — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकषाय, तिक्त
गुणलघु, रूक्ष
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावग्राही (शोषक), दीपन

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Aegle marmelos
  • प्रयोज्य अंग: फल
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: कच्चे फल का चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; बेल का गूदा तथा शर्बत भी प्रयुक्त होते हैं।

बेल के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीबेल
अंग्रेज़ीBael, Wood Apple
संस्कृतबिल्व, श्रीफल
बंगालीবেল
गुजरातीબીલી
मराठीबेल
तमिलவில்வம்
तेलुगुమారేడు
कन्नड़ಬಿಲ್ವ
मलयालमകൂവളം
लैटिन (वानस्पतिक)Aegle marmelos

परिचय

बिल्व (Aegle marmelos), पवित्र बेल, एक शास्त्रीय पाचक द्रव्य है — इसका कच्चा फल अतिसार तथा क्षुब्ध पाचन हेतु आयुर्वेद की प्रमुखतम औषधि है, और यह वृक्ष भगवान् शिव की उपासना में पूजनीय है।

वर्गीकरण

रूटेसी (Rutaceae) कुल का यह द्रव्य ग्राही (शोषक) तथा दीपन द्रव्यों में वर्गीकृत है। कच्चे फल का कषाय-तिक्त रस, लघु-रूक्ष गुण एवं उष्ण वीर्य अतिरिक्त द्रव को शोषित करते हैं और अग्नि प्रदीप्त करते हैं; पका फल मृदुतर है।

उपयोग एवं लाभ

बिल्व द्रव कोष्ठ का शास्त्रोक्त द्रव्य है। कच्चा फल ग्राही है — शोषक एवं बाँधने वाला — और अतिसार, प्रवाहिका तथा क्षुब्ध कोष्ठ में वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ मल द्रव एवं बारम्बार हो। इसके विपरीत पका फल मृदु विरेचक है, अतः शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि कौन-सा अभीष्ट है।

जीर्ण अतिसार हेतु बिल्व

कच्चा फल दीर्घकालीन द्रव मल हेतु शास्त्रोक्त ग्राही द्रव्य है, और आज भी भारत भर में प्रथम पंक्ति का पारम्परिक उपाय है।

प्रवाहिका हेतु बिल्व

प्रवाहिका में वहाँ प्रयुक्त जहाँ मल में आम हो और प्रवाहण हो, प्रायः शुष्क कच्चे फल के चूर्ण के रूप में।

क्षुब्ध कोष्ठ हेतु बिल्व

कषायता एवं मृदु पाचक कर्म का इसका संयोग बदलती और अनिश्चित कोष्ठ-प्रवृत्ति के अनुकूल बैठता है।

विरेचक के रूप में पका बिल्व फल

विपरीत संकेत। पके बेल का गूदा मृदु विरेचक है और विबन्ध में शर्बत के रूप में खाया या पिया जाता है — कच्चे द्रव्य से ठीक उलट।

पाचन हेतु बिल्व

दीपन एवं पाचन, जो योगों के भीतर अरुचि तथा अपूर्ण पाचन में प्रयुक्त होता है।

दशमूल में बिल्व मूल

दशमूल के दस मूलों में से एक, जो उस योग के वातशामक कर्म में योगदान करता है।

प्रमेह हेतु बिल्व

पत्र परम्परागत रूप से प्रमेह में स्वरस अथवा क्वाथ के रूप में लिया जाता है — निर्धारित चिकित्सा के साथ सहायक रूप में।

ग्रीष्म-पेय के रूप में बिल्व

पके बेल का शर्बत उष्णता एवं तृष्णा हेतु पारम्परिक शीत पेय है, और शोथयुक्त आन्त्र-आवरण को वस्तुतः शान्ति देता है।

अर्श हेतु बिल्व

अर्श में प्रयुक्त, विशेषतः वहाँ जहाँ रक्तस्राव एवं द्रव मल साथ-साथ हों।

कृमि हेतु बिल्व

कृमिघ्न द्रव्यों में नामित; पत्र एवं कच्चा फल, दोनों प्रयुक्त होते हैं।

मात्रा — कितना लें

कच्चे फल का चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; बेल का गूदा तथा शर्बत भी प्रयुक्त होते हैं। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

बेल का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में बेल के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (अतिसार एवं ग्रहणी प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (Guduchyadi / आम्रादि फलवर्ग).

सुश्रुत संहिता में बेल के विषय में क्या कहा गया है?

अतिसार एवं आन्त्र-विकारों हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — अतिसार एवं ग्रहणी प्रकरण.

भावप्रकाश निघण्टु में बेल के विषय में क्या कहा गया है?

कच्चा फल ग्राही एवं दीपन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — Guduchyadi / आम्रादि फलवर्ग.

आयुर्वेद में बेल किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

बिल्व द्रव कोष्ठ का शास्त्रोक्त द्रव्य है। कच्चा फल ग्राही है — शोषक एवं बाँधने वाला — और अतिसार, प्रवाहिका तथा क्षुब्ध कोष्ठ में वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ मल द्रव एवं बारम्बार हो। इसके विपरीत पका फल मृदु विरेचक है, अतः शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि कौन-सा अभीष्ट है।

बेल के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कषाय, तिक्त, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: ग्राही (शोषक), दीपन.

बेल को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। बेल का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

बेल का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: फल.

बेल की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

कच्चे फल का चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; बेल का गूदा तथा शर्बत भी प्रयुक्त होते हैं। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

बेल का प्रयोग कब वर्जित है?

सामान्यतः सुरक्षित; कच्चा फल अतिसार हेतु, पका फल मृदु आहार के रूप में प्रयुक्त होता है। गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

बेल कहाँ पाया जाता है?

बिल्व भारत का मूल निवासी मध्यम आकार का कण्टकयुक्त वृक्ष है, जो मन्दिरों तथा घरों के निकट लगाया जाता है और उपमहाद्वीप के शुष्क पर्णपाती वनों में मिलता है।

बेल किन शास्त्रीय योगों में सम्मिलित है?

Dashamula.

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — Guduchyadi / आम्रादि फलवर्ग
    कच्चा फल ग्राही एवं दीपन के रूप में वर्णित।
  • चरक एवं सुश्रुत संहिता — अतिसार एवं ग्रहणी प्रकरण
    अतिसार एवं आन्त्र-विकारों हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Aegle marmelos (L.) Correa: An Underutilized Fruit with High Nutraceutical Values: A Review (see source). Molecules (2022)

    A review documenting bael (Aegle marmelos) fruit's antidiarrhoeal, antioxidant, antidiabetic and hepatoprotective properties across in-vivo and in-vitro studies.

    View study doi:10.3390/ijms231810889

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

सामान्यतः सुरक्षित; कच्चा फल अतिसार हेतु, पका फल मृदु आहार के रूप में प्रयुक्त होता है। गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

बिल्व भारत का मूल निवासी मध्यम आकार का कण्टकयुक्त वृक्ष है, जो मन्दिरों तथा घरों के निकट लगाया जाता है और उपमहाद्वीप के शुष्क पर्णपाती वनों में मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिल्व किसमें प्रयुक्त होता है?

कच्चा बेल फल जीर्ण अतिसार, प्रवाहिका तथा क्षुब्ध कोष्ठ हेतु आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। पका फल इसके विपरीत कार्य करता है और मृदु विरेचक है। पत्र प्रमेह में प्रयुक्त होता है और मूल दशमूल के दस में से एक है।

पके और कच्चे बेल में क्या अन्तर है?

वे विपरीत दिशा में कार्य करते हैं। कच्चा बेल कषाय एवं बाँधने वाला है, जो अतिसार रोकने हेतु प्रयुक्त होता है। पका बेल मधुर एवं मृदु विरेचक है, जो विबन्ध में फल या शर्बत के रूप में लिया जाता है। गलत का प्रयोग उसी व्याधि को बढ़ाएगा जिसकी आप चिकित्सा कर रहे हैं।

बिल्व की मात्रा क्या है?

शुष्क कच्चे फल का चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, तक्र अथवा उष्ण जल के साथ। पके फल का गूदा आहार या शर्बत के रूप में। क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। दीर्घकालीन अतिसार में इसे मल के सामान्य होने तक लिया जाता है।

क्या बेल फल उदर हेतु अच्छा है?

हाँ। अतिसार तथा शोथयुक्त आन्त्र-आवरण, दोनों में इसका दीर्घ अभिलेख है, और पके फल का शर्बत अम्लपित्त एवं ग्रीष्म-ताप में पारम्परिक शान्तिदायक पेय है। दीर्घकालीन पाचन-लक्षणों की उचित जाँच फिर भी आवश्यक है।

क्या मैं मधुमेह में बिल्व ले सकता हूँ?

बेल-पत्र परम्परागत रूप से प्रमेह में प्रयुक्त होता है, जो मधुमेह को समाहित करने वाला शास्त्रीय वर्ग है। इसे सहायक ही मानें: रक्त-शर्करा की निगरानी रखें, चिकित्सक को सूचित करें, और निर्धारित औषधि कम न करें।

क्या बिल्व के दुष्प्रभाव हैं?

सुसह्य। कच्चा फल अत्यन्त कषाय है, अतः अधिक प्रयोग विबन्ध करता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें। वृक्ष कण्टकयुक्त है और फल का कवच अत्यन्त कठोर — प्रयोज्य अंग गूदा है।

बिल्व को पवित्र क्यों माना जाता है?

इसका त्रिपर्ण पत्र शिव को अर्पित किया जाता है और यह वृक्ष भारत भर के मन्दिरों में लगाया जाता है। इससे परिपक्व वृक्षों के संरक्षण में सहायता मिली है, किन्तु इससे औषधि के निर्माण या प्रयोग में कोई अन्तर नहीं आता।

इनका घटक: Dashamula

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