चित्र: MaxwellPerkins ( talk ) ( Uploads ) / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
Kateri Badi बृहती
Solanum indicum
अन्य नाम: कटेरी बड़ी
प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग, Plant
| रस | तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent) |
|---|---|
| गुण | लघु (Light), रूक्ष (Dry) |
| वीर्य | उष्ण (Hot) |
| विपाक | कटु (Pungent) |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | Classical systemic action |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Solanum indicum
- प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग, Plant
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ रूप में 50–100 मिली दिन में दो बार।
Kateri Badi के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
बृहती (Solanum indicum) उन दो कण्टकयुक्त कटेरियों में बड़ी है जिन्हें आयुर्वेद सदैव जोड़ी में रखता है; इसकी छोटी सहचरी कण्टकारी है। दोनों दशमूल में सम्मिलित हैं, और दोनों इतनी बार साथ निर्दिष्ट होती हैं कि शास्त्र उन्हें संयुक्त रूप से बृहती-द्वय कहते हैं।
यह कफ-निर्हरक एवं अग्नि-प्रदीपक द्रव्य है, जो मुख्यतः उर तथा पाचन हेतु प्रयुक्त होता है — कास, श्वास-कष्ट, उदर-गौरव तथा अनियमित अग्नि में।
वर्गीकरण
कुल सोलेनेसी (Solanaceae)। मूल औषधीय अंग है; कुछ योगों में पञ्चाङ्ग भी प्रयुक्त होता है। रस: कटु एवं तिक्त। गुण: लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण। वीर्य: उष्ण। विपाक: कटु। दोषघ्नता: कफ एवं वात का शमन; लघु पञ्चमूल में से एक।
उपयोग एवं लाभ
कास, श्वास-कष्ट तथा उरःअवरोध में, और उत्क्लेश एवं उदर-गौरव सहित अग्निमान्द्य में दिया जाता है। लघु पञ्चमूल में से एक होने के कारण यह दशमूल को उसका उष्ण, कफ-छेदक पक्ष प्रदान करता है। इसे कृमिघ्न भी कहा गया है और हृद्रोग के योगों में प्रयुक्त किया जाता है।
कास एवं श्वास-कष्ट हेतु बृहती
कटु-तिक्त मूल उर से कफ को शिथिल कर बाहर निकालता है। यह श्वासहर योगों तथा श्वसन सम्बन्धी वात-कफज अवस्थाओं में दिए जाने वाले दशमूल-आधारित क्वाथों का मानक घटक है।
अग्नि हेतु बृहती
दीपन एवं पाचन द्रव्य के रूप में यह वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ पाचन मन्द हो गया हो और अन्न भारी पड़ता हो — प्रायः अपनी सहचरी कण्टकारी के साथ।
मात्रा — कितना लें
मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ रूप में 50–100 मिली दिन में दो बार। प्रायः अकेले नहीं, अपितु दशमूल अथवा किसी योग के भीतर दिया जाता है।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
Kateri Badi का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में Kateri Badi के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (सूत्रस्थान 4 — लघु पञ्चमूल); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग — Brihati).
चरक संहिता में Kateri Badi के विषय में क्या कहा गया है?
दशमूल के पाँच लघु मूलों में से एक। सन्दर्भ: चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — लघु पञ्चमूल.
भावप्रकाश निघण्टु में Kateri Badi के विषय में क्या कहा गया है?
कटु-तिक्त रस, उष्ण वीर्य; कास एवं श्वास के संकेत। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — Brihati.
आयुर्वेद में Kateri Badi किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
कास, श्वास-कष्ट तथा उरःअवरोध में, और उत्क्लेश एवं उदर-गौरव सहित अग्निमान्द्य में दिया जाता है। लघु पञ्चमूल में से एक होने के कारण यह दशमूल को उसका उष्ण, कफ-छेदक पक्ष प्रदान करता है। इसे कृमिघ्न भी कहा गया है और हृद्रोग के योगों में प्रयुक्त किया जाता है।
Kateri Badi के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent), गुण लघु (Light), रूक्ष (Dry), वीर्य उष्ण (Hot), विपाक कटु (Pungent). दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Classical systemic action.
Kateri Badi को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। Kateri Badi का वीर्य उष्ण (Hot) है और विपाक कटु (Pungent) — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
Kateri Badi का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग, Plant.
Kateri Badi की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम; क्वाथ रूप में 50–100 मिली दिन में दो बार। प्रायः अकेले नहीं, अपितु दशमूल अथवा किसी योग के भीतर दिया जाता है। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
Kateri Badi का प्रयोग कब वर्जित है?
उष्ण; पित्त बढ़ा सकता है तथा संवेदनशील व्यक्तियों में अम्लपित्त कर सकता है। सक्रिय परिणामशूल में वर्जित। सोलेनेसी कुल के द्रव्य गर्भावस्था में सावधानी से प्रयुक्त होने चाहिए — केवल चिकित्सक के निर्देशानुसार लें। मकोय (Solanum nigrum) से भ्रमित न करें, वह पृथक् द्रव्य है।
Kateri Badi कहाँ पाया जाता है?
सम्पूर्ण भारत में लगभग 1,500 मीटर तक बंजर भूमि, मार्ग-किनारों तथा खुली झाड़ियों में मिलने वाला सामान्य कण्टकयुक्त उपक्षुप।
Kateri Badi किन शास्त्रीय योगों में सम्मिलित है?
Dashamula.
शास्त्रीय सन्दर्भ
- चरक संहिता — सूत्रस्थान 4 — लघु पञ्चमूल
दशमूल के पाँच लघु मूलों में से एक। - भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग — Brihati
कटु-तिक्त रस, उष्ण वीर्य; कास एवं श्वास के संकेत।
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
उष्ण; पित्त बढ़ा सकता है तथा संवेदनशील व्यक्तियों में अम्लपित्त कर सकता है। सक्रिय परिणामशूल में वर्जित। सोलेनेसी कुल के द्रव्य गर्भावस्था में सावधानी से प्रयुक्त होने चाहिए — केवल चिकित्सक के निर्देशानुसार लें। मकोय (Solanum nigrum) से भ्रमित न करें, वह पृथक् द्रव्य है।
प्राप्ति स्थान
सम्पूर्ण भारत में लगभग 1,500 मीटर तक बंजर भूमि, मार्ग-किनारों तथा खुली झाड़ियों में मिलने वाला सामान्य कण्टकयुक्त उपक्षुप।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बृहती-द्वय क्या है?
बृहती (Solanum indicum) तथा कण्टकारी (Solanum surattense) की जोड़ी। शास्त्रीय योग प्रायः दोनों को एक साथ माँगते हैं, और यह जोड़ी दशमूल में सम्मिलित है।
क्या बृहती और कण्टकारी एक ही हैं?
नहीं — वे समान कर्म वाली भिन्न जातियाँ हैं। बृहती बड़ा पौधा है; कण्टकारी छोटी और अधिक कण्टकयुक्त। इस स्थल पर दोनों के पृथक् मोनोग्राफ हैं।
इनका घटक: Dashamula