हींग (Ferula asafoetida) — oleo-gum resin
हींग — Ferula asafoetida. चित्र में सम्पूर्ण वनस्पति है; प्रयोज्य अंग का चित्र उपलब्ध नहीं था। प्रयोज्य अंग: निर्यास (गुग्गुल).
चित्र: Agnieszka Kwiecień, Nova / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

हींग हिङ्गु

Ferula asafoetida · Apiaceae

अन्य नाम: हींग, रामठ

प्रयोज्य अंग: निर्यास (गुग्गुल)

हिङ्गु (Ferula asafoetida) हींग है, एक तीक्ष्ण निर्यास जिसकी गन्ध के कारण अंग्रेज़ी में इसे डेविल्स डंग कहा जाता है। आयुर्वेद इसे अवरुद्ध वायु तथा उदर-शूल का प्रमुखतम द्रव्य मानता है। पकाने पर यह अरुचिकर से स्वादिष्ट में बदल जाती है, और चुटकी भर पर्याप्त है — मात्रा ग्राम में नहीं, कणों में मापी जाती है।

हींग — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु
गुणलघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मवात और कफ का शमन
प्रभावदीपन, शूलहर

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Ferula asafoetida
  • प्रयोज्य अंग: निर्यास (गुग्गुल)
  • दोष-कर्म: वात और कफ का शमन
  • सामान्य मात्रा: शोधित निर्यास, चुटकी भर (125–500 मिग्रा) घृत में भूनकर आहार अथवा योगों (हिंग्वाष्टक) के भीतर।

हींग के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीहींग
अंग्रेज़ीAsafoetida
संस्कृतहिङ्गु, रामठ
बंगालीহিং
गुजरातीહિંગ
मराठीहिंग
तमिलபெருங்காயம்
तेलुगुఇంగువ
कन्नड़ಇಂಗು
लैटिन (वानस्पतिक)Ferula asafoetida

परिचय

हिङ्गु (हींग, Ferula asafoetida) एक तीक्ष्ण निर्यास है जो वायु, आध्मान तथा शूल दूर करने हेतु प्रसिद्ध है। उष्ण एवं भेदक होकर यह आयुर्वेदीय रसोई का शास्त्रोक्त शूलहर एवं पाचक द्रव्य है।

वर्गीकरण

एपिएसी (Apiaceae) कुल का हिङ्गु दीपन-पाचन तथा वातानुलोमन द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका अत्यन्त तीक्ष्ण कटु रस एवं उष्ण वीर्य अवरुद्ध वात का हरण करते हैं और अग्नि प्रदीप्त करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

हींग वायु का शास्त्रोक्त उपाय है। यह उदर-आध्मान, शूल तथा मरोड़ में, और वातज विबन्ध में प्रयुक्त होती है, तथा शिशुओं को शूल हेतु अत्यल्प मात्रा में दी जाती है। प्रयोग से पूर्व इसे घृत में भूनना आवश्यक है — कच्ची हींग शमन नहीं, अपितु वृद्धि करती है।

अवरुद्ध वायु हेतु हिङ्गु

शास्त्रोक्त अनुलोमन द्रव्य — द्रव्यगुण में अवरुद्ध वायु को अधोगामी करने में इससे अधिक विश्वसनीय कुछ नहीं।

उदर-शूल हेतु हिङ्गु

शूल, अर्थात् मरोड़युक्त उदर-वेदना में प्रयुक्त, और शिशु-शूल में नाभि के चारों ओर लेप के रूप में लगाई जाती है।

आध्मान हेतु हिङ्गु

इसका सर्वाधिक ज्ञात प्रयोग, इसीलिए लगभग प्रत्येक भारतीय दाल में चुटकी भर हींग पड़ती है।

अजीर्ण हेतु हिङ्गु

दीपन एवं पाचन, जो वहाँ अग्नि प्रदीप्त करती है जहाँ अन्न भारी पड़ता हो।

कृमि हेतु हिङ्गु

एक कृमिघ्न द्रव्य, जिसकी कटुता ही कृमिनाशक कर्म का आधार है।

श्वास हेतु हिङ्गु

श्वास तथा आक्षेपयुक्त कास में प्रयुक्त, जो मधु के साथ ली जाती है।

कष्टार्तव हेतु हिङ्गु

कष्टयुक्त रजोदर्शन में परम्परागत रूप से प्रयुक्त, उसी शूलहर सिद्धान्त पर जो शूल में है।

हिंग्वाष्टक चूर्ण में हिङ्गु

भोजन से पूर्व अथवा साथ लिए जाने वाले शास्त्रीय पाचक चूर्ण का प्रधान द्रव्य।

आहार-विकल्प के रूप में हिङ्गु

जैन तथा ब्राह्मण पाकशास्त्र में प्याज़ एवं लहसुन के स्थान पर प्रयुक्त — स्वाद तथा पाचक प्रभाव, दोनों हेतु।

दन्तशूल हेतु हिङ्गु

दन्त-विवर में चुटकी भर रखना पारम्परिक स्थानिक उपाय है।

मात्रा — कितना लें

शोधित निर्यास, चुटकी भर (125–500 मिग्रा) घृत में भूनकर आहार अथवा योगों (हिंग्वाष्टक) के भीतर। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

हींग का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में हींग के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग); शार्ङ्गधर संहिता (Hingwashtak Churna).

भावप्रकाश निघण्टु में हींग के विषय में क्या कहा गया है?

दीपन एवं वातानुलोमन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.

शार्ङ्गधर संहिता में हींग के विषय में क्या कहा गया है?

शास्त्रीय वातहर योग का प्रधान घटक। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Hingwashtak Churna.

आयुर्वेद में हींग किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

हींग वायु का शास्त्रोक्त उपाय है। यह उदर-आध्मान, शूल तथा मरोड़ में, और वातज विबन्ध में प्रयुक्त होती है, तथा शिशुओं को शूल हेतु अत्यल्प मात्रा में दी जाती है। प्रयोग से पूर्व इसे घृत में भूनना आवश्यक है — कच्ची हींग शमन नहीं, अपितु वृद्धि करती है।

हींग के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, गुण लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: वात और कफ का शमन. प्रभाव: दीपन, शूलहर.

हींग को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। हींग का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और कफ का शमन.

हींग का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: निर्यास (गुग्गुल).

हींग की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

शोधित निर्यास, चुटकी भर (125–500 मिग्रा) घृत में भूनकर आहार अथवा योगों (हिंग्वाष्टक) के भीतर। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

हींग का प्रयोग कब वर्जित है?

अल्प मात्रा में प्रयुक्त; सदैव पकाकर अथवा संस्कारित करके। गर्भावस्था तथा उच्च पित्त में सावधानी से प्रयोग करें।

हींग कहाँ पाया जाता है?

हींग ईरान तथा अफ़ग़ानिस्तान के मूल निवासी Ferula जाति का शुष्क निर्यास है, जो शास्त्रीय प्रयोग हेतु भारत में आयात किया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
    दीपन एवं वातानुलोमन के रूप में वर्णित।
  • शार्ङ्गधर संहिता — Hingwashtak Churna
    शास्त्रीय वातहर योग का प्रधान घटक।

Modern research

  1. Ferula asafoetida oleo-gum resin alleviates dyspepsia symptoms through modulation of the microbiome-gut-brain axis: A randomized, double-blind, placebo-controlled study (see source). (2024)

    A randomized double-blind placebo-controlled study reporting Ferula asafoetida (Hingu) oleo-gum resin relieved dyspepsia symptoms, consistent with its antispasmodic digestive action.

    View study doi:10.1097/MD.0000000000044590

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

अल्प मात्रा में प्रयुक्त; सदैव पकाकर अथवा संस्कारित करके। गर्भावस्था तथा उच्च पित्त में सावधानी से प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

हींग ईरान तथा अफ़ग़ानिस्तान के मूल निवासी Ferula जाति का शुष्क निर्यास है, जो शास्त्रीय प्रयोग हेतु भारत में आयात किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हींग किसमें प्रयुक्त होती है?

हिङ्गु अवरुद्ध वायु, आध्मान तथा उदर-शूल हेतु आयुर्वेद का प्रधान उपाय है। यह अजीर्ण, कृमि, श्वास, आक्षेपयुक्त कास तथा कष्टार्तव में भी प्रयुक्त होती है, और हिंग्वाष्टक चूर्ण का प्रधान द्रव्य है।

हिङ्गु की मात्रा क्या है?

प्रतिदिन 125 मिग्रा से 500 मिग्रा के बीच — चुटकी भर, चम्मच भर नहीं। प्रयोग से पूर्व इसे प्रायः सदैव घृत या तैल में क्षण भर भूना जाता है, जिससे गन्ध मृदु होती है और वह सुपाच्य बनती है।

कच्ची हींग की गन्ध इतनी तीव्र क्यों होती है?

निर्यास में उपस्थित गन्धक-यौगिकों के कारण। स्नेह में गर्म करने पर वे विघटित हो जाते हैं और गन्ध पूर्णतः बदल जाती है — तीक्ष्ण से प्याज़-लहसुन जैसी स्वादिष्ट। इसीलिए इसे कभी कच्चा नहीं डाला जाता।

क्या हींग वायु एवं आध्मान में अच्छी है?

ठीक इसी हेतु यह शास्त्रोक्त द्रव्य है, और इसीलिए भारत भर में दाल तथा राजमा जैसे व्यंजनों में चुटकी भर पड़ती है। इसका शूलहर एवं वातानुलोमन कर्म बेहतर स्थापित पारम्परिक प्रयोगों में से एक है।

क्या शिशुओं को शूल हेतु हींग दी जा सकती है?

नाभि के चारों ओर लेप लगाना शिशु-शूल की पारम्परिक विधि है और वह बाह्य है, निगली नहीं जाती। चिकित्सक के निर्देश के बिना शिशु को यह आन्तरिक रूप से न दें, और शिशु के दीर्घ रुदन में चिकित्सक को दिखाएँ।

हिङ्गु किसे नहीं लेनी चाहिए?

औषधीय मात्रा में गर्भावस्था में वर्जित। अम्लपित्त, परिणामशूल अथवा शोथयुक्त आन्त्र-विकार होने पर परामर्श लें, क्योंकि यह प्रबल उष्ण है। यह रक्त पतला करने वाली औषधि से प्रतिक्रिया कर सकती है।

क्या बाज़ार की हींग शुद्ध होती है?

प्रायः नहीं। अधिकांश खुदरा हींग गेहूँ या चावल के आटे तथा गोंद के साथ मिश्रित होती है, जिसमें निर्यास प्रायः कुछ ही प्रतिशत होता है। सीलिएक रोग होने पर यह महत्त्वपूर्ण है — लेबल देखें, क्योंकि ग्लूटेन-रहित मिश्रित हींग भी उपलब्ध है।

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