कचनार (Bauhinia variegata) — bark
कचनार — Bauhinia variegata. प्रयोज्य अंग: त्वक्.
चित्र: J.M.Garg / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

कचनार काञ्चनार

Bauhinia variegata · Fabaceae

अन्य नाम: कचनार, कांचनार छाल, कंचनार

प्रयोज्य अंग: त्वक्

काञ्चनार (Bauhinia variegata) कचनार है, जिसकी त्वक् ग्रन्थि-शोथ हेतु आयुर्वेद का प्रधान द्रव्य है। यह थायरॉइड गाँठों, गलगण्ड, पुटी, मेदार्बुद तथा लसीका-ग्रन्थि वृद्धि में प्रयुक्त होती है, और काञ्चनार गुग्गुलु — गाँठों एवं शोथ का मानक योग — का प्रधान घटक है।

कचनार — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकषाय, तिक्त
गुणलघु, रूक्ष
वीर्यशीत
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और पित्त का शमन
प्रभावGandamala-hara (glands, thyroid)

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Bauhinia variegata
  • प्रयोज्य अंग: त्वक्
  • दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
  • सामान्य मात्रा: त्वक् क्वाथ/चूर्ण 3–6 ग्राम; शास्त्रोक्त रूप से काञ्चनार गुग्गुलु के रूप में।

कचनार के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीकचनार
अंग्रेज़ीOrchid Tree, Mountain Ebony
संस्कृतकाञ्चनार, गण्डारि
बंगालीকাঞ্চন
गुजरातीકંચનાર
मराठीकांचन
तमिलசிகப்பு மந்தாரை
तेलुगुదేవకాంచనము
कन्नड़ಕೇಂಜಿಗೆ
लैटिन (वानस्पतिक)Bauhinia variegata

परिचय

काञ्चनार (Bauhinia variegata) ग्रन्थियों एवं गाँठों हेतु प्रमुख द्रव्य है — काञ्चनार गुग्गुलु का प्रधान घटक, जो थायरॉइड-शोथ, लसीका-ग्रन्थियों तथा पुटियों में प्रयुक्त होता है। कषाय एवं लेखन होकर यह कफ-संचय को खुरचता है।

वर्गीकरण

फैबेसी (Fabaceae) कुल की काञ्चनार गण्डमालाहर तथा कफ-पित्त शामक द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कषाय-तिक्त रस एवं लघु-रूक्ष गुण कफज वृद्धियों को खुरच देते हैं।

उपयोग एवं लाभ

काञ्चनार त्वक् गण्डमाला — ग्रीवा की ग्रन्थि-सूजन — तथा पुटी, मेदार्बुद एवं लसीका-अवरोध का शास्त्रोक्त द्रव्य है। यह प्रायः सदैव काञ्चनार गुग्गुलु के रूप में दी जाती है, अकेले नहीं, जहाँ गुग्गुलु उसके कर्म को गहरी धातुओं तक ले जाता है।

थायरॉइड-शोथ हेतु काञ्चनार

इसका प्रमुखतम आधुनिक प्रयोग। शास्त्रोक्त गण्डमाला द्रव्य, जो काञ्चनार गुग्गुलु के भीतर गलगण्ड तथा थायरॉइड गाँठों में प्रयुक्त होता है।

लसीका-ग्रन्थि वृद्धि हेतु काञ्चनार

मूल गण्डमाला संकेत — ग्रीवा की सूजी ग्रन्थियाँ — जो समस्त शास्त्रों में अभिलिखित है।

पुटी एवं मेदार्बुद हेतु काञ्चनार

ग्रन्थि में प्रयुक्त, जो सौम्य गाँठों तथा मेद-वृद्धियों को समाहित करने वाला शास्त्रीय वर्ग है।

PCOS हेतु काञ्चनार

उसी ग्रन्थि-सिद्धान्त पर अण्डाशय-पुटियों हेतु भारतीय परम्परा में व्यापक रूप से प्रयुक्त।

भगन्दर हेतु काञ्चनार

भगन्दर में नामित — यह सुदीर्घ शास्त्रीय संकेत है।

त्वचा-रोग हेतु काञ्चनार

कुष्ठ में प्रयुक्त; जीर्ण शोथयुक्त त्वचा-विकारों में आन्तरिक रूप से लिया जाता है।

अतिसार हेतु काञ्चनार

त्वक् कषाय है और द्रव मल में प्रयुक्त होती है — यह गौण संकेत है।

व्रण हेतु काञ्चनार

क्षतों पर बाह्य रूप से लगाई जाती है तथा आन्तरिक व्रणों हेतु आन्तरिक रूप से ली जाती है।

स्थौल्य हेतु काञ्चनार

मेद-गाँठों पर अपने कर्म के साथ-साथ मेदोरोग में भी प्रयुक्त।

काञ्चनार गुग्गुलु में काञ्चनार

ग्रन्थि-शोथ हेतु शास्त्रीय योग का प्रधान द्रव्य, जो सर्वाधिक निर्दिष्ट गुग्गुलु कल्पों में से एक है।

मात्रा — कितना लें

त्वक् क्वाथ/चूर्ण 3–6 ग्राम; शास्त्रोक्त रूप से काञ्चनार गुग्गुलु के रूप में। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

कचनार का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में कचनार के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग); शार्ङ्गधर संहिता (Kanchanara Guggulu).

भावप्रकाश निघण्टु में कचनार के विषय में क्या कहा गया है?

गण्डमालाहर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग.

शार्ङ्गधर संहिता में कचनार के विषय में क्या कहा गया है?

शास्त्रीय ग्रन्थि-शोथ योग का प्रधान द्रव्य। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Kanchanara Guggulu.

आयुर्वेद में कचनार किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

काञ्चनार त्वक् गण्डमाला — ग्रीवा की ग्रन्थि-सूजन — तथा पुटी, मेदार्बुद एवं लसीका-अवरोध का शास्त्रोक्त द्रव्य है। यह प्रायः सदैव काञ्चनार गुग्गुलु के रूप में दी जाती है, अकेले नहीं, जहाँ गुग्गुलु उसके कर्म को गहरी धातुओं तक ले जाता है।

कचनार के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कषाय, तिक्त, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: Gandamala-hara (glands, thyroid).

कचनार को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। कचनार का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.

कचनार का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: त्वक्.

कचनार की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

त्वक् क्वाथ/चूर्ण 3–6 ग्राम; शास्त्रोक्त रूप से काञ्चनार गुग्गुलु के रूप में। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

कचनार का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; थायरॉइड अवस्थाओं में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

कचनार कहाँ पाया जाता है?

काञ्चनार भारत भर में सामान्य एक पुष्पित वृक्ष है, जिस पर वसन्त में मनोहर गुलाबी-बैंगनी पुष्प लगते हैं।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग
    गण्डमालाहर के रूप में वर्णित।
  • शार्ङ्गधर संहिता — Kanchanara Guggulu
    शास्त्रीय ग्रन्थि-शोथ योग का प्रधान द्रव्य।

Modern research

  1. Isolation of Phytochemicals from Bauhinia variegata L. Bark and Their In Vitro Antioxidant and Cytotoxic Potential (see source). Molecules (2019)

    A study isolating antioxidant and cytotoxic phytochemicals (kaempferol, protocatechuic acid) from Bauhinia variegata (Kanchanara) bark.

    View study doi:10.3390/antiox8100492
  2. Bauhinia variegata Leaf Extracts Exhibit Considerable Antibacterial, Antioxidant, and Anticancer Activities (see source). (2013)

    A study reporting antibacterial, antioxidant and anticancer activity of Bauhinia variegata (Kanchanara) leaf extracts.

    View study doi:10.1155/2013/915436

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; थायरॉइड अवस्थाओं में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

काञ्चनार भारत भर में सामान्य एक पुष्पित वृक्ष है, जिस पर वसन्त में मनोहर गुलाबी-बैंगनी पुष्प लगते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

काञ्चनार किसमें प्रयुक्त होती है?

काञ्चनार त्वक् ग्रन्थि-शोथ का शास्त्रोक्त द्रव्य है: थायरॉइड गाँठें एवं गलगण्ड, सूजी लसीका-ग्रन्थियाँ, पुटी, मेदार्बुद तथा PCOS। यह काञ्चनार गुग्गुलु का प्रधान घटक है, जो गाँठों हेतु मानक आयुर्वेदीय योग है।

क्या काञ्चनार गुग्गुलु थायरॉइड गाँठों में सहायक है?

ठीक इसी हेतु यह शास्त्रीय योग है और भारतीय परम्परा में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है। यह सहायक है, निदानकारी नहीं — थायरॉइड गाँठों को अल्ट्रासाउण्ड परीक्षण एवं क्रिया-जाँच चाहिए, और शीघ्रता से बढ़ती किसी भी गाँठ की तत्काल जाँच आवश्यक है।

काञ्चनार की मात्रा क्या है?

त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। काञ्चनार गुग्गुलु के रूप में प्रायः दो वटी दिन में दो बार उष्ण जल के साथ, अथवा निर्देशानुसार। इसे सप्ताहों नहीं, मासों तक लिया जाता है।

क्या काञ्चनार PCOS में सहायक है?

यह व्यापक दृष्टिकोण के भीतर अण्डाशय-पुटियों हेतु सामान्यतः प्रयुक्त होती है। PCOS एक चयापचय एवं हार्मोन सम्बन्धी अवस्था है और उसे आहार, वज़न-प्रबन्धन तथा प्रायः चिकित्सकीय उपचार भी चाहिए — कोई एक द्रव्य उसे हल नहीं करेगा।

काञ्चनार किसे नहीं लेनी चाहिए?

गर्भावस्था में तथा थायरॉइड-रोग होने या थायरॉइड की औषधि लेने पर चिकित्सक से परामर्श लें, क्योंकि यह थायरॉइड-क्रिया को प्रभावित करती है। काञ्चनार गुग्गुलु के रूप में उस पर गुग्गुलु की अतिरिक्त सावधानियाँ भी लागू होती हैं, जिनमें रक्त पतला करने वाली औषधियों से प्रतिक्रिया सम्मिलित है।

काञ्चनार को हिन्दी में क्या कहते हैं?

कचनार। अंग्रेज़ी में माउण्टेन एबोनी, ऑर्किड ट्री अथवा कैमल्स फ़ुट ट्री — पत्ता विभाजित खुर के आकार का होता है। उत्तर भारत भर में इसकी पुष्प-कलिकाएँ शाक के रूप में खाई जाती हैं।

काञ्चनार को किसी सूजन पर प्रभाव दिखाने में कितना समय लगता है?

मास। शास्त्रीय परम्परा किसी ग्रन्थि-शोथ पर प्रभाव आँकने से पूर्व तीन से छह मास के निरन्तर प्रयोग की अपेक्षा रखती है, तुलना हेतु प्रतिबिम्बन के साथ। जो गाँठ बढ़े, कठोर हो अथवा शूलयुक्त हो जाए, उसकी तत्काल चिकित्सकीय समीक्षा आवश्यक है।

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