खैर (Senegalia catechu) — heartwood
खैर — Senegalia catechu. प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ.
चित्र: Dinesh Valke from Thane, India / Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

खैर खदिर

Senegalia catechu · Fabaceae

अन्य नाम: Acacia catechu, कत्था, खैर, खेर, कच्छ वृक्ष

प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ

खदिर (Senegalia catechu) कत्था-वृक्ष है, जिसके सारकाष्ठ का सत्त्व त्वचा-रोग हेतु आयुर्वेद का प्रमुखतम द्रव्य है। खदिरसार अथवा कत्था के नाम से ज्ञात यह अत्यन्त कषाय है और जीर्ण त्वचा-विकार, मुख-व्रण, रक्तस्रावी मसूड़ों तथा अतिसार में प्रयुक्त होता है। यही पान का कत्था भी है।

खैर — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कषाय
गुणलघु, रूक्ष
वीर्यशीत
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और पित्त का शमन
प्रभावकुष्ठघ्न (skin), कृमिघ्न

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Senegalia catechu
  • प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ
  • दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
  • सामान्य मात्रा: सारकाष्ठ चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; खदिरारिष्ट प्रचलित योग है।

खैर के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीखैर
अंग्रेज़ीCatechu, Cutch Tree
संस्कृतखदिर, दन्तधावन
बंगालीখয়ের
गुजरातीખેર
मराठीखैर
तमिलகருங்காலி
तेलुगुచండ్ర
कन्नड़ಕಗ್ಗಲಿ
लैटिन (वानस्पतिक)Senegalia catechu

परिचय

खदिर (Senegalia catechu) त्वचा हेतु आयुर्वेद का प्रमुख द्रव्य है — इसका सारकाष्ठ, जो कत्थे का स्रोत है, रक्त का शोधन करता है और जीर्ण त्वचा-रोग दूर करता है। यह खदिरारिष्ट का आधार है।

वर्गीकरण

फैबेसी (Fabaceae) कुल का खदिर कुष्ठघ्न द्रव्यों का नेतृत्व करता है। इसका तिक्त-कषाय रस एवं शीत वीर्य कफ-पित्त का हरण करते हैं, रक्त का शोधन करते हैं और अतिरिक्त स्राव को सुखाते हैं।

उपयोग एवं लाभ

खदिर प्रमुखतम कुष्ठघ्न द्रव्य है, जो जीर्ण त्वचा-रोग, कण्डू तथा न भरने वाले क्षतों में, और दीर्घ क्रमों में रक्तशोधक के रूप में प्रयुक्त होता है। इसकी कषायता उसे दन्त-द्रव्य भी बनाती है, जो मसूड़ों के रोग तथा शिथिल दाँतों में क्वाथ अथवा खदिरारिष्ट के रूप में प्रयुक्त होता है।

जीर्ण त्वचा-रोग हेतु खदिर

शास्त्रों का प्रमुखतम कुष्ठघ्न द्रव्य, जो विचर्चिका, सोरायसिस तथा जीर्ण कण्डू हेतु दीर्घ क्रमों में लिया जाता है।

मुख-व्रण हेतु खदिर

इसकी कषायता उसे मुखपाक का शास्त्रोक्त गण्डूष बनाती है, और यही वह कत्था है जो पान के पत्तों पर लगाया जाता है।

रक्तस्रावी मसूड़ों हेतु खदिर

शिथिल, रक्तस्रावी मसूड़ों हेतु दन्तमञ्जनों एवं गण्डूषों में प्रयुक्त।

अतिसार हेतु खदिर

अत्यन्त कषाय होने से जीर्ण द्रव मल तथा प्रवाहिका में प्रयुक्त।

व्रण हेतु खदिर

देर से भरने वाले व्रणों एवं क्षतों पर चूर्ण अथवा प्रक्षालन के रूप में लगाया जाता है।

कण्ठ-शूल हेतु खदिर

कण्ठ-क्षोभ एवं स्वरभेद में धीरे-धीरे चूसा जाता है अथवा गण्डूष के रूप में प्रयुक्त होता है।

प्रमेह हेतु खदिर

प्रमेहहर द्रव्यों में नामित, जो योगों के भीतर प्रयुक्त होता है।

कास हेतु खदिर

उस कास में प्रयुक्त जो कण्ठ-क्षोभ से जुड़ी हो।

स्थौल्य हेतु खदिर

विकृत मेद-चयापचय में प्रयुक्त मेदोहर द्रव्य।

खदिरारिष्ट में खदिर

त्वचा-रोग हेतु शास्त्रीय सन्धान-कल्प का प्रधान द्रव्य, जो सर्वाधिक निर्दिष्ट अरिष्टों में से एक है।

मात्रा — कितना लें

सारकाष्ठ चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; खदिरारिष्ट प्रचलित योग है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

खैर का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में खैर के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (कुष्ठ चिकित्सा); भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग).

सुश्रुत संहिता में खैर के विषय में क्या कहा गया है?

त्वचा-रोगों हेतु श्रेष्ठ उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — कुष्ठ चिकित्सा.

भावप्रकाश निघण्टु में खैर के विषय में क्या कहा गया है?

प्रमुख कुष्ठघ्न द्रव्य के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग.

आयुर्वेद में खैर किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

खदिर प्रमुखतम कुष्ठघ्न द्रव्य है, जो जीर्ण त्वचा-रोग, कण्डू तथा न भरने वाले क्षतों में, और दीर्घ क्रमों में रक्तशोधक के रूप में प्रयुक्त होता है। इसकी कषायता उसे दन्त-द्रव्य भी बनाती है, जो मसूड़ों के रोग तथा शिथिल दाँतों में क्वाथ अथवा खदिरारिष्ट के रूप में प्रयुक्त होता है।

खैर के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: कुष्ठघ्न (skin), कृमिघ्न.

खैर को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। खैर का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.

खैर का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ.

खैर की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

सारकाष्ठ चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; खदिरारिष्ट प्रचलित योग है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

खैर का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

खैर कहाँ पाया जाता है?

खदिर भारत भर के शुष्क वनों एवं मैदानों का कण्टकयुक्त पर्णपाती वृक्ष है, जिसके गहरे सारकाष्ठ से कत्था प्राप्त होता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग
    प्रमुख कुष्ठघ्न द्रव्य के रूप में वर्णित।
  • चरक एवं सुश्रुत संहिता — कुष्ठ चिकित्सा
    त्वचा-रोगों हेतु श्रेष्ठ उल्लिखित।

Modern research

  1. Acacia catechu (L.f.) Willd.: A Review on Bioactive Compounds and Their Health Promoting Functionalities (see source). Molecules (2022)

    A review of Acacia catechu (Khadira) documenting its catechin-rich antimicrobial, antioxidant, anti-inflammatory and oral-health functionalities.

    View study doi:10.3390/plants11223091
  2. In Vitro Antimicrobial Activity of Acacia catechu and Its Phytochemical Analysis (see source). Indian Journal of Microbiology (2011)

    A study reporting antimicrobial activity of Acacia catechu (Khadira) extracts against oral and enteric pathogens including Streptococcus mutans.

    View study doi:10.1007/s12088-011-0061-1

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

खदिर भारत भर के शुष्क वनों एवं मैदानों का कण्टकयुक्त पर्णपाती वृक्ष है, जिसके गहरे सारकाष्ठ से कत्था प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खदिर किसमें प्रयुक्त होता है?

खदिर त्वचा हेतु आयुर्वेद का प्रधान द्रव्य है, जो विचर्चिका, सोरायसिस एवं जीर्ण कण्डू में, और मुख-व्रण, रक्तस्रावी मसूड़ों, कण्ठ-शूल तथा अतिसार में भी प्रयुक्त होता है। यह खदिरारिष्ट का प्रधान घटक है।

खदिर की मात्रा क्या है?

सारकाष्ठ सत्त्व प्रतिदिन 500 मिग्रा – 2 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली। खदिरारिष्ट के रूप में 15–30 मिली समान मात्रा जल के साथ, भोजनोपरान्त, दिन में दो बार।

क्या पान का कत्था और खदिर एक ही हैं?

हाँ। कत्था Senegalia catechu के सारकाष्ठ का सत्त्व है, वही द्रव्य जो औषधीय रूप से खदिरसार कहलाता है। पान खाने पर मुख में जो कसाव अनुभव होता है, वह इसी की कषायता है।

त्वचा पर खदिरारिष्ट का प्रभाव दिखने में कितना समय लगता है?

शास्त्रीय परम्परा में जीर्ण त्वचा-विकारों की चिकित्सा मासों में होती है। प्रभाव आँकने से पूर्व आठ से बारह सप्ताह की अपेक्षा रखें, जिसे आहार-सम्बन्धी उपायों के साथ निरन्तर लिया जाए।

खदिर को हिन्दी में क्या कहते हैं?

खैर अथवा कत्था। अंग्रेज़ी में कच वृक्ष अथवा ब्लैक कैटेचू। वानस्पतिक नाम Acacia catechu से Senegalia catechu किया गया है, अतः पुराने स्रोत पहला नाम देते हैं।

क्या खदिर के दुष्प्रभाव हैं?

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। अत्यन्त कषाय होने से दीर्घ प्रयोग विबन्ध तथा रूक्षता कर सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें। अत्यधिक मात्रा आमाशय में क्षोभ कर सकती है।

क्या खदिर दाँतों हेतु अच्छा है?

रक्तस्रावी मसूड़ों एवं मुख-व्रणों हेतु यह आयुर्वेदीय दन्तमञ्जनों का मानक घटक है, जो चूर्ण अथवा गण्डूष के रूप में प्रयुक्त होता है। यह दन्त-चिकित्सा का पूरक है, प्रतिस्थापन नहीं।

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