चित्र: J.M.Garg / Wikimedia Commons, CC BY 3.0
कुटज, कुड़ा कुटज
Holarrhena antidysenterica · Apocynaceae
अन्य नाम: कुरची, इन्द्रजौ, कुटज छाल, कुड़ा की छाल, कुड़ा की जड़
प्रयोज्य अंग: त्वक्, बीज
कुटज (Holarrhena antidysenterica) एक छोटा वृक्ष है जिसकी त्वक् एवं बीज प्रवाहिका हेतु आयुर्वेद का विशिष्ट द्रव्य हैं। इसका वानस्पतिक नाम ही संकेत बता देता है। यह अमीबीय एवं जीवाणुजन्य प्रवाहिका, जीर्ण अतिसार तथा रक्तार्श में प्रयुक्त होता है, और भारत भर में आज भी प्रथम पंक्ति का पारम्परिक उपाय है।
| रस | तिक्त, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और पित्त का शमन |
| प्रभाव | ग्राही, antidysenteric |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Holarrhena antidysenterica
- प्रयोज्य अंग: त्वक्, बीज
- दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
- सामान्य मात्रा: त्वक् चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; कुटजारिष्ट तथा कुटजघन वटी प्रचलित योग हैं।
कुटज, कुड़ा के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
कुटज (Holarrhena antidysenterica) अतिसार एवं प्रवाहिका हेतु आयुर्वेद का प्रमुखतम द्रव्य है। इसकी त्वक् एवं बीज द्रव मल रोकते हैं और आन्त्र की संक्रामक, शोथयुक्त अवस्थाएँ दूर करते हैं — कुटजारिष्ट तथा कुटजघन वटी का यही आधार है।
वर्गीकरण
एपोसाइनेसी (Apocynaceae) कुल का कुटज प्रवाहिकाहर तथा ग्राही द्रव्यों का नेतृत्व करता है। इसका तिक्त-कषाय रस एवं शीत वीर्य पित्त-कफ का शमन करते हैं और मल को दृढ़ करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
कुटज प्रवाहिका हेतु आयुर्वेद का विशिष्ट द्रव्य है। त्वक् अतिसार तथा प्रवाहिका — आम, रक्त एवं प्रवाहण सहित अतिसार — में और आन्त्र के अमीबीय संक्रमण में प्रयुक्त होती है। यह स्तम्भन एवं ग्राही है, जो पाचन रोके बिना स्राव को रोकता है।
प्रवाहिका हेतु कुटज
इसका परिभाषक प्रयोग, जो इसके वानस्पतिक नाम में ही अंकित है। विशेषतः अमीबीय प्रवाहिका में प्रभावी, जहाँ शास्त्र अत्यन्त स्पष्ट हैं।
जीर्ण अतिसार हेतु कुटज
अतिसार में प्रयुक्त, विशेषतः वहाँ जहाँ व्याधि बनी रही हो और अन्य उपाय विफल रहे हों।
क्षुब्ध कोष्ठ हेतु कुटज
कषायता एवं पाचक कर्म का इसका संयोग आम सहित अनिश्चित कोष्ठ-प्रवृत्ति के अनुकूल बैठता है।
रक्तार्श हेतु कुटज
एक रक्तस्तम्भक द्रव्य, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ अर्श से रक्तस्राव हो।
आन्त्र-परजीवियों हेतु कुटज
एक कृमिघ्न द्रव्य, जिसका कर्म अमीबा से आगे बढ़कर आन्त्र-कृमियों तक जाता है।
अतिसार-युक्त ज्वर हेतु कुटज
वहाँ प्रयुक्त जहाँ दोनों साथ हों, जो प्रतिरूपी संक्रामक चित्र है।
इन्द्रयव के रूप में कुटज बीज
बीज शास्त्रों में पृथक् द्रव्य है, जो समान रूप से प्रयुक्त होता है और प्रवाहिका में कभी-कभी वरीय माना जाता है।
त्वचा-रोग हेतु कुटज
एक गौण शास्त्रीय संकेत, जो जीर्ण कुष्ठ में आन्तरिक रूप से लिया जाता है।
अत्यधिक तृष्णा हेतु कुटज
तृष्णा में नामित, विशेषतः वह तृष्णा जो दीर्घ अतिसार के साथ आती है।
कुटजारिष्ट एवं कुटजघन वटी में कुटज
प्रवाहिका तथा जीर्ण द्रव मल हेतु दोनों शास्त्रीय कल्पों का प्रधान द्रव्य।
मात्रा — कितना लें
त्वक् चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; कुटजारिष्ट तथा कुटजघन वटी प्रचलित योग हैं। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
कुटज, कुड़ा का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में कुटज, कुड़ा के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (अतिसार एवं ग्रहणी); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
सुश्रुत संहिता में कुटज, कुड़ा के विषय में क्या कहा गया है?
अतिसार एवं प्रवाहिका हेतु श्रेष्ठ उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — अतिसार एवं ग्रहणी.
भावप्रकाश निघण्टु में कुटज, कुड़ा के विषय में क्या कहा गया है?
प्रमुख प्रवाहिकाहर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में कुटज, कुड़ा किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
कुटज प्रवाहिका हेतु आयुर्वेद का विशिष्ट द्रव्य है। त्वक् अतिसार तथा प्रवाहिका — आम, रक्त एवं प्रवाहण सहित अतिसार — में और आन्त्र के अमीबीय संक्रमण में प्रयुक्त होती है। यह स्तम्भन एवं ग्राही है, जो पाचन रोके बिना स्राव को रोकता है।
कुटज, कुड़ा के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: ग्राही, antidysenteric.
कुटज, कुड़ा को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। कुटज, कुड़ा का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.
कुटज, कुड़ा का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: त्वक्, बीज.
कुटज, कुड़ा की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
त्वक् चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; कुटजारिष्ट तथा कुटजघन वटी प्रचलित योग हैं। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
कुटज, कुड़ा का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
कुटज, कुड़ा कहाँ पाया जाता है?
कुटज भारत भर के शुष्क पर्णपाती वनों तथा पर्वतीय ढलानों का छोटा पर्णपाती वृक्ष है, जिसकी त्वक् एवं बीज औषधि हेतु संचित किए जाते हैं।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
प्रमुख प्रवाहिकाहर के रूप में वर्णित। - चरक एवं सुश्रुत संहिता — अतिसार एवं ग्रहणी
अतिसार एवं प्रवाहिका हेतु श्रेष्ठ उल्लिखित।
Modern research
-
Expanded Therapeutic Applications of Holarrhena Antidysenterica: A Review
(see source). Cureus (2023)
A review summarising expanded therapeutic applications of Holarrhena antidysenterica, including its antidysenteric and antimicrobial actions.
View study doi:10.2174/1386207326666230821102502 -
Review of Holarrhena antidysenterica (L.) Wall. ex A. DC.: Pharmacognostic, Pharmacological, and Toxicological Perspective
(see source). Pharmacognosy Reviews (2017)
A comprehensive review documenting Holarrhena antidysenterica (Kutaja)'s antidiarrhoeal, antibacterial and anti-inflammatory activities.
View study doi:10.4103/phrev.phrev_31_16
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
कुटज भारत भर के शुष्क पर्णपाती वनों तथा पर्वतीय ढलानों का छोटा पर्णपाती वृक्ष है, जिसकी त्वक् एवं बीज औषधि हेतु संचित किए जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कुटज किसमें प्रयुक्त होता है?
कुटज प्रवाहिका — विशेषतः अमीबीय — तथा जीर्ण अतिसार, क्षुब्ध कोष्ठ, रक्तार्श एवं आन्त्र-परजीवियों हेतु आयुर्वेद का विशिष्ट द्रव्य है। इसका वानस्पतिक नाम antidysenterica ही प्रधान प्रयोग अंकित करता है।
कुटज की मात्रा क्या है?
त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। कुटजघन वटी के रूप में प्रायः दो वटी दिन में दो या तीन बार। कुटजारिष्ट के रूप में 15–30 मिली जल के साथ भोजनोपरान्त।
क्या कुटज अमीबीय प्रवाहिका में प्रभावी है?
यह उसका शास्त्रोक्त द्रव्य है, जिसका दीर्घ अभिलेख है और आधुनिक कार्य भी उसका समर्थन करता है। अमीबीय प्रवाहिका को फिर भी उचित निदान तथा प्रायः विशिष्ट चिकित्सा चाहिए — ज्वर सहित तीव्र अथवा रक्तयुक्त अतिसार में स्वयं-चिकित्सा नहीं, चिकित्सक आवश्यक है।
इन्द्रयव क्या है?
उसी वृक्ष का बीज, जिसे शास्त्र पृथक् द्रव्य मानते हैं। यह प्रवाहिका एवं अतिसार में त्वक् की भाँति प्रयुक्त होता है, और कुछ चिकित्सक उसे वरीयता देते हैं। दोनों Holarrhena antidysenterica हैं।
कुटज को हिन्दी में क्या कहते हैं?
कुरची अथवा कुड़ा। अंग्रेज़ी में कोनेसी ट्री अथवा बिटर ओलियेण्डर। पुराने भैषज्य-संग्रहों में त्वक् को कभी-कभी कोनेसी बार्क कहा गया है।
क्या कुटज के दुष्प्रभाव हैं?
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। कषाय एवं तिक्त होने से दीर्घ प्रयोग विबन्ध तथा रूक्षता कर सकता है। गर्भावस्था में वर्जित। Wrightia tinctoria की त्वक् से अपमिश्रण सामान्य है — स्रोत अवश्य देखें।
कुटज कितनी शीघ्रता से कार्य करता है?
तीव्र प्रवाहिका में शास्त्रीय परम्परा कुछ दिनों में सुधार की अपेक्षा रखती है। यदि अतिसार उसके बाद भी बना रहे, उसमें रक्त हो, अथवा ज्वर या निर्जलीकरण साथ हो, तो स्वयं-चिकित्सा रोककर चिकित्सक से मिलें।