महुआ (Madhuca longifolia) — flower
महुआ — Madhuca longifolia. प्रयोज्य अंग: पुष्प.
चित्र: Swetapadma07 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

महुआ मधूक

Madhuca longifolia · Sapotaceae

अन्य नाम: महुआ, Madhuca indica

प्रयोज्य अंग: पुष्प

मधूक (Madhuca longifolia) महुआ वृक्ष है, जिसके मधुर मांसल पुष्प मध्य भारत में आहार तथा औषधि, दोनों हैं। आयुर्वेद पुष्प को दुर्बलता एवं कास में पोषक बल्य द्रव्य के रूप में तथा बीज-तैल को त्वचा एवं सन्धि-विकारों हेतु बाह्य रूप से प्रयुक्त करता है। इन पुष्पों से पारम्परिक मद्य भी बनाया जाता है।

महुआ — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसमधुर
गुणगुरु, स्निग्ध
वीर्यशीत
विपाकमधुर
दोष-कर्मवात और पित्त का शमन
प्रभावबृंहण (पोषक), शीतल

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Madhuca longifolia
  • प्रयोज्य अंग: पुष्प
  • दोष-कर्म: वात और पित्त का शमन
  • सामान्य मात्रा: पोषक योगों में पुष्प अथवा बीज के कल्प।

महुआ के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीमहुआ
अंग्रेज़ीMahua, Butter Tree
संस्कृतमधूक, मधुद्रुम
बंगालीমহুয়া
गुजरातीમહુડો
मराठीमोह
तमिलஇலுப்பை
तेलुगुఇప్ప
कन्नड़ಇಪ್ಪೆ
लैटिन (वानस्पतिक)Madhuca longifolia

परिचय

मधूक (Madhuca longifolia), अर्थात् महुआ, एक पोषक वन्य वृक्ष है जिसके मधुर पुष्प एवं बीज बल बनाते हैं और शरीर को शान्ति देते हैं। मधुर एवं शीत होकर यह बृंहण तथा वात-पित्त शामक द्रव्य है।

वर्गीकरण

सैपोटेसी (Sapotaceae) कुल का मधूक बृंहण (पोषक) तथा शीत द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका मधुर रस एवं गुरु-स्निग्ध गुण धातुओं का पोषण करते हैं और वात-पित्त का शमन करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

महुआ पुष्प एक मधुर, पोषक द्रव्य है जो दुर्बलता, शुष्क कास एवं तृष्णा में, और क्षय में वृष्य तथा बृंहण द्रव्य के रूप में प्रयुक्त होता है। इसकी शर्करा उसे सन्धान-आधार भी बनाती है, इसीलिए यह पुष्प अनेक शास्त्रीय अरिष्टों में सम्मिलित रहता है।

दुर्बलता हेतु मधूक

मधुर एवं पोषक होने से पुष्प कार्श्य तथा रोगोत्तर पुनर्लाभ में प्रयुक्त शास्त्रीय बल्य द्रव्य है, जो परम्परागत रूप से दूध के साथ लिया जाता है।

शुष्क कास हेतु मधूक

इसका माधुर्य स्निग्धकारी है, जो शुष्क क्षुब्ध कास के अनुकूल बैठता है, जहाँ कोई रूक्ष कफहर द्रव्य स्थिति बिगाड़ देता।

स्तन्य हेतु मधूक

प्रसव के पश्चात् दुग्ध-उत्पादन को सहारा देने हेतु दिया जाने वाला स्तन्यजनन द्रव्य।

त्वचा हेतु मधूक बीज-तैल

शुष्क त्वचा-विकारों, विचर्चिका तथा फटी एड़ियों में लगाया जाता है — तैल गाढ़ा एवं प्रबल स्निग्धकारी है।

सन्धि-शूल हेतु मधूक

बीज-तैल वातज सन्धि-विकारों में अभ्यंग हेतु प्रयुक्त होता है, प्रायः लगाने से पूर्व उष्ण किया जाता है।

दाह एवं तृष्णा हेतु मधूक

शीत एवं मधुर होने से उष्णता तथा अत्यधिक तृष्णा सहित पित्त-अवस्थाओं में प्रयुक्त।

मसूड़ों हेतु मधूक त्वक्

त्वक् का क्वाथ रक्तस्रावी मसूड़ों तथा मुख-व्रणों हेतु गण्डूष के रूप में प्रयुक्त होता है।

आहार के रूप में मधूक

शुष्क पुष्प मध्य भारत के जनजातीय क्षेत्रों में मुख्य मधुर आहार के रूप में खाए जाते हैं, और वे केवल पारम्परिक नहीं, वस्तुतः पोषक हैं।

रक्तस्राव-विकारों हेतु मधूक

त्वक् कषाय है और रक्तपित्त तथा अत्यधिक रजःस्राव में प्रयुक्त होती है।

शास्त्रीय योगों में मधूक

अनेक बल्य एवं वृष्य कल्पों में उपस्थित, तथा बीज-तैल शास्त्रीय अभ्यंग तैलों में सम्मिलित है।

मात्रा — कितना लें

पोषक योगों में पुष्प अथवा बीज के कल्प। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

महुआ का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में महुआ के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (Brimhaniya प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग).

चरक संहिता में महुआ के विषय में क्या कहा गया है?

पोषक द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — Brimhaniya प्रकरण.

भावप्रकाश निघण्टु में महुआ के विषय में क्या कहा गया है?

बृंहण एवं शीत के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग.

आयुर्वेद में महुआ किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

महुआ पुष्प एक मधुर, पोषक द्रव्य है जो दुर्बलता, शुष्क कास एवं तृष्णा में, और क्षय में वृष्य तथा बृंहण द्रव्य के रूप में प्रयुक्त होता है। इसकी शर्करा उसे सन्धान-आधार भी बनाती है, इसीलिए यह पुष्प अनेक शास्त्रीय अरिष्टों में सम्मिलित रहता है।

महुआ के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस मधुर, गुण गुरु, स्निग्ध, वीर्य शीत, विपाक मधुर. दोष-कर्म: वात और पित्त का शमन. प्रभाव: बृंहण (पोषक), शीतल.

महुआ को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। महुआ का वीर्य शीत है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और पित्त का शमन.

महुआ का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: पुष्प.

महुआ की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

पोषक योगों में पुष्प अथवा बीज के कल्प। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

महुआ का प्रयोग कब वर्जित है?

पारम्परिक प्रयोग में सामान्यतः सुरक्षित; पुष्पों का स्थानीय स्तर पर सन्धान भी किया जाता है (यह औषधीय प्रयोग नहीं है)।

महुआ कहाँ पाया जाता है?

महुआ मध्य एवं उत्तरी भारत के वनों का बड़ा पर्णपाती वृक्ष है, जिसके पुष्प वसन्त में एकत्र किए जाते हैं।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग
    बृंहण एवं शीत के रूप में वर्णित।
  • चरक संहिता — Brimhaniya प्रकरण
    पोषक द्रव्यों में उल्लिखित।

Modern research

  1. Evaluation of Antibacterial Activity of Madhuca longifolia (Mahua) Stem Extract Against Streptococcus mutans: An In Vitro Study (see source). Cureus (2024)

    A study reporting antibacterial activity of Madhuca longifolia (Madhuka / Mahua) stem extract against the oral pathogen Streptococcus mutans.

    View study doi:10.7759/cureus.52210

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

पारम्परिक प्रयोग में सामान्यतः सुरक्षित; पुष्पों का स्थानीय स्तर पर सन्धान भी किया जाता है (यह औषधीय प्रयोग नहीं है)।

प्राप्ति स्थान

महुआ मध्य एवं उत्तरी भारत के वनों का बड़ा पर्णपाती वृक्ष है, जिसके पुष्प वसन्त में एकत्र किए जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मधूक किसमें प्रयुक्त होता है?

पुष्प दुर्बलता, शुष्क कास, अल्प स्तन्य तथा तृष्णा में; बीज-तैल बाह्य रूप से शुष्क त्वचा, विचर्चिका एवं सन्धि-शूल में; और त्वक् रक्तस्रावी मसूड़ों हेतु गण्डूष के रूप में। पुष्प मध्य भारत भर में पारम्परिक आहार भी हैं।

मधूक की मात्रा क्या है?

शुष्क पुष्प प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः दूध के साथ। त्वक् क्वाथ 40–80 मिली। बीज-तैल बाह्य रूप से कठोर मात्रा-सीमा के बिना प्रयुक्त होता है।

क्या महुआ और मधूक एक ही हैं?

हाँ। महुआ हिन्दी नाम है और मधूक संस्कृत, दोनों Madhuca longifolia के लिए। अंग्रेज़ी में इसे बटर ट्री भी कहते हैं, इसके बीजों से निकलने वाले वसा के कारण।

क्या महुआ का मद्य इसके औषधीय प्रयोग से सम्बन्धित है?

मध्य भारत भर में इन्हीं पुष्पों से पारम्परिक आसुत मद्य बनाया जाता है, किन्तु वह एक पृथक् सांस्कृतिक प्रयोग है। औषधीय कल्प शुष्क पुष्प है, जो चूर्ण अथवा क्वाथ के रूप में लिया जाता है।

क्या मधूक के दुष्प्रभाव हैं?

पुष्प सुसह्य है और आहार के रूप में खाया जाता है। यह मधुर एवं गुरु है, अतः कफ बढ़ा सकता है और मन्दाग्नि अथवा स्थौल्य हेतु कम उपयुक्त है। मधुमेह-रोगी पुष्पों की शर्करा-मात्रा का ध्यान रखें।

क्या मधूक तैल मुख पर लगाया जा सकता है?

यह गाढ़ा एवं प्रबल स्निग्धकारी है, जो मुख की अपेक्षा अत्यन्त शुष्क त्वचा, फटी एड़ियों तथा शरीर पर लगाने के अधिक अनुकूल है। अधिकांश व्यक्तियों के मुख हेतु हल्के तैल श्रेष्ठ हैं।

क्या महुआ वृक्ष संरक्षित है?

यह मध्य भारत के जनजातीय समुदायों के लिए सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण है और व्यवहार में व्यापक रूप से संरक्षित रहता है। पुष्प विनाशकारी संचयन के स्थान पर भूमि से एकत्र किए जाते हैं, अतः आपूर्ति सामान्यतः सतत है।

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