चित्र: Jacopo188 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
चंदन, सफ़ेद चंदन चन्दन
Santalum album · Santalaceae
अन्य नाम: श्वेत चन्दन, सफ़ेद चन्दन, चन्दन
प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ
चन्दन (Santalum album) श्वेत चन्दन है, जिसका सुगन्धित सारकाष्ठ आयुर्वेद का प्रधान शीत द्रव्य है। यह दाह, ज्वर, तृष्णा, युवान-पिटिका तथा मूत्र-दाह में प्रयुक्त होता है — लेप रूप में लगाकर तथा आन्तरिक रूप से लेकर। यह वृक्ष भारत में संरक्षित है, अतः असली सारकाष्ठ दुर्लभ है और अपमिश्रण सामान्य।
| रस | तिक्त, मधुर |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | पित्त और कफ का शमन |
| प्रभाव | शीतल, वर्ण्य, दाहघ्न |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Santalum album
- प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ
- दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन
- सामान्य मात्रा: सारकाष्ठ चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा बाह्य रूप से शीत लेप; चन्दन-जल तथा शर्बत भी प्रयुक्त होते हैं।
चंदन, सफ़ेद चंदन के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
चन्दन (श्वेत चन्दन, Santalum album) आयुर्वेद का सर्वोपरि शीत द्रव्य है — इसका सुगन्धित सारकाष्ठ उष्णता को शान्त करता है, त्वचा एवं मन को शीतलता देता है, तथा मूत्र एवं रक्तसंचार संस्थान को ठण्डक पहुँचाता है। यह औषधि तथा पूजा, दोनों में मान्य है।
वर्गीकरण
सैन्टेलेसी (Santalaceae) कुल का यह द्रव्य शीत, दाहघ्न (दाह हरने वाले) तथा वर्ण्य द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-मधुर रस एवं प्रबल शीत वीर्य पित्त का शमन करते हैं और सम्पूर्ण शरीर की उष्णता शान्त करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
श्वेत चन्दन एक शीत द्रव्य है जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ पित्त ने उष्णता उत्पन्न की हो — त्वचा-दाह, तृष्णा, ज्वर तथा मूत्र-दाह में। कान्ति एवं घमौरियों हेतु बाह्य रूप से लेप के रूप में लगाया जाता है, और चन्दनासव तथा उशीरासव जैसे शीत आसवों में आन्तरिक रूप से लिया जाता है।
दाह हेतु चन्दन
शास्त्रोक्त दाहप्रशमन द्रव्य। वहाँ प्रयुक्त जहाँ उष्णता एवं दाह प्रधान हों — त्वचा, आमाशय, मूत्रमार्ग अथवा सामान्य रूप से सम्पूर्ण शरीर में।
युवान-पिटिका हेतु चन्दन
मुख पर लगाया गया लेप शोथयुक्त युवान-पिटिका का पारम्परिक उपाय है, जो रूक्ष करके नहीं, अपितु शीतल करके कार्य करता है।
ज्वर हेतु चन्दन
उष्णता एवं अस्थिरता सहित पित्तज ज्वरों में प्रयुक्त, जो फाण्ट रूप में लिया अथवा ललाट पर लगाया जाता है।
मूत्र-दाह हेतु चन्दन
मूत्राशय-शोथ तथा मूत्र-दाह में मानक मूत्रल द्रव्य, प्रायः उशीर एवं गोक्षुर के साथ।
तृष्णा हेतु चन्दन
अत्यधिक तृष्णा हेतु तृष्णानिग्रहण द्रव्यों में नामित, विशेषतः ज्वर में।
वर्ण-दोष हेतु चन्दन
असमान वर्ण एवं दागों हेतु गुलाब-जल के साथ लेप रूप में लगाया जाता है — भारत में यही सर्वाधिक व्यापक गृह-प्रयोग है।
रक्तपित्त में चन्दन
शीत एवं रक्त-प्रसादक होने से पित्तज मूल के रक्तस्राव-विकारों में प्रयुक्त।
धड़कन हेतु चन्दन
हृद्य कहा गया है; वहाँ प्रयुक्त जहाँ उष्णता एवं चिन्ता के साथ हृद्गति तीव्र हो।
शिरःशूल हेतु चन्दन
ललाट पर लगाया गया लेप उष्णताजन्य शिरःशूल तथा लू का गृह-उपाय है।
शास्त्रीय योगों में चन्दन
चन्दनासव तथा अधिकांश शीत योगों में उपस्थित, जहाँ यह कर्म एवं सुगन्ध, दोनों प्रदान करता है।
मात्रा — कितना लें
सारकाष्ठ चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा बाह्य रूप से शीत लेप; चन्दन-जल तथा शर्बत भी प्रयुक्त होते हैं। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
चंदन, सफ़ेद चंदन का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में चंदन, सफ़ेद चंदन के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (Daha एवं पित्त प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (कर्पूरादि वर्ग).
सुश्रुत संहिता में चंदन, सफ़ेद चंदन के विषय में क्या कहा गया है?
दाह एवं उष्णता हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — Daha एवं पित्त प्रकरण.
भावप्रकाश निघण्टु में चंदन, सफ़ेद चंदन के विषय में क्या कहा गया है?
शीत एवं वर्ण्य के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग.
आयुर्वेद में चंदन, सफ़ेद चंदन किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
श्वेत चन्दन एक शीत द्रव्य है जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ पित्त ने उष्णता उत्पन्न की हो — त्वचा-दाह, तृष्णा, ज्वर तथा मूत्र-दाह में। कान्ति एवं घमौरियों हेतु बाह्य रूप से लेप के रूप में लगाया जाता है, और चन्दनासव तथा उशीरासव जैसे शीत आसवों में आन्तरिक रूप से लिया जाता है।
चंदन, सफ़ेद चंदन के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, मधुर, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन. प्रभाव: शीतल, वर्ण्य, दाहघ्न.
चंदन, सफ़ेद चंदन को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। चंदन, सफ़ेद चंदन का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: पित्त और कफ का शमन.
चंदन, सफ़ेद चंदन का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: सारकाष्ठ.
चंदन, सफ़ेद चंदन की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
सारकाष्ठ चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा बाह्य रूप से शीत लेप; चन्दन-जल तथा शर्बत भी प्रयुक्त होते हैं। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
चंदन, सफ़ेद चंदन का प्रयोग कब वर्जित है?
सामान्यतः सुरक्षित; शुद्ध चन्दन ही प्रयुक्त करें। बड़ी आन्तरिक मात्रा सावधानी से लें। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
चंदन, सफ़ेद चंदन कहाँ पाया जाता है?
चन्दन दक्षिण भारत, विशेषतः कर्नाटक, का मूल निवासी एक छोटा अर्ध-परजीवी सदाबहार वृक्ष है, जो शुष्क पर्णपाती वनों में उगता है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग
शीत एवं वर्ण्य के रूप में वर्णित। - चरक एवं सुश्रुत संहिता — Daha एवं पित्त प्रकरण
दाह एवं उष्णता हेतु उल्लिखित।
Modern research
-
Sandalwood Album Oil as a Botanical Therapeutic in Dermatology
(see source). Journal of Clinical and Aesthetic Dermatology (2017)
A review of East Indian sandalwood (Santalum album, Chandana) oil in dermatology, describing anti-inflammatory and antimicrobial actions relevant to acne, eczema and psoriasis.
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सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सामान्यतः सुरक्षित; शुद्ध चन्दन ही प्रयुक्त करें। बड़ी आन्तरिक मात्रा सावधानी से लें। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
प्राप्ति स्थान
चन्दन दक्षिण भारत, विशेषतः कर्नाटक, का मूल निवासी एक छोटा अर्ध-परजीवी सदाबहार वृक्ष है, जो शुष्क पर्णपाती वनों में उगता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चन्दन किसमें प्रयुक्त होता है?
चन्दन आयुर्वेद का प्रधान शीत द्रव्य है, जो दाह, पित्तज ज्वर, तृष्णा, युवान-पिटिका, वर्ण-दोष तथा मूत्र-दाह में प्रयुक्त होता है। यह बाह्य रूप से लेप के रूप में लगाया जाता है और आन्तरिक रूप से फाण्ट अथवा योगों में लिया जाता है।
चन्दन का लेप मुख पर कैसे लगाएँ?
सारकाष्ठ को थोड़े जल अथवा गुलाब-जल के साथ घिसकर चिकना लेप बनाएँ, प्रभावित स्थान पर पतली परत लगाएँ, 15–20 मिनट रखकर शीतल जल से धो लें। शोथयुक्त युवान-पिटिका में दैनिक प्रयोग उचित है।
असली चन्दन इतना महँगा क्यों है?
Santalum album भारत में संरक्षित है, इसमें सारकाष्ठ बनने में दशकों लगते हैं, और इसका अत्यधिक दोहन हुआ है। असली तैल एवं सारकाष्ठ तदनुसार महँगे हैं, और सस्ते "चन्दन" उत्पाद प्रायः ऑस्ट्रेलियाई चन्दन, रक्त चन्दन अथवा कृत्रिम सुगन्ध होते हैं।
क्या रक्त चन्दन और श्वेत चन्दन एक ही हैं?
नहीं। श्वेत चन्दन Santalum album है, सुगन्धित और अपने शीत कर्म हेतु प्रयुक्त। रक्त चन्दन Pterocarpus santalinus है, गन्धहीन, जो मुख्यतः वर्ण हेतु तथा शीत योगों में प्रयुक्त होता है। वे भिन्न वृक्ष हैं और उनके प्रयोग भी भिन्न।
चन्दन की मात्रा क्या है?
सारकाष्ठ चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, अथवा शीत फाण्ट 40–80 मिली। बाह्य रूप से लेप के रूप में, मात्रा-सीमा के बिना। चन्दन का वाष्पशील तैल अनुज्ञप्त योगों के अतिरिक्त आन्तरिक रूप से नहीं लिया जाता।
क्या चन्दन के दुष्प्रभाव हैं?
बाह्य प्रयोग में अत्यन्त सुसह्य; कभी-कभी सम्पर्क-संवेदनशीलता होती है, अतः पैच परीक्षण करें। आन्तरिक रूप से यह शीत एवं रूक्ष है, अतः उष्ण अवस्थाओं के अनुकूल है, शीत अवस्थाओं के नहीं। वाष्पशील तैल का आन्तरिक प्रयोग वर्जित रखें, वह वृक्कों में क्षोभ कर सकता है।
क्या चन्दन प्रतिदिन त्वचा पर लगाया जा सकता है?
हाँ, लेप परम्परागत रूप से प्रतिदिन प्रयुक्त होता है और मृदु है। यदि आपकी त्वचा पहले से रूक्ष हो तो उसके पश्चात् हल्का तैल लगाएँ, क्योंकि चन्दन शीत तथा किंचित् रूक्ष है।