चित्र: Vinayaraj / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
गंभारी, गम्हार गम्भारी
Gmelina arborea · Lamiaceae
अन्य नाम: गम्भारी, खमेर, गम्हार
प्रयोज्य अंग: मूल, त्वक्
गम्भारी (Gmelina arborea) एक शीघ्र बढ़ने वाला भारतीय वृक्ष है जिसका मूल दशमूल के दस मूलों में से एक है। आयुर्वेद इसे दाह, तृष्णा, शोथ तथा ज्वर में शीत, वातशामक द्रव्य के रूप में प्रयुक्त करता है, और इसका फल पाण्डु एवं सामान्य दुर्बलता में प्रयुक्त होने वाला रसायन है।
| रस | तिक्त, कषाय, मधुर |
|---|---|
| गुण | गुरु, स्निग्ध |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन |
| प्रभाव | रसायन, Dashamula member |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Gmelina arborea
- प्रयोज्य अंग: मूल, त्वक्
- दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन
- सामान्य मात्रा: मूल/त्वक् चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; दशमूल योगों का प्रमुख घटक।
गंभारी, गम्हार के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
गम्भारी (Gmelina arborea) दशमूल के दस मूलों में से एक तथा एक पोषक, त्रिदोषशामक रसायन है। इसका मूल एवं त्वक् बल, पाचन तथा स्नायु-संस्थान को सहारा देते हैं।
वर्गीकरण
लैमिएसी (Lamiaceae) कुल की गम्भारी बृंहणीय (पोषक) तथा रसायन द्रव्य है, और दशमूल के बृहत् पञ्चमूल की सदस्य। इसका सन्तुलित रस एवं उष्ण वीर्य पोषण करते हुए तीनों दोषों का शमन करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
गम्भारी दशमूल के दस मूलों में से एक है और स्वयं भी बल्य एवं रसायन द्रव्य के रूप में प्रयुक्त होती है। शास्त्र इसे दाह, तृष्णा तथा सामान्य दुर्बलता में देते हैं, और यह अपने मधुर, बलवर्धक गुण के कारण इस संग्रह के अरिष्टों में सम्मिलित है।
दशमूल में गम्भारी
बृहत् पञ्चमूल के पाँच वृक्ष-मूलों में से एक, जो अन्यथा उष्ण उस समूह में शीत तत्त्व का योगदान करती है।
दाह हेतु गम्भारी
एक दाहप्रशमन द्रव्य, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ उष्णता एवं दाह प्रधान हों — वातशामक मूलों में यह असामान्य है।
शोथ हेतु गम्भारी
शोथ में नामित; जल-संचय एवं सूजन हेतु क्वाथ रूप में प्रयुक्त।
ज्वर हेतु गम्भारी
दाह एवं तृष्णा सहित ज्वर में प्रयुक्त; यह शास्त्रीय ज्वर-क्वाथों का अंग है।
पाण्डु हेतु गम्भारी फल
पका फल एक रसायन है जो परम्परागत रूप से पाण्डु तथा दुर्बलता में दिया जाता है।
तृष्णा हेतु गम्भारी
तृष्णानिग्रहण द्रव्यों में नामित, जो शीत क्वाथ के रूप में लिया जाता है।
रक्तपित्त में गम्भारी
शीत एवं कषाय होने से पित्तज मूल के रक्तस्राव-विकारों में प्रयुक्त।
अर्श हेतु गम्भारी
अर्श में प्रयुक्त, विशेषतः वहाँ जहाँ दाह एवं रक्तस्राव प्रमुख लक्षण हों।
मूत्र-विकारों हेतु गम्भारी
अल्प एवं दाहयुक्त मूत्रता में प्रयुक्त मृदु मूत्रल द्रव्य।
हृदय हेतु गम्भारी
शास्त्रों में हृद्य कहा गया है; कुछ हृदय-क्वाथों में सम्मिलित।
मात्रा — कितना लें
मूल/त्वक् चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; दशमूल योगों का प्रमुख घटक। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
गंभारी, गम्हार का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में गंभारी, गम्हार के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (Dashamula); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
चरक संहिता में गंभारी, गम्हार के विषय में क्या कहा गया है?
दशमूल का बृहत् मूल सदस्य। सन्दर्भ: चरक संहिता — Dashamula.
भावप्रकाश निघण्टु में गंभारी, गम्हार के विषय में क्या कहा गया है?
रसायन एवं त्रिदोषशामक के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में गंभारी, गम्हार किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
गम्भारी दशमूल के दस मूलों में से एक है और स्वयं भी बल्य एवं रसायन द्रव्य के रूप में प्रयुक्त होती है। शास्त्र इसे दाह, तृष्णा तथा सामान्य दुर्बलता में देते हैं, और यह अपने मधुर, बलवर्धक गुण के कारण इस संग्रह के अरिष्टों में सम्मिलित है।
गंभारी, गम्हार के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, कषाय, मधुर, गुण गुरु, स्निग्ध, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन. प्रभाव: रसायन, Dashamula member.
गंभारी, गम्हार को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। गंभारी, गम्हार का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन.
गंभारी, गम्हार का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: मूल, त्वक्.
गंभारी, गम्हार की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
मूल/त्वक् चूर्ण 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ; दशमूल योगों का प्रमुख घटक। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
गंभारी, गम्हार का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
गंभारी, गम्हार कहाँ पाया जाता है?
गम्भारी भारत भर के आर्द्र पर्णपाती वनों का शीघ्र बढ़ने वाला पर्णपाती वृक्ष है, जिसका मूल एवं त्वक् औषधि में प्रयुक्त होते हैं।
गंभारी, गम्हार किन शास्त्रीय योगों में सम्मिलित है?
Dashamula.
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
रसायन एवं त्रिदोषशामक के रूप में वर्णित। - चरक संहिता — Dashamula
दशमूल का बृहत् मूल सदस्य।
Modern research
-
Effect of Gmelina arborea Roxb. in experimentally induced inflammation and nociception
(see source). Journal of Ayurveda and Integrative Medicine (2013)
A study reporting Gmelina arborea (Gambhari) reduced inflammation and pain responses in experimental models.
View study doi:10.4103/0975-9476.118697
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
गम्भारी भारत भर के आर्द्र पर्णपाती वनों का शीघ्र बढ़ने वाला पर्णपाती वृक्ष है, जिसका मूल एवं त्वक् औषधि में प्रयुक्त होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गम्भारी किसमें प्रयुक्त होती है?
गम्भारी मूल दाह, शोथ, तृष्णा-युक्त ज्वर, रक्तस्राव-विकार तथा अर्श में प्रयुक्त होता है। यह दशमूल के दस मूलों में से एक है। फल पृथक् रूप से पाण्डु एवं दुर्बलता हेतु रसायन के रूप में प्रयुक्त होता है।
गम्भारी की मात्रा क्या है?
मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। यह अकेले लेने की अपेक्षा दशमूल अथवा किसी अन्य योग के भीतर अधिक लिया जाता है।
गम्भारी को हिन्दी में क्या कहते हैं?
गम्भार अथवा खमेर। अंग्रेज़ी में इसे व्हाइट टीक, गम्हार अथवा बीचवुड कहते हैं। यह भारत भर में इमारती काष्ठ हेतु व्यापक रूप से लगाया जाता है।
क्या गम्भारी शीत है या उष्ण?
शीत (शीत वीर्य), जो उसे दशमूल के मूलों में असामान्य बनाता है — उस समूह का अधिकांश उष्ण है। इसीलिए इसे दाह एवं तृष्णा में प्रयुक्त किया जा सकता है, जहाँ अन्य द्रव्य वृद्धि करते।
क्या फल खाया जा सकता है?
हाँ। पका फल खाद्य है और परम्परागत रूप से पाण्डु एवं दुर्बलता हेतु रसायन के रूप में प्रयुक्त होता है, जो मूल के क्वाथ-द्रव्य के रूप में प्रयोग से पृथक् है।
क्या गम्भारी के दुष्प्रभाव हैं?
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें। यह सामान्यतः योगों के भीतर प्रयुक्त होती है, जहाँ इसकी सुरक्षा सिद्ध योग की ही होती है।
क्या गम्भारी और सागौन एक ही हैं?
नहीं। काष्ठ के रूप के कारण इसे व्हाइट टीक कहा जाता है, किन्तु असली सागौन Tectona grandis है। Gmelina arborea भिन्न कुल का भिन्न वृक्ष है।
इनका घटक: Dashamula