चित्र: NANDHUPUNIYAM / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
गिलोय, गुडुची गुडूची
Tinospora cordifolia · Menispermaceae
अन्य नाम: गिलोय, अमृता, गुडूची (गिलोय), गिलोया
प्रयोज्य अंग: काण्ड
गुडूची (Tinospora cordifolia) एक आरोही क्षुप है जिसका काण्ड आयुर्वेद का प्रमुखतम रोग-प्रतिरोधक एवं ज्वरहर द्रव्य है। अपनी पुनर्स्थापक शक्ति के कारण अमृता — अमृत — कही जाने वाली यह पुनरावर्ती ज्वर, रोग-प्रतिरोध, यकृत्-विकार, वातरक्त तथा प्रमेह में प्रयुक्त होती है, और उन थोड़े-से रसायनों में है जो मधुर नहीं, अपितु तिक्त हैं।
| रस | तिक्त, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, स्निग्ध |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | मधुर |
| दोष-कर्म | त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन |
| प्रभाव | रसायन, ज्वरघ्न |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Tinospora cordifolia
- प्रयोज्य अंग: काण्ड
- दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन
- सामान्य मात्रा: काण्ड चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम; गुडूची सत्त्व तथा क्वाथ भी प्रयुक्त होते हैं।
गिलोय, गुडुची के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
गुडूची (Tinospora cordifolia), जिसे गिलोय अथवा अमृता — "अमरत्व का अमृत" — भी कहा जाता है, एक आरोही क्षुप है जो व्यापक रसायन तथा रोग-प्रतिरोधवर्धक द्रव्य के रूप में मान्य है। काण्ड प्रधान प्रयोज्य अंग है, और ज्वर एवं संक्रमण में शरीर को सहारा देने की इसकी ख्याति प्राचीन है।
वर्गीकरण
मेनिस्पर्मेसी (Menispermaceae) कुल की गुडूची भावप्रकाश निघण्टु के गुडूच्यादि वर्ग का नेतृत्व करती है। त्रिदोषशामक एवं कायाकल्पकारी होकर इसका तिक्त-कषाय रस, उष्ण वीर्य तथा मधुर विपाक उसे शोधक एवं पोषक, दोनों बनाते हैं — यह असामान्य एवं मूल्यवान संयोग है।
उपयोग एवं लाभ
परम्परागत रूप से रोग-प्रतिरोध बढ़ाने, ज्वर के दौरान एवं पश्चात् शरीर को सहारा देने, यकृत् की सहायता करने, रक्त का शोधन करने तथा सामान्य रसायन के रूप में प्रयुक्त। पुनरावर्ती संक्रमणों तथा शोथयुक्त एवं चयापचय-सम्बन्धी अवस्थाओं में यह विशेष मान्य है।
पुनरावर्ती ज्वर हेतु गुडूची
शास्त्रोक्त ज्वरघ्न द्रव्य, जो विशेषतः बार-बार लौटने वाले ज्वरों तथा उनके पश्चात् आने वाली दुर्बलता में प्रयुक्त होता है।
रोग-प्रतिरोध हेतु गुडूची
इसका सर्वाधिक ज्ञात आधुनिक प्रयोग। रसायन के रूप में इसे किसी एक संक्रमण की चिकित्सा हेतु नहीं, अपितु संक्रमणों की आवृत्ति घटाने हेतु सप्ताहों तक लिया जाता है।
यकृत् हेतु गुडूची
कामला तथा मन्द यकृत्-क्रिया में प्रयुक्त; इसकी तिक्तता पित्त-प्रवाह एवं शोधन को सहारा देती है।
वातरक्त हेतु गुडूची
एक प्रधान वातरक्त द्रव्य, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ सन्धि-शूल के साथ उष्णता एवं रक्तिमा हो।
प्रमेह हेतु गुडूची
प्रमेहहर द्रव्यों में नामित तथा मधुमेह में निर्धारित चिकित्सा के साथ व्यापक रूप से प्रयुक्त।
त्वचा-रोग हेतु गुडूची
जीर्ण कुष्ठ में प्रयुक्त, जो दीर्घ क्रमों में आन्तरिक रूप से लिया जाता है।
आमवात हेतु गुडूची
आमवात में प्रयुक्त; इसका तिक्त एवं रसायन कर्म का संयोग शोथयुक्त सन्धि-रोग के अनुकूल बैठता है।
एलर्जी हेतु गुडूची
परम्परागत रूप से एलर्जिक प्रतिश्याय एवं त्वचा-एलर्जी में प्रयुक्त, जो ऋतु से पूर्व निवारक क्रम के रूप में लिया जाता है।
गुडूची सत्त्व के रूप में गुडूची
काण्ड से निकाला गया स्टार्च, शीत एवं मृदु, जो विशेषतः पित्त-अवस्थाओं में तथा बालकों हेतु प्रयुक्त होता है।
अमृतारिष्ट एवं शास्त्रीय योगों में गुडूची
अमृतारिष्ट, गुडूच्यादि क्वाथ तथा अधिकांश ज्वर एवं रोग-प्रतिरोध योगों में उपस्थित।
मात्रा — कितना लें
काण्ड चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम; गुडूची सत्त्व तथा क्वाथ भी प्रयुक्त होते हैं। सुसह्य; स्वप्रतिरक्षा अवस्थाओं में अथवा प्रतिरक्षा-दमनकारी औषधि के साथ निर्देशन में ही प्रयोग करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
गिलोय, गुडुची का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में गिलोय, गुडुची के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (ज्वर एवं रसायन प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
चरक संहिता में गिलोय, गुडुची के विषय में क्या कहा गया है?
ज्वर एवं कायाकल्प हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — ज्वर एवं रसायन प्रकरण.
भावप्रकाश निघण्टु में गिलोय, गुडुची के विषय में क्या कहा गया है?
त्रिदोषशामक रसायन के रूप में प्रथम उल्लिखित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में गिलोय, गुडुची किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
परम्परागत रूप से रोग-प्रतिरोध बढ़ाने, ज्वर के दौरान एवं पश्चात् शरीर को सहारा देने, यकृत् की सहायता करने, रक्त का शोधन करने तथा सामान्य रसायन के रूप में प्रयुक्त। पुनरावर्ती संक्रमणों तथा शोथयुक्त एवं चयापचय-सम्बन्धी अवस्थाओं में यह विशेष मान्य है।
गिलोय, गुडुची के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, स्निग्ध, वीर्य उष्ण, विपाक मधुर. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन. प्रभाव: रसायन, ज्वरघ्न.
गिलोय, गुडुची को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। गिलोय, गुडुची का वीर्य उष्ण है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन.
गिलोय, गुडुची का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: काण्ड.
गिलोय, गुडुची की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
काण्ड चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम; गुडूची सत्त्व तथा क्वाथ भी प्रयुक्त होते हैं। सुसह्य; स्वप्रतिरक्षा अवस्थाओं में अथवा प्रतिरक्षा-दमनकारी औषधि के साथ निर्देशन में ही प्रयोग करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
गिलोय, गुडुची का प्रयोग कब वर्जित है?
सामान्यतः अत्यन्त सुरक्षित। स्वप्रतिरक्षा अवस्थाओं में अथवा प्रतिरक्षा-दमनकारी या मधुमेह की औषधि के साथ निर्देशन में ही प्रयोग करें। चिकित्सीय प्रयोग हेतु चिकित्सक से परामर्श लें।
गिलोय, गुडुची कहाँ पाया जाता है?
गुडूची भारत की मूल निवासी एक बड़ी, चिकनी आरोही लता है, जो उष्णकटिबन्धीय एवं उपोष्ण प्रदेशों में स्वतः उगती है और मैदानों तथा निचली पहाड़ियों में प्रायः नीम एवं आम के वृक्षों पर चढ़ी मिलती है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
त्रिदोषशामक रसायन के रूप में प्रथम उल्लिखित। - चरक संहिता — ज्वर एवं रसायन प्रकरण
ज्वर एवं कायाकल्प हेतु उल्लिखित।
Modern research
-
Medicinal and Beneficial Health Applications of Tinospora cordifolia (Guduchi): A Miraculous Herb Countering Various Diseases and its Immunomodulatory Effects
(see source). Recent Patents on Anti-Infective Drug Discovery (2017)
A comprehensive review of Guduchi's immunomodulatory, antioxidant and anti-inflammatory activities and its traditional and modern applications.
View study doi:10.2174/1872214811666170301105101 -
Immunomodulatory role of Tinospora cordifolia as an adjuvant in surgical treatment of diabetic foot ulcers: a prospective randomized controlled study
(see source). Indian Journal of Pharmacology (2008)
A prospective RCT reporting improved wound healing and phagocytic activity when Tinospora cordifolia (Guduchi) was used as an adjuvant in diabetic foot-ulcer treatment.
View study
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सामान्यतः अत्यन्त सुरक्षित। स्वप्रतिरक्षा अवस्थाओं में अथवा प्रतिरक्षा-दमनकारी या मधुमेह की औषधि के साथ निर्देशन में ही प्रयोग करें। चिकित्सीय प्रयोग हेतु चिकित्सक से परामर्श लें।
प्राप्ति स्थान
गुडूची भारत की मूल निवासी एक बड़ी, चिकनी आरोही लता है, जो उष्णकटिबन्धीय एवं उपोष्ण प्रदेशों में स्वतः उगती है और मैदानों तथा निचली पहाड़ियों में प्रायः नीम एवं आम के वृक्षों पर चढ़ी मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गुडूची किसमें प्रयुक्त होती है?
गुडूची पुनरावर्ती ज्वर, रोग-प्रतिरोध, यकृत्-विकार, वातरक्त, आमवात, प्रमेह, जीर्ण त्वचा-रोग तथा एलर्जी में प्रयुक्त होती है। इसे रसायन में वर्गीकृत किया गया है, अर्थात् इसे किसी तीव्र प्रसंग की चिकित्सा हेतु नहीं, अपितु प्रतिरोध सुधारने हेतु सप्ताहों तक लिया जाता है।
गुडूची की मात्रा क्या है?
काण्ड चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार, अथवा ताज़े काण्ड का स्वरस 10–20 मिली। गुडूची सत्त्व की मात्रा कम, 500 मिग्रा – 1 ग्राम है। चार से आठ सप्ताह के क्रम सामान्य हैं।
क्या गिलोय और गुडूची एक ही हैं?
हाँ। गिलोय हिन्दी नाम है और गुडूची संस्कृत, दोनों Tinospora cordifolia के लिए। इसे अमृता भी कहते हैं, अर्थात् अमृत, और अंग्रेज़ी में हार्ट-लीव्ड मूनसीड।
क्या गुडूची से यकृत् को क्षति होती है?
भारत में 2021 के आसपास गिलोय लेने वालों में यकृत्-शोथ के कुछ प्रकरण सामने आए थे, और उनमें से अधिकांश का सम्बन्ध ग़लत पहचाने गए द्रव्य से था — Tinospora crispa, जो सजातीय किन्तु यकृत्-विषैली जाति है। केवल अनुज्ञप्त स्रोत का ठीक से पहचाना गया T. cordifolia ही लें, और कामला या गहरे मूत्र की स्थिति में सेवन रोक दें।
क्या गुडूची प्रतिदिन ली जा सकती है?
इसे अनिश्चित काल तक नहीं, अपितु कुछ सप्ताहों के क्रमों में लिया जाता है। क्रमों के बीच विराम लें, और यदि दीर्घकाल तक ले रहे हों तो उपर्युक्त प्रकरणों को देखते हुए यकृत्-क्रिया की समय-समय पर जाँच कराएँ।
गुडूची किसे नहीं लेनी चाहिए?
गर्भावस्था में वर्जित। स्वप्रतिरक्षा रोग होने पर चिकित्सकीय परामर्श लें, क्योंकि यह प्रतिरक्षा-क्रिया को उत्तेजित करती है, अथवा यदि आप मधुमेह या प्रतिरक्षा-दमनकारी औषधि लेते हों। रक्त-शर्करा पर प्रभाव के कारण शल्य-क्रिया से पूर्व सेवन रोक दें।
गुडूची सत्त्व क्या है?
ताज़े काण्ड को कूटकर जल में भिगोने पर नीचे बैठने वाला स्टार्च। यह सम्पूर्ण काण्ड की तुलना में अधिक शीत एवं मृदु है, और पित्त-अवस्थाओं, दाहयुक्त विकारों तथा बालकों में वरीय है।