लोध्र, लोध (Symplocos racemosa) — bark
लोध्र, लोध — Symplocos racemosa. चित्र में सम्पूर्ण वनस्पति है; प्रयोज्य अंग का चित्र उपलब्ध नहीं था। प्रयोज्य अंग: त्वक्.
चित्र: Satheesan.vn / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

लोध्र, लोध लोध्र

Symplocos racemosa · Symplocaceae

अन्य नाम: लोध, लोध्र

प्रयोज्य अंग: त्वक्

लोध्र (Symplocos racemosa) एक वृक्ष है जिसकी त्वक् स्त्री-स्वास्थ्य हेतु आयुर्वेद का प्रधान कषाय द्रव्य है। यह अत्यधिक रजःस्राव, श्वेतप्रदर तथा गर्भाशय-विकारों में प्रयुक्त होती है, और युवान-पिटिका एवं त्वचा-वर्ण हेतु बाह्य रूप से लगाई जाती है। स्त्री-योगों में यह अशोक की मानक सहचरी है।

लोध्र, लोध — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकषाय
गुणलघु, रूक्ष
वीर्यशीत
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और पित्त का शमन
प्रभावस्तम्भक, स्त्री-रोग बल्य

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Symplocos racemosa
  • प्रयोज्य अंग: त्वक्
  • दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
  • सामान्य मात्रा: त्वक् चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; आन्तरिक रूप से तथा स्त्रीरोग एवं नेत्र-योगों में प्रयुक्त।

लोध्र, लोध के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीलोध्र, लोध
अंग्रेज़ीLodh Tree
संस्कृतलोध्र, तिल्वक
बंगालीলোধ
गुजरातीલોધર
मराठीलोध्र
तमिलவெள்ளிலோத்திரம்
तेलुगुలొద్దుగ
कन्नड़ಲೋಧ್ರ
लैटिन (वानस्पतिक)Symplocos racemosa

परिचय

लोध्र (Symplocos racemosa) एक शीत, कषाय त्वक् है जो स्त्री-स्वास्थ्य तथा नेत्रों हेतु मान्य है। यह गर्भाशय को बल देती है, अत्यधिक रक्तस्राव रोकती है और रजो एवं स्त्री-रोग विकारों का शास्त्रीय उपाय है।

वर्गीकरण

सिम्प्लोकेसी (Symplocaceae) कुल की लोध्र स्तम्भक तथा स्त्री-बल्य द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कषाय रस एवं शीत वीर्य कफ-पित्त का शमन करते हैं और धातुओं को दृढ़ करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

लोध्र एक गर्भाशय-कषाय द्रव्य है, जो अत्यधिक रजःस्राव तथा श्वेतप्रदर में प्रयुक्त होता है, और शास्त्रीय स्त्रीरोग द्रव्यों में से एक है। बाह्य रूप से यह युवान-पिटिका, वर्ण-दोष तथा त्वचा को दृढ़ करने हेतु लगाई जाती है, और कान्ति-लेपों एवं शीत आसवों में सम्मिलित रहती है।

अत्यधिक रजःस्राव हेतु लोध्र

असृग्दर में एक प्रधान रक्तस्तम्भक द्रव्य, जो प्रायः अशोक एवं धातकी के साथ मिलाया जाता है।

श्वेतप्रदर हेतु लोध्र

श्वेत योनि-स्राव का शास्त्रोक्त द्रव्य, जो आन्तरिक रूप से लिया जाता है तथा प्रक्षालन के रूप में भी।

गर्भाशय-बल्य के रूप में लोध्र

रजो एवं गर्भाशय-विकारों में प्रयुक्त, जो तत्काल कार्य करने के स्थान पर धातु को बल देता है।

युवान-पिटिका हेतु लोध्र

मुख पर लगाया गया त्वक्-लेप युवान-पिटिका तथा खुले रोमकूपों का शास्त्रोक्त उपाय है।

त्वचा-वर्ण हेतु लोध्र

एक वर्ण्य द्रव्य, जो कान्ति एवं वर्ण-दोष हेतु बाह्य रूप से लगाया जाता है।

रक्तस्रावी मसूड़ों हेतु लोध्र

शिथिल, रक्तस्रावी मसूड़ों हेतु गण्डूष तथा दन्तमञ्जनों में प्रयुक्त।

अतिसार हेतु लोध्र

कषाय है और जीर्ण द्रव मल में प्रयुक्त होती है।

नेत्र-विकारों हेतु लोध्र

अभिष्यन्द तथा शोथयुक्त पलकों हेतु शास्त्रीय नेत्र-प्रक्षालनों में प्रयुक्त।

व्रण हेतु लोध्र

देर से भरने वाले व्रणों एवं क्षतों पर चूर्ण के रूप में लगाई जाती है।

अशोकारिष्ट एवं लोध्रासव में लोध्र

शास्त्रीय स्त्री-योगों का घटक, तथा लोध्रासव का प्रधान द्रव्य।

मात्रा — कितना लें

त्वक् चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; आन्तरिक रूप से तथा स्त्रीरोग एवं नेत्र-योगों में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

लोध्र, लोध का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में लोध्र, लोध के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (स्त्री रोग एवं Vrana प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (वटादि वर्ग).

सुश्रुत संहिता में लोध्र, लोध के विषय में क्या कहा गया है?

रक्तस्राव एवं व्रण हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — स्त्री रोग एवं Vrana प्रकरण.

भावप्रकाश निघण्टु में लोध्र, लोध के विषय में क्या कहा गया है?

स्तम्भक एवं स्त्री-हितकर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग.

आयुर्वेद में लोध्र, लोध किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

लोध्र एक गर्भाशय-कषाय द्रव्य है, जो अत्यधिक रजःस्राव तथा श्वेतप्रदर में प्रयुक्त होता है, और शास्त्रीय स्त्रीरोग द्रव्यों में से एक है। बाह्य रूप से यह युवान-पिटिका, वर्ण-दोष तथा त्वचा को दृढ़ करने हेतु लगाई जाती है, और कान्ति-लेपों एवं शीत आसवों में सम्मिलित रहती है।

लोध्र, लोध के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: स्तम्भक, स्त्री-रोग बल्य.

लोध्र, लोध को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। लोध्र, लोध का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.

लोध्र, लोध का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: त्वक्.

लोध्र, लोध की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

त्वक् चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; आन्तरिक रूप से तथा स्त्रीरोग एवं नेत्र-योगों में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

लोध्र, लोध का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

लोध्र, लोध कहाँ पाया जाता है?

लोध्र पूर्वी एवं दक्षिण भारत के पर्वतीय वनों का छोटा सदाबहार वृक्ष है, जिसकी त्वक् औषधि हेतु संचित की जाती है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — वटादि वर्ग
    स्तम्भक एवं स्त्री-हितकर के रूप में वर्णित।
  • सुश्रुत संहिता — स्त्री रोग एवं Vrana प्रकरण
    रक्तस्राव एवं व्रण हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Bioprospecting the antimicrobial, antibiofilm and antiproliferative activity of Symplocos racemosa Roxb. bark phytoconstituents (see source). BMC Pharmacology and Toxicology (2020)

    A study reporting antimicrobial, antibiofilm and antiproliferative activity of Symplocos racemosa (Lodhra) bark constituents.

    View study doi:10.1186/s40360-020-00453-y

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

लोध्र पूर्वी एवं दक्षिण भारत के पर्वतीय वनों का छोटा सदाबहार वृक्ष है, जिसकी त्वक् औषधि हेतु संचित की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लोध्र किसमें प्रयुक्त होती है?

लोध्र त्वक् अत्यधिक रजःस्राव, श्वेतप्रदर तथा गर्भाशय-विकारों में प्रयुक्त होती है, और युवान-पिटिका एवं त्वचा-वर्ण हेतु बाह्य रूप से लगाई जाती है। यह अशोक के साथ आयुर्वेदीय स्त्री-योगों का मानक घटक है।

लोध्र की मात्रा क्या है?

त्वक् चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। बाह्य रूप से चूर्ण को जल या गुलाब-जल के साथ लेप बनाकर मुख पर लगाया जाता है।

क्या लोध्र युवान-पिटिका में अच्छी है?

त्वक्-लेप युवान-पिटिका तथा बड़े रोमकूपों हेतु शास्त्रीय मुख-प्रयोग है, जो अपने कषाय, शोषक कर्म से कार्य करता है। यह रूक्ष त्वचा की अपेक्षा स्निग्ध, शोथयुक्त त्वचा के अधिक अनुकूल है, जहाँ यह अत्यधिक रूक्ष हो सकती है।

लोध्र और अशोक में क्या अन्तर है?

दोनों स्त्री-द्रव्य हैं जो अत्यधिक रक्तस्राव में प्रयुक्त होते हैं, और प्रायः साथ निर्दिष्ट होते हैं। अशोक अधिक विशेष रूप से गर्भाशय एवं रजोचक्र पर कार्य करता है; लोध्र प्रबलतर सामान्य कषाय है और त्वचा हेतु बाह्य रूप से भी प्रयुक्त होती है।

लोध्र को हिन्दी में क्या कहते हैं?

लोध अथवा लोध्र। अंग्रेज़ी में लोध ट्री, यद्यपि कैलिफ़ोर्निया स्वीटलीफ़ नाम एक भिन्न Symplocos जाति के लिए है।

क्या लोध्र के दुष्प्रभाव हैं?

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। अत्यन्त कषाय होने से दीर्घ प्रयोग विबन्ध तथा रूक्षता कर सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें। दीर्घकालीन अत्यधिक रक्तस्राव में अनिश्चितकालीन स्वयं-चिकित्सा के स्थान पर चिकित्सकीय जाँच आवश्यक है।

क्या Symplocos racemosa संकटग्रस्त है?

यह संग्रह-दबाव में है और अपने विस्तार के कुछ भागों में संवेदनशील सूचीबद्ध है, क्योंकि त्वक् उतारने से वृक्ष मर सकता है। सतत स्रोत बताने वाले आपूर्तिकर्ताओं को वरीयता दें।

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