चित्र: Tanu842011 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
नीम निम्ब
Azadirachta indica · Meliaceae
अन्य नाम: नीम, नीम मींगी, नीम पत्र, नीम छाल, नीम की छाल
प्रयोज्य अंग: पत्र, त्वक्, बीज
निम्ब (Azadirachta indica) नीम है, भारत के सर्वाधिक प्रयुक्त औषधीय वृक्षों में से एक तथा द्रव्यगुण के तिक्ततम द्रव्यों में। इसका प्रत्येक अंग प्रयुक्त होता है। आयुर्वेद इसे त्वचा-रोग, संक्रमण तथा परजीवियों का प्रमुखतम द्रव्य मानता है, और यह जीवाणुनाशक, कवकनाशक एवं कीटनाशक है।
| रस | तिक्त, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | पित्त और कफ का शमन |
| प्रभाव | कृमिघ्न, कुष्ठघ्न |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Azadirachta indica
- प्रयोज्य अंग: पत्र, त्वक्, बीज
- दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन
- सामान्य मात्रा: पत्र चूर्ण 1–3 ग्राम; पत्र-स्वरस, क्वाथ तथा नीम तैल (बाह्य) भी प्रयुक्त होते हैं।
नीम के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
निम्ब (नीम, Azadirachta indica) आयुर्वेद का सर्वोपरि रक्तशोधक एवं त्वचा-द्रव्य है — इस वृक्ष का प्रत्येक अंग, पत्र से त्वक् तथा बीज तक, औषधीय है। तिक्त एवं शीत होकर यह त्वचा-विकार, संक्रमण तथा शोधन हेतु शास्त्रोक्त चयन है।
वर्गीकरण
मेलिएसी (Meliaceae) कुल का निम्ब तिक्त, कुष्ठघ्न तथा कृमिघ्न द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-कषाय रस एवं शीत वीर्य रक्त तथा त्वचा से उष्णता, दोष एवं कफ का हरण करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
नीम त्वचा एवं रक्त हेतु शास्त्रोक्त तिक्त द्रव्य है। यह युवान-पिटिका, विचर्चिका, विद्रधि तथा जीर्ण त्वचा-रोग में, कृमि-रोग में तथा प्रमेह में प्रयुक्त होता है, और संक्रमण एवं कण्डू हेतु बाह्य रूप से तैल या प्रक्षालन के रूप में। इसकी तिक्तता उष्ण नहीं, अपितु शीत एवं रूक्ष है।
त्वचा-रोग हेतु निम्ब
प्रमुखतम कुष्ठघ्न द्रव्य, जो विचर्चिका, युवान-पिटिका, कवक-संक्रमण तथा जीर्ण कण्डू में आन्तरिक एवं बाह्य, दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है।
व्रण-संक्रमण हेतु निम्ब
पत्र-क्वाथ व्रण-प्रक्षालन के रूप में प्रयुक्त — जीवाणुनाशक और भारतीय परम्परा में दीर्घकाल से स्थापित।
कवक-संक्रमण हेतु निम्ब
दद्रु, पाद-कवक तथा शिर-त्वचा के कवक-विकार, जिन पर तैल अथवा पत्र-कल्क लगाया जाता है।
मुख-स्वास्थ्य हेतु निम्ब
इसकी टहनी ही मूल दातुन है, जो भारत भर में प्रयुक्त होती है, और नीम आयुर्वेदीय दन्तमञ्जनों का मानक घटक है।
कृमि हेतु निम्ब
आन्त्र-परजीवियों में प्रयुक्त एक प्रधान कृमिघ्न द्रव्य।
प्रमेह हेतु निम्ब
पत्र प्रमेहहर द्रव्यों में नामित है और मधुमेह में निर्धारित चिकित्सा के साथ व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है।
ज्वर हेतु निम्ब
तिक्त एवं शीत होने से ज्वर में, विशेषतः पुनरावर्ती ज्वरों में प्रयुक्त।
यूका एवं पामा हेतु निम्ब
त्वचा-परजीवियों हेतु तैल एक पारम्परिक तथा प्रभावी लेप है।
कृषि-कीटनाशक के रूप में निम्ब
नीम तैल एवं खली प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में प्रयुक्त होते हैं — यह पृथक् प्रयोग है, किन्तु वही यौगिक।
शास्त्रीय योगों में निम्ब
निम्ब तैल, पञ्चनिम्ब चूर्ण तथा अधिकांश शास्त्रीय त्वचा एवं ज्वर योगों में उपस्थित।
मात्रा — कितना लें
पत्र चूर्ण 1–3 ग्राम; पत्र-स्वरस, क्वाथ तथा नीम तैल (बाह्य) भी प्रयुक्त होते हैं। निरन्तर के स्थान पर क्रमों में लेना श्रेष्ठ है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
नीम का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में नीम के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (कुष्ठ चिकित्सा); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
सुश्रुत संहिता में नीम के विषय में क्या कहा गया है?
त्वचा-रोगों एवं रक्तशोधन हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — कुष्ठ चिकित्सा.
भावप्रकाश निघण्टु में नीम के विषय में क्या कहा गया है?
कुष्ठघ्न एवं कृमिघ्न के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में नीम किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
नीम त्वचा एवं रक्त हेतु शास्त्रोक्त तिक्त द्रव्य है। यह युवान-पिटिका, विचर्चिका, विद्रधि तथा जीर्ण त्वचा-रोग में, कृमि-रोग में तथा प्रमेह में प्रयुक्त होता है, और संक्रमण एवं कण्डू हेतु बाह्य रूप से तैल या प्रक्षालन के रूप में। इसकी तिक्तता उष्ण नहीं, अपितु शीत एवं रूक्ष है।
नीम के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन. प्रभाव: कृमिघ्न, कुष्ठघ्न.
नीम को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। नीम का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: पित्त और कफ का शमन.
नीम का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: पत्र, त्वक्, बीज.
नीम की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
पत्र चूर्ण 1–3 ग्राम; पत्र-स्वरस, क्वाथ तथा नीम तैल (बाह्य) भी प्रयुक्त होते हैं। निरन्तर के स्थान पर क्रमों में लेना श्रेष्ठ है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
नीम का प्रयोग कब वर्जित है?
अत्यन्त तिक्त; बड़ी आन्तरिक मात्रा पाचन बिगाड़ सकती है अथवा गर्भावस्था तथा अत्यन्त क्षीण व्यक्तियों हेतु अनुपयुक्त हो सकती है। निर्देशन में ही प्रयोग करें।
नीम कहाँ पाया जाता है?
नीम भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी शीघ्र बढ़ने वाला सदाबहार वृक्ष है, जो भारत के मैदानों एवं शुष्क प्रदेशों में तथा अब समस्त उष्णकटिबन्ध में मिलता है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
कुष्ठघ्न एवं कृमिघ्न के रूप में वर्णित। - चरक एवं सुश्रुत संहिता — कुष्ठ चिकित्सा
त्वचा-रोगों एवं रक्तशोधन हेतु उल्लिखित।
Modern research
-
Azadirachta indica A. Juss (neem) against diabetes mellitus: a critical review on its phytochemistry, pharmacology, and toxicology
(see source). Journal of Pharmacy and Pharmacology (2022)
A critical review of pharmacological investigations on neem's effects on blood glucose, lipid profile and diabetic complications.
View study -
Effectiveness of Azadirachta indica (neem) mouthrinse in plaque and gingivitis control: a systematic review
Dhingra K, Vandana KL. International Journal of Dental Hygiene (2017)
A systematic review of randomized controlled trials finding neem mouthrinse effective in reducing dental plaque and gingivitis, comparable to chlorhexidine.
View study doi:10.1111/idh.12191
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
अत्यन्त तिक्त; बड़ी आन्तरिक मात्रा पाचन बिगाड़ सकती है अथवा गर्भावस्था तथा अत्यन्त क्षीण व्यक्तियों हेतु अनुपयुक्त हो सकती है। निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
नीम भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी शीघ्र बढ़ने वाला सदाबहार वृक्ष है, जो भारत के मैदानों एवं शुष्क प्रदेशों में तथा अब समस्त उष्णकटिबन्ध में मिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नीम किसमें प्रयुक्त होता है?
लगभग प्रत्येक प्रकार के त्वचा-रोग, व्रण एवं कवक-संक्रमण, मुख-स्वास्थ्य, आन्त्र-कृमि, ज्वर तथा रक्त-शर्करा सहायता में। यह जीवाणुनाशक, कवकनाशक एवं कीटनाशक है, और आन्तरिक तथा बाह्य, दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है।
नीम की मात्रा क्या है?
पत्र चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, अथवा पत्र-स्वरस 10–20 मिली। यह अत्यन्त तिक्त है, अतः प्रायः मधु के साथ अथवा किसी योग के भीतर लिया जाता है। तैल बाह्य रूप से, पतला करके प्रयुक्त होता है।
क्या नीम आन्तरिक रूप से लेना सुरक्षित है?
निर्धारित क्रमों में शास्त्रोक्त मात्रा में, हाँ। गर्भावस्था में वर्जित — नीम के प्रजनन-रोधी तथा गर्भपातक प्रभाव प्रलेखित हैं। शिशुओं को नीम तैल कभी न दें; छोटे बालकों में उसके सेवन से मस्तिष्क-विकृति तथा मृत्यु हुई है।
क्या नीम तैल त्वचा पर लगाया जा सकता है?
हाँ, वाहक तैल में पतला करके, कवक-संक्रमण, पामा, यूका तथा जीर्ण त्वचा-विकारों हेतु। यह प्रबल है और उसकी गन्ध तीव्र। पहले पैच परीक्षण करें — सम्पर्क-क्षोभ असामान्य नहीं है।
क्या नीम मधुमेह में सहायक है?
नीम-पत्र शास्त्रीय प्रमेहहर द्रव्यों में नामित है और भारत में रक्त-शर्करा सहायता हेतु व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है। इसे सहायक ही मानें: निगरानी रखें, चिकित्सक को बताएँ, और निर्धारित औषधि कम न करें।
क्या नीम युवान-पिटिका में अच्छा है?
यह मानक चयनों में से एक है, जो अपने रक्तशोधक एवं कीटाणुनाशक कर्म हेतु आन्तरिक रूप से लिया जाता है और तैल या पत्र-कल्क के रूप में बाह्य लगाया जाता है। यह विशेषतः संक्रमित एवं शोथयुक्त युवान-पिटिका के अनुकूल है, प्रायः हल्दी के साथ।
नीम किसे नहीं लेना चाहिए?
गर्भवती अथवा गर्भधारण का प्रयास करने वाले किसी भी व्यक्ति को — इसके प्रजनन-रोधी प्रभाव प्रलेखित हैं। शिशुओं एवं छोटे बालकों को नीम तैल आन्तरिक रूप से कभी न दें। यकृत् या वृक्क-रोग होने पर, अथवा मधुमेह की औषधि लेने पर परामर्श लें।