चित्र: Jayesh Patil / Wikimedia Commons, CC BY 2.0
प्रियंगु प्रियङ्गु
Callicarpa macrophylla · Lamiaceae
अन्य नाम: प्रियंगु, फूलप्रियंगु, ब्यूटीबेरी
प्रयोज्य अंग: पुष्प
प्रियङ्गु (Callicarpa macrophylla) ब्यूटीबेरी है, जिसके पुष्प एवं फल आयुर्वेद में शीत कषाय द्रव्य के रूप में प्रयुक्त होते हैं। यह रक्तस्राव-विकारों, दाह, अतिसार तथा त्वचा-विकारों में प्रयुक्त होता है, और शास्त्रीय रक्तपित्त एवं स्त्री-योगों का मानक घटक है।
| रस | कषाय, तिक्त, मधुर |
|---|---|
| गुण | गुरु, रूक्ष |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | पित्त और कफ का शमन |
| प्रभाव | स्तम्भक (styptic), शीतल |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Callicarpa macrophylla
- प्रयोज्य अंग: पुष्प
- दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन
- सामान्य मात्रा: स्तम्भक एवं शीत योगों में पुष्प चूर्ण।
प्रियंगु के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
प्रियङ्गु (Callicarpa macrophylla) एक शीत, कषाय पुष्प है जो रक्तस्राव रोकने तथा पित्त शान्त करने हेतु प्रयुक्त होता है। कषाय एवं शीत होकर यह धातुओं को दृढ़ करता है, त्वचा को शान्ति देता है और स्त्री-स्वास्थ्य को सहारा देता है।
वर्गीकरण
लैमिएसी (Lamiaceae) कुल का प्रियङ्गु स्तम्भक तथा शीत पित्तशामक द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कषाय रस एवं शीत वीर्य धातुओं को दृढ़ करते हैं और रक्तस्राव रोकते हैं।
उपयोग एवं लाभ
प्रियङ्गु एक शीत, कषाय द्रव्य है जो रक्तस्राव-विकारों, दाह तथा अत्यधिक तृष्णा में, और अत्यधिक रक्तस्राव सहित स्त्री-विकारों में प्रयुक्त होता है। बाह्य रूप से यह दाहयुक्त त्वचा एवं शोथ पर लगाया जाता है, और इस संग्रह के शीत आसवों में सम्मिलित रहता है।
रक्तस्राव-विकारों हेतु प्रियङ्गु
रक्तपित्त तथा अत्यधिक रजःस्राव में प्रयुक्त एक प्रधान रक्तस्तम्भक द्रव्य।
दाह हेतु प्रियङ्गु
शीत एवं कषाय होने से उष्णता एवं अस्थिरता सहित दाह में प्रयुक्त।
अतिसार हेतु प्रियङ्गु
इसकी कषायता द्रव मल को रोकती है, विशेषतः दाह सहित।
श्वेतप्रदर हेतु प्रियङ्गु
श्वेत योनि-स्राव में प्रयुक्त, जो आन्तरिक रूप से लिया जाता है तथा प्रक्षालन के रूप में भी।
त्वचा-विकारों हेतु प्रियङ्गु
दाह, पिटिका तथा शोथयुक्त त्वचा पर लेप के रूप में लगाया जाता है।
अत्यधिक तृष्णा हेतु प्रियङ्गु
तृष्णानिग्रहण द्रव्यों में नामित।
ज्वर हेतु प्रियङ्गु
दाहयुक्त पित्तज ज्वरों में प्रयुक्त; यह शास्त्रीय शीत क्वाथों का अंग है।
वर्ण्य द्रव्य के रूप में प्रियङ्गु
वर्ण सुधारने वाला कहा गया है, और शास्त्रीय सौन्दर्य-कल्पों में प्रयुक्त होता है।
व्रण हेतु प्रियङ्गु
रक्तस्रावी व्रणों तथा देर से भरने वाले क्षतों पर चूर्ण के रूप में लगाया जाता है।
शास्त्रीय योगों में प्रियङ्गु
अशोकारिष्ट, चन्दनासव तथा अधिकांश स्त्री एवं शीत योगों में उपस्थित।
मात्रा — कितना लें
स्तम्भक एवं शीत योगों में पुष्प चूर्ण। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
प्रियंगु का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में प्रियंगु के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (रक्तपित्त प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (पुष्पवर्ग).
चरक संहिता में प्रियंगु के विषय में क्या कहा गया है?
स्तम्भक, शीत द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — रक्तपित्त प्रकरण.
भावप्रकाश निघण्टु में प्रियंगु के विषय में क्या कहा गया है?
स्तम्भक एवं शीत के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — पुष्पवर्ग.
आयुर्वेद में प्रियंगु किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
प्रियङ्गु एक शीत, कषाय द्रव्य है जो रक्तस्राव-विकारों, दाह तथा अत्यधिक तृष्णा में, और अत्यधिक रक्तस्राव सहित स्त्री-विकारों में प्रयुक्त होता है। बाह्य रूप से यह दाहयुक्त त्वचा एवं शोथ पर लगाया जाता है, और इस संग्रह के शीत आसवों में सम्मिलित रहता है।
प्रियंगु के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कषाय, तिक्त, मधुर, गुण गुरु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: पित्त और कफ का शमन. प्रभाव: स्तम्भक (styptic), शीतल.
प्रियंगु को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। प्रियंगु का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: पित्त और कफ का शमन.
प्रियंगु का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: पुष्प.
प्रियंगु की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
स्तम्भक एवं शीत योगों में पुष्प चूर्ण। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
प्रियंगु का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित।
प्रियंगु कहाँ पाया जाता है?
प्रियङ्गु हिमालय की तलहटी तथा पर्वतीय वनों का क्षुप है, जिस पर छोटे पुष्पों के गुच्छे लगते हैं।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — पुष्पवर्ग
स्तम्भक एवं शीत के रूप में वर्णित। - चरक संहिता — रक्तपित्त प्रकरण
स्तम्भक, शीत द्रव्यों में उल्लिखित।
Modern research
-
Pharmacological and Traditional Insights into Callicarpa macrophylla: A Comprehensive Review
(see source). Journal of Natural Remedies (2024)
A review of Callicarpa macrophylla (Priyangu) documenting its anti-inflammatory, antioxidant, antimicrobial and analgesic pharmacology.
View study
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित।
प्राप्ति स्थान
प्रियङ्गु हिमालय की तलहटी तथा पर्वतीय वनों का क्षुप है, जिस पर छोटे पुष्पों के गुच्छे लगते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रियङ्गु किसमें प्रयुक्त होता है?
अत्यधिक रजःस्राव सहित रक्तस्राव-विकार, दाह, अतिसार, श्वेतप्रदर तथा शोथयुक्त त्वचा में। यह एक शीत कषाय द्रव्य है जो शास्त्रीय रक्तपित्त एवं स्त्री-योगों में प्रयुक्त होता है।
प्रियङ्गु की मात्रा क्या है?
पुष्प अथवा फल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली। यह प्रायः अकेले नहीं, अपितु अशोकारिष्ट जैसे किसी योग के भीतर लिया जाता है।
प्रियङ्गु को हिन्दी में क्या कहते हैं?
प्रियंगु अथवा फूलप्रियंगु। अंग्रेज़ी में ब्यूटी बेरी, छोटे बैंगनी फलों के गुच्छों के कारण। इस नाम से कई जातियाँ व्यापार में आती हैं — वानस्पतिक नाम अवश्य देखें।
क्या प्रियङ्गु के दुष्प्रभाव हैं?
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। कषाय होने से दीर्घ एवं अधिक प्रयोग विबन्ध कर सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें। दीर्घकालीन अत्यधिक रक्तस्राव में चिकित्सकीय जाँच सदैव आवश्यक है।
क्या प्रियङ्गु और प्रियंगु कंगनी एक ही हैं?
नहीं। कुछ ग्रन्थ तथा प्रादेशिक परम्पराएँ प्रियंगु नाम कंगनी (Setaria italica) को देती हैं, जो इस क्षुप के स्थान पर एक धान्य है। यह भ्रम का सुविदित बिन्दु है — नुस्खे में कौन-सा अभीष्ट है, उसकी पुष्टि करें।
क्या प्रियङ्गु अत्यधिक रजःस्राव में सहायक है?
यह ठीक इसी हेतु प्रयुक्त शास्त्रोक्त रक्तस्तम्भक द्रव्य है, प्रायः अशोक, लोध्र एवं धातकी सहित किसी योग के भीतर। दीर्घकालीन अत्यधिक रक्तस्राव में गर्भाशय-अर्बुद तथा अन्य कारणों को निरस्त करने हेतु जाँच आवश्यक है।
प्रियङ्गु का कौन-सा अंग प्रयुक्त होता है?
मुख्यतः पुष्प, तथा कुछ कल्पों में फल भी। दोनों सुखाकर चूर्ण किए जाते हैं अथवा क्वाथों में प्रयुक्त होते हैं।
आयुर्वेदीय योग संग्रह में: Ashwagandharishta Chandanasava Dashamoolarishta Usheerasava