पुष्करमूल (Inula racemosa) — root
पुष्करमूल — Inula racemosa. चित्र में सम्पूर्ण वनस्पति है; प्रयोज्य अंग का चित्र उपलब्ध नहीं था। प्रयोज्य अंग: मूल.
चित्र: Hume Douglas / Wikimedia Commons, CC BY 4.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

पुष्करमूल पुष्करमूल

Inula racemosa · Asteraceae

अन्य नाम: पुष्करमूल, पोखरमूल

प्रयोज्य अंग: मूल

पुष्करमूल (Inula racemosa) एक हिमालयी ओषधि है जिसका सुगन्धित मूल उरःशूल तथा श्वसन-विकारों हेतु आयुर्वेद का विशिष्ट द्रव्य है। शास्त्र इसे हृद्रोग तथा पार्श्वशूल — हृदय-शूल तथा पार्श्व-शूल — में नामित करते हैं, और यह आयुर्वेदीय हृदय-चिकित्सा में आज भी मानक द्रव्य है।

पुष्करमूल — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कटु
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावहृद्य, Shwasahara (respiratory-cardiac)

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Inula racemosa
  • प्रयोज्य अंग: मूल
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: मूल चूर्ण 1–3 ग्राम मधु के साथ; उर एवं श्वसन योगों में प्रयुक्त।

पुष्करमूल के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीपुष्करमूल
अंग्रेज़ीPushkarmool
संस्कृतपुष्करमूल, पद्मपत्र
बंगालीপুষ্করমূল
गुजरातीપુષ્કરમૂળ
मराठीपुष्करमूळ
तमिलபுஷ்கரமூலம்
तेलुगुపుష్కరమూలం
कन्नड़ಪುಷ್ಕರಮೂಲ
लैटिन (वानस्पतिक)Inula racemosa

परिचय

पुष्करमूल (Inula racemosa) एक उष्ण मूल है जो हृदय एवं फुफ्फुस हेतु मान्य है। यह उरःशूल, कास तथा श्वास-कष्ट का शास्त्रीय उपाय है, जो हृदय एवं श्वसन सहायता को एक साथ जोड़ता है।

वर्गीकरण

एस्टरेसी (Asteraceae) कुल का पुष्करमूल हृद्य तथा श्वासहर द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु-तिक्त रस, तीक्ष्ण गुण एवं उष्ण वीर्य उर से कफ का हरण करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

पुष्करमूल एक उर-द्रव्य है, जो कास, श्वास-कष्ट तथा उर-शूल में प्रयुक्त होता है, और शास्त्रों में हृद्य कहा गया है। यही वह द्रव्य है जिसे शास्त्र पार्श्वशूल — पार्श्व में शूल — हेतु नामित करते हैं, और यह पाचक नहीं, अपितु श्वसन योगों में सम्मिलित रहता है।

उरःशूल हेतु पुष्करमूल

इसका परिभाषक संकेत। हृद्रोग तथा पार्श्वशूल — हृदय एवं पर्शुका-अन्तर शूल — में नामित, और आयुर्वेदीय हृदय-चिकित्सा में प्रयुक्त।

श्वास हेतु पुष्करमूल

एक प्रधान श्वासहर द्रव्य, जो श्वसनिका-श्वास तथा श्वास-कष्ट में प्रयुक्त होता है।

कास हेतु पुष्करमूल

उष्ण एवं रूक्ष होने से अवरोध सहित कफज कास में प्रयुक्त।

पार्श्वशूल हेतु पुष्करमूल

श्वास लेने पर होने वाले शूल में प्रयुक्त — यही शास्त्रोक्त पार्श्वशूल संकेत है।

पाचन हेतु पुष्करमूल

अरुचि तथा उदर-आध्मान में प्रयुक्त दीपन द्रव्य।

ज्वर हेतु पुष्करमूल

श्वसन-संलिप्तता सहित ज्वर में प्रयुक्त।

हिक्का हेतु पुष्करमूल

अन्य श्वसन-द्रव्यों के साथ हिक्का में नामित।

प्रमेह हेतु पुष्करमूल

कुछ शास्त्रों में प्रमेहहर द्रव्यों में नामित।

सन्धि-शूल हेतु पुष्करमूल

अपने उष्ण, रूक्ष कर्म के आधार पर योगों के भीतर आमवात में प्रयुक्त।

शास्त्रीय योगों में पुष्करमूल

पुष्करमूलादि क्वाथ तथा शास्त्रीय हृदय एवं श्वसन योगों में उपस्थित।

मात्रा — कितना लें

मूल चूर्ण 1–3 ग्राम मधु के साथ; उर एवं श्वसन योगों में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

पुष्करमूल का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में पुष्करमूल के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (Hikka-श्वास प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग).

चरक संहिता में पुष्करमूल के विषय में क्या कहा गया है?

उर तथा श्वास हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — Hikka-श्वास प्रकरण.

भावप्रकाश निघण्टु में पुष्करमूल के विषय में क्या कहा गया है?

हृद्य एवं श्वासहर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.

आयुर्वेद में पुष्करमूल किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

पुष्करमूल एक उर-द्रव्य है, जो कास, श्वास-कष्ट तथा उर-शूल में प्रयुक्त होता है, और शास्त्रों में हृद्य कहा गया है। यही वह द्रव्य है जिसे शास्त्र पार्श्वशूल — पार्श्व में शूल — हेतु नामित करते हैं, और यह पाचक नहीं, अपितु श्वसन योगों में सम्मिलित रहता है।

पुष्करमूल के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कटु, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: हृद्य, Shwasahara (respiratory-cardiac).

पुष्करमूल को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। पुष्करमूल का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

पुष्करमूल का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: मूल.

पुष्करमूल की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

मूल चूर्ण 1–3 ग्राम मधु के साथ; उर एवं श्वसन योगों में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

पुष्करमूल का प्रयोग कब वर्जित है?

उष्ण एवं प्रबल; उचित मात्रा में तथा गर्भावस्था एवं उच्च पित्त में निर्देशन के अन्तर्गत प्रयोग करें।

पुष्करमूल कहाँ पाया जाता है?

पुष्करमूल पश्चिमी हिमालय में उगता है; इसका मूल उत्तरी भारत के पर्वतीय प्रदेशों से मध्यम ऊँचाई पर संचित किया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
    हृद्य एवं श्वासहर के रूप में वर्णित।
  • चरक संहिता — Hikka-श्वास प्रकरण
    उर तथा श्वास हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Phytoestrogenic effect of Inula racemosa Hook f — a cardioprotective root drug in traditional medicine (see source). Journal of Ethnopharmacology (2017)

    A study examining the cardioprotective root drug Inula racemosa (Pushkaramula), traditionally used in angina and ischaemic heart disease, and its phytoestrogenic activity.

    View study

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

उष्ण एवं प्रबल; उचित मात्रा में तथा गर्भावस्था एवं उच्च पित्त में निर्देशन के अन्तर्गत प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

पुष्करमूल पश्चिमी हिमालय में उगता है; इसका मूल उत्तरी भारत के पर्वतीय प्रदेशों से मध्यम ऊँचाई पर संचित किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पुष्करमूल किसमें प्रयुक्त होता है?

सर्वोपरि उरःशूल तथा श्वसन-विकारों में — शास्त्रों ने इसे हृद्रोग तथा पार्श्वशूल हेतु नामित किया है, और यह श्वास, कास एवं श्वासजन्य पार्श्व-शूल में प्रयुक्त होता है।

पुष्करमूल की मात्रा क्या है?

मूल चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम मधु के साथ, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। यह प्रायः किसी योग के भीतर दिया जाता है।

क्या पुष्करमूल हृदय-रोग की चिकित्सा कर सकता है?

यह हृदय-शूल का शास्त्रोक्त द्रव्य है और आयुर्वेदीय हृदय-चिकित्सा में प्रयुक्त होता है। यह हृदय-रोग विशेषज्ञ की जाँच का विकल्प नहीं — किसी भी उरःशूल की उचित जाँच आवश्यक है, और नया अथवा तीव्र उरःशूल आपात स्थिति है।

पुष्करमूल को हिन्दी में क्या कहते हैं?

पुष्करमूल अथवा पोखरमूल। अंग्रेज़ी में इण्डियन एलिकैम्पेन। यह Inula helenium, अर्थात् यूरोपीय एलिकैम्पेन का निकट सजातीय है, जो श्वसन-विकारों में समान रूप से प्रयुक्त होता है।

क्या पुष्करमूल संकटग्रस्त है?

Inula racemosa संग्रह-दबाव में एक हिमालयी जाति है और अपने विस्तार के कुछ भागों में संकटग्रस्त सूचीबद्ध है। Inula helenium तथा अन्य जातियों से प्रतिस्थापन होता है — देखें कि वानस्पतिक नाम अंकित हो।

क्या पुष्करमूल के दुष्प्रभाव हैं?

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। यह उष्ण एवं रूक्ष है, अतः पित्त बढ़ा सकता है और शुष्क, क्षोभयुक्त कास हेतु कम उपयुक्त है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।

क्या पुष्करमूल श्वास में अच्छा है?

यह प्रधान शास्त्रीय श्वासहर द्रव्यों में से एक है और समस्त आयुर्वेदीय श्वसन-योगों में सम्मिलित रहता है। यह सहायक है — श्वास को उचित निदान चाहिए और निर्धारित इन्हेलर नहीं रोकने चाहिए।

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