चित्र: Forest and Kim Starr / Wikimedia Commons, CC BY 3.0 us
भृंगराज, भांगरा भृङ्गराज
Eclipta prostrata · Asteraceae
अन्य नाम: भांगरा, Eclipta alba, फ़ॉल्स डेज़ी, शुद्ध सक्रिय ओषधि चूर्ण
प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग
भृंगराज (Eclipta prostrata) आर्द्र भारतीय भूमि की एक छोटी विसर्पी ओषधि है, जिसे केशराज कहा जाता है। आयुर्वेद इसके पञ्चाङ्ग को केश-पात एवं असमय पलितता में, और उतना ही यकृत् हेतु रसायन के रूप में प्रयुक्त करता है। यह शास्त्रीय केश-तैल भृंगराज तैल का प्रधान द्रव्य है।
| रस | कटु, तिक्त |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | केश्य (केश बल्य), यकृत् रसायन |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Eclipta prostrata
- प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा ताज़ा स्वरस आन्तरिक रूप से; भृंगराज तैल शिर-त्वचा पर लगाया जाता है।
भृंगराज, भांगरा के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
भृंगराज (Eclipta prostrata) आयुर्वेद में "केशराज" है — केश-वृद्धि, वर्ण तथा शिर-त्वचा हेतु प्रमुखतम द्रव्य, और यकृत् का सहायक। इसका गहरा स्वरस केश-तैलों का शास्त्रीय घटक है।
वर्गीकरण
एस्टरेसी (Asteraceae) कुल का यह द्रव्य केश्य (केश-हितकर) तथा यकृत्-पोषक द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु-तिक्त रस एवं उष्ण वीर्य शिर-त्वचा को उत्तेजित करता है तथा रक्त एवं मज्जा धातु को सहारा देता है।
उपयोग एवं लाभ
भृंगराज प्रमुखतम केश्य द्रव्य है, जो केश-पात एवं असमय पलितता में तैल रूप में लगाया तथा आन्तरिक रूप से लिया जाता है। शास्त्र इसे उतना ही यकृत्-द्रव्य — यकृत्-उत्तेजक — के रूप में भी मानते हैं, और यह अपने अधिक प्रसिद्ध सौन्दर्य-प्रयोग के साथ-साथ कामला तथा मन्द यकृत्-क्रिया के योगों में भी सम्मिलित रहता है।
केश-पात हेतु भृंगराज
इसका सर्वाधिक ज्ञात प्रयोग, और यही कारण है कि इस वनस्पति को केशराज कहा जाता है। शिर-त्वचा पर तैल रूप में दिनों नहीं, मासों तक लगाया जाता है।
असमय पलितता हेतु भृंगराज
केश को गहरा करने तथा पलितता मन्द करने हेतु परम्परागत रूप से प्रयुक्त, प्रायः शास्त्रीय तैलों में आमलकी के साथ।
यकृत् हेतु भृंगराज
समान रूप से महत्त्वपूर्ण किन्तु कम ज्ञात प्रयोग। शास्त्रों ने इसे कामला में नामित किया है और यह भारतीय परम्परा में आज भी मानक यकृत्-द्रव्य है।
दारुणक हेतु भृंगराज
शिर-त्वचा पर शल्क एवं कण्डू हेतु लगाया जाता है, जहाँ इसका शीत स्वभाव क्षुब्ध शिर-त्वचा के अनुकूल बैठता है।
रसायन के रूप में भृंगराज
कायाकल्पकारी द्रव्य के रूप में वर्गीकृत, जो किसी तीव्र व्याधि हेतु नहीं, अपितु दीर्घकाल तक आन्तरिक रूप से लिया जाता है।
निद्रा हेतु भृंगराज
भृंगराज तैल से शिरोभ्यंग अशान्त निद्रा तथा रात्रि में अति-सक्रिय मन हेतु पारम्परिक उपाय है।
त्वचा हेतु भृंगराज
जीर्ण त्वचा-रोग में प्रयुक्त तथा छोटे व्रणों पर लगाया जाता है, उसी शीत, रक्त-प्रसादक सिद्धान्त पर।
नेत्र-स्वास्थ्य हेतु भृंगराज
एक गौण शास्त्रीय संकेत, जिसे चाक्षुष्य — नेत्रों हेतु हितकर — कहा गया है।
शिरःशूल हेतु भृंगराज
ताज़ा स्वरस ललाट पर लगाना भारत के अनेक भागों में उष्णताजन्य शिरःशूल का गृह-उपाय है।
महाभृंगराज तैल में भृंगराज
सर्वाधिक ज्ञात शास्त्रीय केश-तैल का प्रधान द्रव्य, तथा अधिकांश पारम्परिक केश एवं यकृत् योगों का घटक।
मात्रा — कितना लें
चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा ताज़ा स्वरस आन्तरिक रूप से; भृंगराज तैल शिर-त्वचा पर लगाया जाता है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
भृंगराज, भांगरा का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में भृंगराज, भांगरा के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
भावप्रकाश निघण्टु में भृंगराज, भांगरा के विषय में क्या कहा गया है?
केश्य, केशों हेतु हितकर, के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में भृंगराज, भांगरा किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
भृंगराज प्रमुखतम केश्य द्रव्य है, जो केश-पात एवं असमय पलितता में तैल रूप में लगाया तथा आन्तरिक रूप से लिया जाता है। शास्त्र इसे उतना ही यकृत्-द्रव्य — यकृत्-उत्तेजक — के रूप में भी मानते हैं, और यह अपने अधिक प्रसिद्ध सौन्दर्य-प्रयोग के साथ-साथ कामला तथा मन्द यकृत्-क्रिया के योगों में भी सम्मिलित रहता है।
भृंगराज, भांगरा के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कटु, तिक्त, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: केश्य (केश बल्य), यकृत् रसायन.
भृंगराज, भांगरा को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। भृंगराज, भांगरा का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
भृंगराज, भांगरा का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग.
भृंगराज, भांगरा की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा ताज़ा स्वरस आन्तरिक रूप से; भृंगराज तैल शिर-त्वचा पर लगाया जाता है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
भृंगराज, भांगरा का प्रयोग कब वर्जित है?
सामान्यतः सुरक्षित; अधिक मात्रा में शीत-रूक्ष हो सकता है। गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
भृंगराज, भांगरा कहाँ पाया जाता है?
भृंगराज आर्द्र भूमि की छोटी ओषधि है, जो भारत भर में खेतों की मेड़ों, नालियों तथा आर्द्रभूमियों के किनारे सामान्य रूप से मिलती है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
केश्य, केशों हेतु हितकर, के रूप में वर्णित। - शास्त्रीय केश एवं यकृत् प्रकरण — —
परवर्ती ग्रन्थों में केश एवं यकृत् हेतु उल्लिखित।
Modern research
-
Eclipta prostrata promotes the induction of anagen, sustains the anagen phase through regulation of FGF-7 and FGF-5
(see source). (2019)
A study reporting Eclipta prostrata induced and sustained the anagen (growth) phase of hair follicles via regulation of FGF-7 and FGF-5.
View study doi:10.1080/13880209.2018.1561729 -
Hair growth promoting activity of Eclipta alba in male albino rats
Roy RK, Thakur M, Dixit VK. Archives of Dermatological Research (2008)
A controlled animal study reporting Eclipta alba (Bhringraj) extract significantly reduced hair-growth initiation time and produced more anagen-phase follicles than the minoxidil control.
View study doi:10.1007/s00403-008-0860-3
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सामान्यतः सुरक्षित; अधिक मात्रा में शीत-रूक्ष हो सकता है। गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
भृंगराज आर्द्र भूमि की छोटी ओषधि है, जो भारत भर में खेतों की मेड़ों, नालियों तथा आर्द्रभूमियों के किनारे सामान्य रूप से मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या भृंगराज तैल सचमुच केश-पात रोकता है?
यह शास्त्रोक्त आयुर्वेदीय केश-द्रव्य है जिसका दीर्घ पारम्परिक अभिलेख है और कुछ आधुनिक कार्य भी इसका समर्थन करते हैं; इसे शिर-त्वचा पर तैल रूप में मासों तक लगाया जाता है। यह वहाँ सर्वाधिक कार्य करता है जहाँ केश-पात तनाव, उष्णता अथवा शिर-त्वचा के क्षोभ के पश्चात् हुआ हो। हार्मोनजन्य अथवा आनुवंशिक केश-पात को भिन्न चिकित्सा चाहिए।
भृंगराज तैल का प्रयोग कैसे करें?
तैल को थोड़ा उष्ण करें, अँगुलियों के पोरों से शिर-त्वचा में मलें, और धोने से पूर्व कम से कम एक घण्टा अथवा रात भर छोड़ दें। सप्ताह में दो या तीन बार सामान्य है। मात्रा से अधिक महत्त्वपूर्ण है तीन मास तक नियमितता।
क्या भृंगराज आन्तरिक रूप से लिया जा सकता है?
हाँ। पञ्चाङ्ग चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम अथवा ताज़ा स्वरस 10–20 मिली, मुख्यतः यकृत्-विकारों में तथा रसायन के रूप में। यकृत् हेतु इसका आन्तरिक प्रयोग शास्त्रों में उतना ही स्थापित है जितना केश हेतु बाह्य प्रयोग।
क्या भृंगराज सफ़ेद बालों को पुनः काला कर देता है?
यह परम्परागत रूप से पलितता मन्द करने तथा केश को गहरा करने हेतु प्रयुक्त होता है, प्रायः आमलकी के साथ। जो पलितता स्थापित हो चुकी है उसे यह पलटेगा नहीं — इस दावे को यथार्थ दृष्टि से देखें। इसका प्रभाव वर्ण लौटाने के स्थान पर वर्ण बनाए रखने के रूप में ही ठीक कहा जाएगा।
भृंगराज को हिन्दी में क्या कहते हैं?
भृंगराज अथवा भांगरा। संस्कृत में इसे केशराज भी कहते हैं, अर्थात् केशों का राजा। वानस्पतिक नाम Eclipta prostrata है, जो पुराने Eclipta alba से संशोधित है और अनेक स्रोत आज भी वही देते हैं।
क्या भृंगराज के दुष्प्रभाव हैं?
अत्यन्त सुसह्य। यह शीत है, अतः अधिक आन्तरिक प्रयोग शीत सहन न करने वाले व्यक्ति के अनुकूल नहीं हो सकता। बाह्य प्रयोग में कभी-कभी हल्की शिर-त्वचा प्रतिक्रिया होती है — पहले पैच परीक्षण करें। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।
क्या भृंगराज यकृत् हेतु अच्छा है?
यह मानक आयुर्वेदीय यकृत्-द्रव्यों में से एक है, जिसे शास्त्रों ने कामला हेतु नामित किया है और जो भारतीय परम्परा में मन्द यकृत्-क्रिया हेतु प्रयुक्त होता है। किसी भी दीर्घकालीन यकृत्-विकार में साथ-साथ उचित चिकित्सकीय जाँच आवश्यक है।