चव्य, चाब (Piper retrofractum) — stem
चव्य, चाब — Piper retrofractum. चित्र में सम्पूर्ण वनस्पति है; प्रयोज्य अंग का चित्र उपलब्ध नहीं था। प्रयोज्य अंग: काण्ड.
चित्र: Kembangraps / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

चव्य, चाब चव्य

Piper retrofractum · Piperaceae

अन्य नाम: चव्य, चाब, जावा पिप्पली

प्रयोज्य अंग: काण्ड

चव्य (Piper retrofractum) एक आरोही मरिच-जाति है जिसका शुष्क काण्ड आयुर्वेद में पाचक तथा कफ-निर्हरक द्रव्य के रूप में प्रयुक्त होता है। यह पिप्पली एवं मरिच के साथ कटु Piper वर्ग में आता है, और आध्मान, अरुचि तथा उदर-शूल हेतु शास्त्रीय पाचक योगों में सम्मिलित रहता है।

चव्य, चाब — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावदीपन, पाचन

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Piper retrofractum
  • प्रयोज्य अंग: काण्ड
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: काण्ड चूर्ण 0.5–1 ग्राम; पाचक योगों (पञ्चकोल) में प्रयुक्त।

चव्य, चाब के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीचव्य, चाब
अंग्रेज़ीJava Long Pepper
संस्कृतचव्य, चविका
बंगालीচই
गुजरातीચવક
मराठीचवक
तमिलசவ்வியம்
तेलुगुచవ్యము
कन्नड़ಚವ್ಯ
लैटिन (वानस्पतिक)Piper retrofractum

परिचय

चव्य (Piper retrofractum) मरिच-कुल का एक उष्ण द्रव्य है, जो अग्नि प्रदीप्त करने तथा कफ हरने हेतु प्रयुक्त होता है। पिप्पली का निकट सजातीय होने के कारण इसका काण्ड शास्त्रोक्त दीपन-पाचन द्रव्य है।

वर्गीकरण

पाइपरेसी (Piperaceae) कुल का यह द्रव्य दीपन-पाचन (पाचक) द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु रस, तीक्ष्ण गुण एवं उष्ण वीर्य अग्नि को प्रज्वलित करते हैं तथा आम एवं कफ का हरण करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

चव्य पञ्चकोल के पाँच द्रव्यों में से एक है, जो शास्त्रीय पाचक वर्ग है। इसका कटु काण्ड अग्निमान्द्य, उदर-आध्मान तथा मन्द पाचन के पश्चात् आने वाले गौरव में, एवं कृमि-रोग में प्रयुक्त होता है। यह उष्ण है और सामान्यतः भोजन से पूर्व अथवा भोजन के साथ लिया जाता है।

अरुचि हेतु चव्य

एक दीपन द्रव्य, कटु एवं उष्ण, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ जठराग्नि मन्द हो और अन्न अपच रह जाए।

आध्मान हेतु चव्य

आध्मान — अवरुद्ध वायु सहित उदर-विस्तार — में प्रयुक्त, जो इसके स्पष्टतम शास्त्रीय संकेतों में से एक है।

उदर-शूल हेतु चव्य

वातज मरोड़युक्त शूल में दिया जाता है, प्रायः अकेले नहीं अपितु किसी योग के भीतर।

अर्श हेतु चव्य

शास्त्रीय अर्श-योगों में नामित, जहाँ मन्द पाचन ही अवस्था का मूल कारण होता है।

कृमि हेतु चव्य

एक कृमिघ्न द्रव्य, जिसकी कटुता ही पारम्परिक कृमिनाशक कर्म का आधार है।

कास हेतु चव्य

घने अवरोध सहित कफज कास में प्रयुक्त, उसी उष्ण, रूक्ष सिद्धान्त पर जो अन्य मरिच-जातियों का है।

पञ्चकोल में चव्य

पञ्चकोल चूर्ण के पाँच कटु द्रव्यों में से एक, जो शास्त्रीय पाचक चूर्ण है।

प्लीहा-वृद्धि हेतु चव्य

प्लीहा-रोग में नामित, जो उदरस्थ अंगों की वृद्धि हेतु योगों के भीतर लिया जाता है।

श्वास हेतु चव्य

श्वास में वहाँ प्रयुक्त जहाँ चित्र रूक्षता का नहीं, अपितु अवरोध का हो।

जैवोपलब्धता-वर्धक के रूप में चव्य

अन्य Piper जातियों की भाँति यह अपने साथ के द्रव्यों के कर्म को वहन तथा वर्धित करने हेतु प्रयुक्त होता है।

मात्रा — कितना लें

काण्ड चूर्ण 0.5–1 ग्राम; पाचक योगों (पञ्चकोल) में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

चव्य, चाब का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में चव्य, चाब के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग); शार्ङ्गधर संहिता (Panchakola).

भावप्रकाश निघण्टु में चव्य, चाब के विषय में क्या कहा गया है?

दीपन एवं पाचन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.

शार्ङ्गधर संहिता में चव्य, चाब के विषय में क्या कहा गया है?

एक शास्त्रीय पाचक घटक। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Panchakola.

आयुर्वेद में चव्य, चाब किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

चव्य पञ्चकोल के पाँच द्रव्यों में से एक है, जो शास्त्रीय पाचक वर्ग है। इसका कटु काण्ड अग्निमान्द्य, उदर-आध्मान तथा मन्द पाचन के पश्चात् आने वाले गौरव में, एवं कृमि-रोग में प्रयुक्त होता है। यह उष्ण है और सामान्यतः भोजन से पूर्व अथवा भोजन के साथ लिया जाता है।

चव्य, चाब के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: दीपन, पाचन.

चव्य, चाब को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। चव्य, चाब का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

चव्य, चाब का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: काण्ड.

चव्य, चाब की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

काण्ड चूर्ण 0.5–1 ग्राम; पाचक योगों (पञ्चकोल) में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

चव्य, चाब का प्रयोग कब वर्जित है?

पाक-प्रयोग तथा अल्प मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; बड़ी मात्रा पित्त बढ़ा सकती है।

चव्य, चाब कहाँ पाया जाता है?

चव्य भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णतर, आर्द्र प्रदेशों की एक आरोही लता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
    दीपन एवं पाचन के रूप में वर्णित।
  • शार्ङ्गधर संहिता — Panchakola
    एक शास्त्रीय पाचक घटक।

Modern research

  1. Anti-Inflammatory, Analgesic, and Antipyretic Activities of the Ethanol Extract of Piper interruptum Opiz. and Piper chaba Linn. (see source). ISRN Pharmacology (2012)

    A study reporting the ethanol extract of Piper chaba (Chavya) had anti-inflammatory, analgesic and antipyretic activity in laboratory animals.

    View study doi:10.5402/2012/480265

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

पाक-प्रयोग तथा अल्प मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; बड़ी मात्रा पित्त बढ़ा सकती है।

प्राप्ति स्थान

चव्य भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णतर, आर्द्र प्रदेशों की एक आरोही लता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चव्य किसमें प्रयुक्त होता है?

चव्य एक पाचक द्रव्य है जो अरुचि, आध्मान, उदर-शूल, अर्श तथा कृमि में, और घने अवरोध सहित कास में प्रयुक्त होता है। यह प्रायः सदैव पञ्चकोल चूर्ण जैसे किसी योग के भीतर दिया जाता है, अकेले नहीं।

चव्य की मात्रा क्या है?

काण्ड चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, मधु अथवा उष्ण जल के साथ। यह कटु एवं उष्ण है, अतः मात्रा अल्प रखी जाती है और प्रायः किसी योग के अंग के रूप में।

क्या चव्य और पिप्पली एक ही हैं?

वे निकट सजातीय हैं किन्तु भिन्न हैं। पिप्पली Piper longum है; चव्य Piper retrofractum है, और उसमें फल नहीं, अपितु शुष्क काण्ड प्रयुक्त होता है। जावा पिप्पली चव्य का ही दूसरा नाम है।

पञ्चकोल क्या है?

एक शास्त्रीय पाँच-द्रव्य पाचक चूर्ण: पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक तथा शुण्ठी। पाँचों कटु एवं उष्ण हैं, और यह संयोग मन्दाग्नि, आध्मान तथा उदर-गौरव में प्रयुक्त होता है।

चव्य किसे नहीं लेना चाहिए?

अम्लपित्त, परिणामशूल अथवा शोथयुक्त आन्त्र-विकार वाले किसी भी व्यक्ति को, क्योंकि यह प्रबल उष्ण है और पित्त बढ़ाता है। गर्भावस्था में वर्जित। जो पहले से ही उष्ण प्रकृति का हो, उसके अनुकूल नहीं।

चव्य को हिन्दी में क्या कहते हैं?

चव्य अथवा चाब। कहीं-कहीं चविका भी मिलता है। अंग्रेज़ी में इसे जावा लॉन्ग पेपर अथवा बालिनीज़ लॉन्ग पेपर कहा जाता है।

क्या चव्य दीर्घकाल तक लिया जा सकता है?

यह अनिश्चित काल के लिए नहीं, अपितु क्रमों में लेने हेतु है। प्रबल कटु द्रव्यों का दीर्घ प्रयोग आन्त्र-आवरण को रूक्ष करता है और पित्त बढ़ाता है, अतः इसे पाचन के स्थिर होने तक लेकर रोक दिया जाता है।

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