चित्र: Yercaud-elango / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
दारुहल्दी दारुहरिद्रा
Berberis aristata · Berberidaceae
अन्य नाम: दारुहल्दी, इण्डियन बारबेरी, दारु हल्दी
प्रयोज्य अंग: काण्ड, मूल
दारुहरिद्रा (Berberis aristata) एक हिमालयी क्षुप है जिसका पीला काण्ड एवं मूल आयुर्वेद में नेत्र-संक्रमण, त्वचा-रोग, प्रमेह तथा यकृत्-विकारों में प्रयुक्त होता है। इसमें बर्बेरिन होता है, जो इसके अधिकांश कर्म का आधार है, और यह शास्त्रीय नेत्र-योग रसौत का स्रोत है।
| रस | तिक्त, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और पित्त का शमन |
| प्रभाव | लेखन, रक्तशोधक |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Berberis aristata
- प्रयोज्य अंग: काण्ड, मूल
- दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
- सामान्य मात्रा: चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; रसाञ्जन (जलीय सत्त्व) नेत्रों हेतु बाह्य रूप से प्रयुक्त होता है।
दारुहल्दी के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
दारुहरिद्रा (Berberis aristata) "काष्ठ-हल्दी" है, जिसका पीला काण्ड एवं मूल नेत्र, त्वचा तथा रक्त हेतु मान्य है। तिक्त एवं रूक्ष होकर यह उष्णता एवं संक्रमण दूर करती है और शास्त्रीय नेत्र-औषधि रसाञ्जन का स्रोत है।
वर्गीकरण
बर्बेरिडेसी (Berberidaceae) कुल की दारुहरिद्रा रक्तशोधक तथा लेखन द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-कषाय रस एवं उष्ण वीर्य कफ-पित्त का हरण करते हैं, रक्त का शोधन करते हैं तथा अतिरिक्त स्राव को सुखाते हैं।
उपयोग एवं लाभ
दारुहरिद्रा नेत्र, त्वचा तथा रक्त हेतु प्रयुक्त होती है। इसका सत्त्व रसौत नेत्राभिष्यन्द एवं पलक-विकारों में पारम्परिक नेत्र-लेप है, जबकि आन्तरिक रूप से यह प्रमेह, कामला तथा जीर्ण त्वचा-विकारों में अपने तिक्त, रक्तशोधक कर्म हेतु दी जाती है।
नेत्र-संक्रमण हेतु दारुहरिद्रा
शास्त्रोक्त नेत्ररोग द्रव्य, जो अभिष्यन्द तथा शोथयुक्त पलकों में प्रयुक्त होता है, प्रायः सिद्ध सत्त्व रसौत के रूप में।
त्वचा-रोग हेतु दारुहरिद्रा
जीर्ण शोथयुक्त एवं संक्रमित त्वचा-विकारों में प्रयुक्त कुष्ठघ्न द्रव्य, जो आन्तरिक रूप से लिया तथा बाह्य रूप से लगाया जाता है।
प्रमेह हेतु दारुहरिद्रा
प्रमेहहर द्रव्यों में नामित। इसकी बर्बेरिन-मात्रा ही रक्त-शर्करा नियन्त्रण में व्यापक आधुनिक रुचि का आधार है।
यकृत् हेतु दारुहरिद्रा
कामला तथा मन्द यकृत्-क्रिया में प्रयुक्त; इसकी तिक्तता पित्त-प्रवाह को सहारा देती है।
व्रण हेतु दारुहरिद्रा
संक्रमित व्रणों एवं क्षतों पर लगाई जाती है, जहाँ इसकी कीटाणुनाशक ख्याति दीर्घकाल से स्थापित है।
अतिसार हेतु दारुहरिद्रा
संक्रमणजन्य अतिसार एवं प्रवाहिका में प्रयुक्त, यहाँ भी बर्बेरिन के कर्म पर।
कर्ण-स्राव हेतु दारुहरिद्रा
रसौत नेत्र-प्रयोग के साथ-साथ जीर्ण कर्ण-स्राव में भी परम्परागत रूप से लगाया जाता है।
मुख-व्रण हेतु दारुहरिद्रा
मुखपाक एवं शोथयुक्त मसूड़ों में गण्डूष तथा स्थानिक लेप के रूप में प्रयुक्त।
हरिद्रा के विकल्प के रूप में दारुहरिद्रा
जहाँ हल्दी निर्दिष्ट हो किन्तु अधिक प्रबल तिक्त अभीष्ट हो, वहाँ दारुहरिद्रा उसका स्थान लेती है — नाम का अर्थ ही है 'काष्ठ-हल्दी'।
रसौत में दारुहरिद्रा
शास्त्रीय सिद्ध सत्त्व का स्रोत, जो मूल एवं काण्ड को औटाकर गहरे भंगुर पिण्ड के रूप में बनाया जाता है।
मात्रा — कितना लें
चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; रसाञ्जन (जलीय सत्त्व) नेत्रों हेतु बाह्य रूप से प्रयुक्त होता है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
दारुहल्दी का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में दारुहल्दी के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (Netra एवं कुष्ठ प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग).
सुश्रुत संहिता में दारुहल्दी के विषय में क्या कहा गया है?
नेत्र एवं त्वचा हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — Netra एवं कुष्ठ प्रकरण.
भावप्रकाश निघण्टु में दारुहल्दी के विषय में क्या कहा गया है?
रक्तशोधक एवं नेत्र-हितकर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में दारुहल्दी किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
दारुहरिद्रा नेत्र, त्वचा तथा रक्त हेतु प्रयुक्त होती है। इसका सत्त्व रसौत नेत्राभिष्यन्द एवं पलक-विकारों में पारम्परिक नेत्र-लेप है, जबकि आन्तरिक रूप से यह प्रमेह, कामला तथा जीर्ण त्वचा-विकारों में अपने तिक्त, रक्तशोधक कर्म हेतु दी जाती है।
दारुहल्दी के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: लेखन, रक्तशोधक.
दारुहल्दी को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। दारुहल्दी का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.
दारुहल्दी का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: काण्ड, मूल.
दारुहल्दी की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; रसाञ्जन (जलीय सत्त्व) नेत्रों हेतु बाह्य रूप से प्रयुक्त होता है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
दारुहल्दी का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
दारुहल्दी कहाँ पाया जाता है?
दारुहरिद्रा शीतोष्ण हिमालय का कण्टकयुक्त क्षुप है, जिसका पीला काष्ठ एवं मूल उत्तरी पर्वतीय प्रदेशों में संचित किया जाता है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
रक्तशोधक एवं नेत्र-हितकर के रूप में वर्णित। - सुश्रुत संहिता — Netra एवं कुष्ठ प्रकरण
नेत्र एवं त्वचा हेतु उल्लिखित।
Modern research
-
Berberis aristata and its secondary metabolites: Insights into nutraceutical and therapeutical applications
(see source). Biocatalysis and Agricultural Biotechnology (2022)
A review of Berberis aristata (Daruharidra) and its alkaloid berberine documenting antidiabetic, hypolipidemic, antimicrobial and hepatoprotective activities.
View study
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
दारुहरिद्रा शीतोष्ण हिमालय का कण्टकयुक्त क्षुप है, जिसका पीला काष्ठ एवं मूल उत्तरी पर्वतीय प्रदेशों में संचित किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दारुहरिद्रा किसमें प्रयुक्त होती है?
दारुहरिद्रा नेत्र-संक्रमण, जीर्ण त्वचा-रोग, प्रमेह, यकृत्-विकार, अतिसार तथा व्रण-संक्रमण में प्रयुक्त होती है। इसका सक्रिय यौगिक बर्बेरिन है, और यह रसौत का स्रोत है, जो शोथयुक्त नेत्रों पर लगाया जाने वाला शास्त्रीय योग है।
रसौत क्या है?
रसौत, अथवा रसाञ्जन, दारुहरिद्रा के मूल एवं काण्ड का जलीय सत्त्व है जिसे औटाकर गहरे ठोस रूप में लाया जाता है। यह शास्त्रीय नेत्र-लेप है, जिसे कल्क बनाकर अभिष्यन्द तथा अञ्जननामिका में पलकों पर लगाया जाता है।
क्या दारुहरिद्रा और हल्दी एक ही हैं?
नहीं। पीले वर्ण के कारण नाम का अर्थ "काष्ठ-हल्दी" है, किन्तु दारुहरिद्रा Berberis aristata है, एक हिमालयी क्षुप, जबकि हल्दी Curcuma longa है, एक प्रकन्द। उनमें वर्ण तथा कुछ प्रयोग समान हैं, कुल नहीं।
दारुहरिद्रा की मात्रा क्या है?
काण्ड अथवा मूल चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। रसौत के रूप में योग के भीतर 250 मिग्रा – 1 ग्राम आन्तरिक रूप से, अथवा निर्देशानुसार बाह्य रूप से।
दारुहरिद्रा किसे नहीं लेनी चाहिए?
गर्भावस्था तथा नवजात शिशुओं में वर्जित — बर्बेरिन इन दोनों में विशेष रूप से प्रतिनिषिद्ध है। यदि आप मधुमेह की औषधि लेते हैं तो चिकित्सकीय परामर्श लें, क्योंकि प्रभाव संचित हो सकते हैं, अथवा यकृत् द्वारा चयापचित किसी भी औषधि के साथ।
क्या मैं घर पर दारुहरिद्रा नेत्रों में डाल सकता हूँ?
बिना निर्देश के नहीं। नेत्र में लगाई जाने वाली प्रत्येक वस्तु भैषज्य-रूप से निर्मित एवं निर्जीवाणु होनी चाहिए, और नेत्र-संक्रमण को उचित निदान चाहिए। केवल अनुज्ञप्त योग का प्रयोग चिकित्सक के निर्देशानुसार करें।
क्या Berberis aristata संकटग्रस्त है?
हिमालय में यह वास्तविक संग्रह-दबाव में है और अपने विस्तार के कुछ भागों में संकटापन्न सूचीबद्ध है। देखें कि उत्पाद कृषित अथवा सतत रूप से संचित स्रोत का नाम देते हों।