चित्र: Danny Steven S. / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
एरंड, अरंडी एरण्ड
Ricinus communis · Euphorbiaceae
अन्य नाम: अरण्ड, पञ्चाङ्गुल, अण्डी, एरण्डमूल, एरण्ड तैल
प्रयोज्य अंग: बीज, मूल
एरण्ड (Ricinus communis) अरण्ड की वनस्पति है, जिसका तैल आयुर्वेद का प्रधान विरेचक तथा सर्वप्रमुख वातशामक द्रव्य है। यह विबन्ध, सन्धिवात, गृध्रसी तथा उदर-विकारों में प्रयुक्त होता है। विधिवत् निकाला गया तैल सुरक्षित है, किन्तु कच्चे बीज में राइसिन होता है और वह वस्तुतः संकटपूर्ण है।
| रस | मधुर, कटु, कषाय |
|---|---|
| गुण | गुरु, स्निग्ध, तीक्ष्ण |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | मधुर |
| दोष-कर्म | वात और कफ का शमन |
| प्रभाव | वातहर, विरेचन |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Ricinus communis
- प्रयोज्य अंग: बीज, मूल
- दोष-कर्म: वात और कफ का शमन
- सामान्य मात्रा: एरण्ड तैल विरेचक के रूप में 5–10 मिली; सन्धि-योगों में मूल का क्वाथ।
एरंड, अरंडी के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
एरण्ड (अरण्ड, Ricinus communis) सर्वप्रमुख वातशामक वनस्पति है — इसका तैल शास्त्रीय विरेचक है और इसका मूल सन्धिवात एवं वात-व्याधियों का प्रमुख घटक। उष्ण एवं स्निग्ध होकर यह स्नेहन करता है और गति देता है।
वर्गीकरण
यूफ़ोर्बिएसी (Euphorbiaceae) कुल का एरण्ड वातहर तथा विरेचन (विरेचक) द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसके गुरु-स्निग्ध गुण एवं उष्ण वीर्य वात-कफ का हरण करते हैं और आम को अधोगामी करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
अरण्ड शास्त्रोक्त वात-द्रव्य तथा आयुर्वेद का सर्वाधिक प्रयुक्त विरेचक है। तैल विबन्ध में और बड़ी शास्त्रोक्त मात्रा में विरेचन हेतु दिया जाता है; मूल सन्धिवात, गृध्रसी तथा कटिशूल में प्रयुक्त वात-क्वाथों का प्रधान घटक है। सूजी हुई, शूलयुक्त सन्धियों पर यह बाह्य रूप से लगाया जाता है।
विबन्ध हेतु एरण्ड
एरण्ड तैल शास्त्रोक्त विरेचन द्रव्य है — विश्वसनीय, शीघ्र प्रभावी, और वहाँ प्रयुक्त जहाँ भारवर्धक विरेचक विफल रहा हो।
सन्धिवात हेतु एरण्ड
सर्वप्रमुख वातहर द्रव्य कहा गया है। आमवात तथा आमवातिक अवस्थाओं में प्रयुक्त, जो उष्ण जल या दूध के साथ अल्प मात्रा में लिया जाता है।
गृध्रसी हेतु एरण्ड
एक शास्त्रीय गृध्रसी द्रव्य, जिसमें इसके विरेचक एवं वातशामक कर्म एक साथ प्रयुक्त होते हैं।
अभ्यंग तैल के रूप में एरण्ड
शूलयुक्त सन्धियों तथा कटि पर उष्ण करके लगाया जाता है, और बस्ति-कल्पों में प्रयुक्त होता है।
उदर-शोथ हेतु एरण्ड
उदर-रोग में प्रयुक्त, जहाँ विरेचन ही शास्त्रोक्त मार्ग है।
बाह्य रूप से एरण्ड पत्र
उष्ण किया हुआ पत्र शूलयुक्त, सूजी हुई सन्धियों पर बाँधा जाता है — यह व्यापक गृह-परम्परा है।
स्तन्य हेतु एरण्ड
दुग्ध-प्रवाह बढ़ाने हेतु पत्र का पुल्टिस परम्परागत रूप से स्तन पर लगाया जाता है।
पञ्चकर्म में एरण्ड
चिकित्सीय विरेचन का मानक द्रव्य तथा अनेक बस्ति-कल्पों का आधार।
कृमि हेतु एरण्ड
अपने विरेचक कर्म से आन्त्र-कृमियों को बाहर निकालने हेतु प्रयुक्त।
त्वचा हेतु एरण्ड
रूक्ष त्वचा-विकारों में तैल लगाया जाता है और शास्त्रीय व्रण एवं केश-कल्पों में प्रयुक्त होता है।
मात्रा — कितना लें
एरण्ड तैल विरेचक के रूप में 5–10 मिली; सन्धि-योगों में मूल का क्वाथ। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
एरंड, अरंडी का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में एरंड, अरंडी के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (वात-hara एवं विरेचन); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
चरक संहिता में एरंड, अरंडी के विषय में क्या कहा गया है?
वातशामक एवं विरेचक द्रव्यों में प्रमुख के रूप में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — वात-hara एवं विरेचन.
भावप्रकाश निघण्टु में एरंड, अरंडी के विषय में क्या कहा गया है?
वातहर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में एरंड, अरंडी किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
अरण्ड शास्त्रोक्त वात-द्रव्य तथा आयुर्वेद का सर्वाधिक प्रयुक्त विरेचक है। तैल विबन्ध में और बड़ी शास्त्रोक्त मात्रा में विरेचन हेतु दिया जाता है; मूल सन्धिवात, गृध्रसी तथा कटिशूल में प्रयुक्त वात-क्वाथों का प्रधान घटक है। सूजी हुई, शूलयुक्त सन्धियों पर यह बाह्य रूप से लगाया जाता है।
एरंड, अरंडी के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस मधुर, कटु, कषाय, गुण गुरु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक मधुर. दोष-कर्म: वात और कफ का शमन. प्रभाव: वातहर, विरेचन.
एरंड, अरंडी को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। एरंड, अरंडी का वीर्य उष्ण है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और कफ का शमन.
एरंड, अरंडी का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: बीज, मूल.
एरंड, अरंडी की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
एरण्ड तैल विरेचक के रूप में 5–10 मिली; सन्धि-योगों में मूल का क्वाथ। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
एरंड, अरंडी का प्रयोग कब वर्जित है?
एरण्ड तैल एक विरेचक है — उचित मात्रा में ही प्रयोग करें। गर्भावस्था तथा तीव्र उदर-अवस्थाओं में वर्जित।
एरंड, अरंडी कहाँ पाया जाता है?
अरण्ड भारत तथा उष्णकटिबन्ध की बंजर भूमि एवं खेतों का शीघ्र बढ़ने वाला क्षुप है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- चरक संहिता — वात-hara एवं विरेचन
वातशामक एवं विरेचक द्रव्यों में प्रमुख के रूप में उल्लिखित। - भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
वातहर के रूप में वर्णित।
Modern research
-
Analgesic and Anti-inflammatory Potential of Ricinus communis Linn.: Evidence from Pharmacology to Clinical Studies
(see source). Current Pharmacology Reports (2023)
A review documenting the analgesic and anti-inflammatory potential of Ricinus communis (Eranda / castor), driven by ricinoleic acid, alongside its laxative action.
View study doi:10.1007/s40495-023-00347-7
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
एरण्ड तैल एक विरेचक है — उचित मात्रा में ही प्रयोग करें। गर्भावस्था तथा तीव्र उदर-अवस्थाओं में वर्जित।
प्राप्ति स्थान
अरण्ड भारत तथा उष्णकटिबन्ध की बंजर भूमि एवं खेतों का शीघ्र बढ़ने वाला क्षुप है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आयुर्वेद में एरण्ड तैल किसमें प्रयुक्त होता है?
एरण्ड शास्त्रोक्त विरेचक तथा सर्वप्रमुख वातशामक द्रव्य है। यह विबन्ध, सन्धिवात, गृध्रसी, उदर-शोथ तथा कृमि में प्रयुक्त होता है — आन्तरिक रूप से अल्प मात्रा में और शूलयुक्त सन्धियों पर बाह्य रूप से।
एरण्ड तैल की मात्रा क्या है?
विबन्ध हेतु रात्रि में 5–10 मिली उष्ण जल या दूध के साथ। वात-अवस्थाओं हेतु 3–5 मिली की अल्प मात्रा। औपचारिक चिकित्सीय विरेचन की मात्रा चिकित्सक निर्धारित करता है और वह निगरानी में दी जाती है।
क्या एरण्ड तैल सुरक्षित है?
विधिवत् निकाला गया तैल सुरक्षित है और उसका प्रयोग-अभिलेख अत्यन्त दीर्घ है। कच्चा बीज सुरक्षित नहीं — उसमें राइसिन होता है, जो ज्ञात विषों में सर्वाधिक तीव्र है, और कुछ बीज चबाना प्राणघातक हो सकता है। सदैव अनुज्ञप्त स्रोत का निष्पीडित तैल ही प्रयोग करें।
एरण्ड तैल किसे नहीं लेना चाहिए?
गर्भावस्था में वर्जित — यह गर्भाशय को उत्तेजित करता है और प्रसव प्रेरित करने हेतु प्रयुक्त होता रहा है। आन्त्र-अवरोध, शोथयुक्त आन्त्र-रोग, आन्त्रपुच्छ-शोथ अथवा अस्पष्ट उदर-शूल में वर्जित। दीर्घ अथवा अभ्यासवश प्रयोग हेतु नहीं।
एरण्ड को श्रेष्ठ वात-द्रव्य क्यों कहा जाता है?
क्योंकि यह वात को उन दोनों मार्गों से सम्बोधित करता है जिन्हें शास्त्र मानते हैं: यह कोष्ठ को अधोगामी करता है, जहाँ वात संचित होता है, और यह स्निग्ध एवं उष्ण है, जो वात की रूक्ष, शीत प्रकृति का सीधा प्रतिकार है।
क्या एरण्ड तैल सन्धियों पर लगाया जा सकता है?
हाँ। शूलयुक्त सन्धियों तथा कटि पर उष्ण एरण्ड तैल लगाना मानक व्यवहार है, प्रायः उसके पश्चात् उष्ण सेक के साथ। इस बाह्य प्रयोग पर आन्तरिक सेवन की कोई सावधानी लागू नहीं होती।
क्या एरण्ड तैल केश-वृद्धि में सहायक है?
यह केश-तैलों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है और शुष्क केश एवं शिर-त्वचा हेतु वस्तुतः स्निग्धकारी है। यह केश उगाता है, इसका प्रमाण दुर्बल है — इसे केश-पात की चिकित्सा नहीं, अपितु कण्डिशनर मानें।