चित्र: Le.Loup.Gris / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
गोखरू गोक्षुर
Tribulus terrestris · Zygophyllaceae
अन्य नाम: गोखरू, गोखरू पञ्चाङ्ग, शुद्ध सक्रिय बीज चूर्ण
प्रयोज्य अंग: फल
गोक्षुर (Tribulus terrestris) एक नीची कण्टकयुक्त ओषधि है जिसका फल आयुर्वेद का प्रधान मूत्र एवं प्रजनन द्रव्य है। यह मूत्र-दाह, अश्मरी, प्रोस्टेट-विकार तथा क्षीण कामेच्छा में प्रयुक्त होता है, और दशमूल के दस मूलों में से एक है। नाम का अर्थ है "गाय का खुर", इसके कण्टकयुक्त फल के आकार से।
| रस | मधुर |
|---|---|
| गुण | गुरु, स्निग्ध |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | मधुर |
| दोष-कर्म | वात और पित्त का शमन |
| प्रभाव | मूत्रल (मूत्रल), वाजीकरण |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Tribulus terrestris
- प्रयोज्य अंग: फल
- दोष-कर्म: वात और पित्त का शमन
- सामान्य मात्रा: फल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः जल या दूध के साथ; क्वाथ रूप में भी लिया जाता है।
गोखरू के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
गोक्षुर (Tribulus terrestris) मूत्र एवं प्रजनन संस्थान हेतु एक शास्त्रीय आयुर्वेदीय द्रव्य है। इसका छोटा कण्टकयुक्त फल एक मृदु मूत्रल तथा कायाकल्पकारी बल्य है, जो स्वस्थ मूत्र-प्रवाह, वृक्क-क्रिया एवं ओज को सहारा देने हेतु प्रयुक्त होता है।
वर्गीकरण
ज़ाइगोफ़िलेसी (Zygophyllaceae) कुल का गोक्षुर मूत्रल (मूत्रवर्धक) तथा वाजीकरण द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका मधुर रस, गुरु-स्निग्ध गुण एवं शीत वीर्य मूत्र तथा प्रजनन धातुओं को शान्ति एवं पोषण देते हैं और वात-पित्त का शमन करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
गोक्षुर मूत्रविरेचनीय समूह का नेतृत्व करता है — वे द्रव्य जो मूत्र का मुक्त प्रवाह कराते हैं। यह कष्टयुक्त एवं दाहयुक्त मूत्रता में, अश्मरी में तथा प्रोस्टेट-वृद्धि में प्रयुक्त होता है, और पृथक् रूप से वाजीकरण योगों में वृष्य एवं बल्य द्रव्य के रूप में।
मूत्र-दाह हेतु गोक्षुर
इसका प्रमुखतम प्रयोग। मूत्राशय-शोथ तथा मूत्र-दाह में दिया जाने वाला शीत मूत्रल द्रव्य — मूत्रवर्धक होते हुए भी उष्ण न होना इसकी विशेषता है।
अश्मरी हेतु गोक्षुर
शास्त्रोक्त अश्मरी द्रव्य, जो छोटी अश्मरी निकालने तथा पुनरावृत्ति घटाने हेतु प्रयुक्त होता है। बड़ी अश्मरी को मूत्र-शल्य चिकित्सा चाहिए।
प्रोस्टेट-विकारों हेतु गोक्षुर
वृद्ध पुरुषों में कष्टयुक्त एवं अपूर्ण मूत्रता में प्रयुक्त — यह सुदीर्घ पारम्परिक संकेत है।
वाजीकरण द्रव्य के रूप में गोक्षुर
क्षीण कामेच्छा एवं यौन-दौर्बल्य हेतु प्रजनन-बल्य द्रव्यों में नामित — इसकी आधुनिक लोकप्रियता का अधिकांश आधार यही प्रयोग है।
पुरुष-प्रजनन क्षमता हेतु गोक्षुर
शुक्र-दुष्टि, अर्थात् प्रजनन-धातु के विकारों में शास्त्रोक्त रूप से प्रयुक्त, जो दीर्घ क्रमों में लिया जाता है।
दशमूल में गोक्षुर
लघु पञ्चमूल के पाँच छोटे मूलों में से एक।
शोथ हेतु गोक्षुर
इसका मूत्रल कर्म जल-संचय एवं सूजन में प्रयुक्त होता है।
वातरक्त हेतु गोक्षुर
वातरक्त में प्रयुक्त, जहाँ मूत्र-उत्पादन बढ़ाना शास्त्रोक्त दृष्टिकोण का अंग है।
बल हेतु गोक्षुर
सामान्य दुर्बलता में प्रयुक्त बल्य द्रव्य, प्रायः अश्वगंधा के साथ।
गोक्षुरादि गुग्गुलु में गोक्षुर
शास्त्रीय मूत्र-योग का प्रधान द्रव्य, जो सर्वाधिक निर्दिष्ट गुग्गुलु कल्पों में से एक है।
मात्रा — कितना लें
फल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः जल या दूध के साथ; क्वाथ रूप में भी लिया जाता है। मूत्र एवं प्रजनन सहायता हेतु दैनिक प्रयोग के अनुकूल। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
गोखरू का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में गोखरू के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (मूत्रकृच्छ्र प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
चरक संहिता में गोखरू के विषय में क्या कहा गया है?
मूत्र-विकारों हेतु प्रयुक्त द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — मूत्रकृच्छ्र प्रकरण.
भावप्रकाश निघण्टु में गोखरू के विषय में क्या कहा गया है?
मूत्रल (मूत्रवर्धक) एवं बल्य के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में गोखरू किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
गोक्षुर मूत्रविरेचनीय समूह का नेतृत्व करता है — वे द्रव्य जो मूत्र का मुक्त प्रवाह कराते हैं। यह कष्टयुक्त एवं दाहयुक्त मूत्रता में, अश्मरी में तथा प्रोस्टेट-वृद्धि में प्रयुक्त होता है, और पृथक् रूप से वाजीकरण योगों में वृष्य एवं बल्य द्रव्य के रूप में।
गोखरू के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस मधुर, गुण गुरु, स्निग्ध, वीर्य शीत, विपाक मधुर. दोष-कर्म: वात और पित्त का शमन. प्रभाव: मूत्रल (मूत्रल), वाजीकरण.
गोखरू को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। गोखरू का वीर्य शीत है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और पित्त का शमन.
गोखरू का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: फल.
गोखरू की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
फल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः जल या दूध के साथ; क्वाथ रूप में भी लिया जाता है। मूत्र एवं प्रजनन सहायता हेतु दैनिक प्रयोग के अनुकूल। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
गोखरू का प्रयोग कब वर्जित है?
सामान्यतः सुसह्य। गर्भावस्था में, तथा गम्भीर वृक्क-रोग होने या मूत्रल औषधि लेने पर, निर्देशन में ही प्रयोग करें।
गोखरू कहाँ पाया जाता है?
गोक्षुर शुष्क, बलुई एवं बंजर भूमि की नीची, फैलने वाली ओषधि है, जो भारत के मैदानों तथा विश्व के उष्ण प्रदेशों में व्यापक रूप से उगती है और उष्ण, शुष्क परिस्थितियों में पनपती है।
गोखरू किन शास्त्रीय योगों में सम्मिलित है?
Dashamula.
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
मूत्रल (मूत्रवर्धक) एवं बल्य के रूप में वर्णित। - चरक संहिता — मूत्रकृच्छ्र प्रकरण
मूत्र-विकारों हेतु प्रयुक्त द्रव्यों में उल्लिखित।
Modern research
-
Clinical study of Tribulus terrestris Linn. in Oligozoospermia: A double blind study
Sellandi TM, Thakar AB, Baghel MS. Ayu (2012)
A double-blind study evaluating Gokshura (Tribulus terrestris) in oligozoospermia, reflecting its classical use for reproductive and urinary health.
View study doi:10.4103/0974-8520.108822 -
Comparison of Murraya koenigii- and Tribulus terrestris-based oral formulation versus tamsulosin in the treatment of benign prostatic hyperplasia in men aged >50 years: a double-blind, double-dummy, randomized controlled trial
(see source). Journal of Clinical Pharmacy and Therapeutics (2011)
An RCT reporting that a Tribulus terrestris-based formulation significantly lowered urinary symptom (IPSS) scores in symptomatic benign prostatic hyperplasia.
View study doi:10.1016/j.clinthera.2011.11.005
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सामान्यतः सुसह्य। गर्भावस्था में, तथा गम्भीर वृक्क-रोग होने या मूत्रल औषधि लेने पर, निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
गोक्षुर शुष्क, बलुई एवं बंजर भूमि की नीची, फैलने वाली ओषधि है, जो भारत के मैदानों तथा विश्व के उष्ण प्रदेशों में व्यापक रूप से उगती है और उष्ण, शुष्क परिस्थितियों में पनपती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गोक्षुर किसमें प्रयुक्त होता है?
गोक्षुर मूत्र-दाह, अश्मरी, प्रोस्टेट-वृद्धि, शोथ तथा वातरक्त में, और क्षीण कामेच्छा एवं पुरुष-प्रजनन स्वास्थ्य हेतु वाजीकरण द्रव्य के रूप में प्रयुक्त होता है। यह दशमूल के दस मूलों में से भी एक है।
गोक्षुर की मात्रा क्या है?
फल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम दूध या उष्ण जल के साथ, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। गोक्षुरादि गुग्गुलु के रूप में प्रायः दो वटी दिन में दो बार, अथवा निर्देशानुसार। इसे थोड़े समय नहीं, अपितु सप्ताहों तक लिया जाता है।
क्या गोक्षुर से टेस्टोस्टेरोन बढ़ता है?
यह शास्त्रों में यौन-ओज हेतु वाजीकरण द्रव्य है, और अनुपूरक-बाज़ार में इसकी लोकप्रियता का आधार यही है। स्वस्थ पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन पर सीधे प्रभाव का आधुनिक प्रमाण दुर्बल है — विपणन के दावों को सन्देह से देखें, जबकि पारम्परिक प्रयोग अपने आधार पर खड़ा है।
क्या गोक्षुर अश्मरी में अच्छा है?
यह शास्त्रोक्त अश्मरी द्रव्य है, जो मूत्र-प्रवाह बढ़ाकर छोटी अश्मरी निकालने तथा पुनरावृत्ति घटाने हेतु प्रयुक्त होता है। तीव्र शूल, ज्वर अथवा अवरुद्ध प्रवाह उत्पन्न करने वाली अश्मरी चिकित्सकीय आपात है और उसे किसी द्रव्य की नहीं, मूत्र-शल्य चिकित्सा की आवश्यकता है।
गोक्षुर किसे नहीं लेना चाहिए?
गर्भावस्था में वर्जित। वृक्क-रोग होने पर चिकित्सकीय परामर्श लें, क्योंकि मूत्रल उपयुक्त न हो सकता, अथवा यदि आप मूत्रल, लिथियम या रक्तचाप की औषधि लेते हों। यदि मूत्रता सरल होने के स्थान पर कष्टकर हो जाए तो सेवन रोककर परामर्श लें।
गोक्षुर को हिन्दी में क्या कहते हैं?
गोखरू। अंग्रेज़ी में इसे पंक्चर वाइन, कैल्ट्रॉप अथवा गोटहेड कहते हैं — इसका कण्टकयुक्त फल साइकिल के टायर पंक्चर करने के लिए कुख्यात है, जहाँ से कई नाम आए हैं।
क्या स्त्रियाँ गोक्षुर ले सकती हैं?
हाँ। इसके मूत्र-सम्बन्धी संकेत समान रूप से लागू होते हैं, और यह मूत्र-विकारों तथा PCOS हेतु कुछ स्त्री-योगों में प्रयुक्त होता है। वाजीकरण प्रयोग शास्त्रों में पुरुष-सन्दर्भ में वर्णित है, किन्तु मूत्र-सम्बन्धी प्रयोग लिंग-विशिष्ट नहीं है।
इनका घटक: Dashamula