गुग्गुल (Commiphora wightii) — oleo-gum resin
गुग्गुल — Commiphora wightii. प्रयोज्य अंग: निर्यास (गुग्गुल).
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आयुर्वेदीय द्रव्य

गुग्गुल गुग्गुलु

Commiphora wightii · Burseraceae

अन्य नाम: गुग्गुल, इण्डियन बडेलियम, गुग्गुलु निर्यास

प्रयोज्य अंग: निर्यास (गुग्गुल)

गुग्गुलु (Commiphora wightii) एक छोटे मरुस्थलीय वृक्ष का गोंद-निर्यास है और आयुर्वेदीय योगों के एक सम्पूर्ण वर्ग का आधार। यह सन्धिवात, स्थौल्य, उच्च कोलेस्ट्रॉल, ग्रन्थि-शोथ तथा त्वचा-रोग में प्रयुक्त होता है। यह वनस्पति भारत में अत्यन्त संकटग्रस्त है, अतः स्रोत वस्तुतः महत्त्वपूर्ण है।

गुग्गुल — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कटु, कषाय
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, सर
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मत्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः वात और कफ शामक
प्रभावरसायन, लेखन (scraping), Yogavahi

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Commiphora wightii
  • प्रयोज्य अंग: निर्यास (गुग्गुल)
  • दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः वात और कफ शामक
  • सामान्य मात्रा: शोधित गुग्गुलु 250 मिग्रा–1 ग्राम, प्रायः योगों (योगराज, कैशोर, त्रिफला गुग्गुलु) के भीतर।

गुग्गुल के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीगुग्गुल
अंग्रेज़ीIndian Bdellium, Guggul
संस्कृतगुग्गुलु, पलंकष
बंगालीগুগ্গুল
गुजरातीગૂગળ
मराठीगुग्गुळ
तमिलகுங்கிலியம்
तेलुगुగుగ్గిలం
कन्नड़ಗುಗ್ಗುಳ
मलयालमഗുൽഗുലു
लैटिन (वानस्पतिक)Commiphora wightii

परिचय

गुग्गुलु (Commiphora wightii) एक मरुस्थलीय क्षुप का सुगन्धित ओलियो-गम निर्यास है, और आयुर्वेद की महान् बहुउपयोगी औषधियों में से एक। उष्ण, लेखन एवं कायाकल्पकारी होकर यह जोड़ों, मेद तथा शोधन हेतु अगणित शास्त्रीय गुग्गुलु योगों का आधार है।

वर्गीकरण

बर्सरेसी (Burseraceae) कुल का गुग्गुलु लेखन (खुरचने वाले), रसायन तथा योगवाही (सहवर्धक) द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-कटु रस, भेदक-सर गुण एवं उष्ण वीर्य आम, कफ तथा अतिरिक्त मेद का हरण करते हुए पोषण भी करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

गुग्गुलु शास्त्रोक्त शोथहर एवं मेदोहर निर्यास है, जो सन्धिवात, वातरक्त तथा सन्धि-शोथ में, और स्थौल्य एवं बढ़े मेद में प्रयुक्त होता है। यह प्रायः कभी अकेले नहीं दिया जाता: शास्त्रीय गुग्गुलु कल्प उसे उस क्वाथ के साथ जोड़ते हैं जो उसके कर्म को दिशा देता है, इसीलिए योगराज, कैशोर तथा कांचनार गुग्गुलु के प्रयोग इतने भिन्न हैं।

सन्धिवात हेतु गुग्गुलु

इसका प्रधान प्रयोग। उष्ण, भेदक एवं शोथहर होने से यह सन्धि-शूल हेतु योगराज, महायोगराज तथा सिंहनाद गुग्गुलु का आधार है।

कोलेस्ट्रॉल हेतु गुग्गुलु

मेदोरोग, अर्थात् विकृत मेद-चयापचय में नामित, और किसी भी आयुर्वेदीय निर्यास की तुलना में सर्वाधिक आधुनिक शोध का विषय।

स्थौल्य हेतु गुग्गुलु

एक शास्त्रोक्त मेदोहर द्रव्य, मेदोहर गुग्गुलु का प्रधान घटक।

थायरॉइड एवं ग्रन्थि-शोथ हेतु गुग्गुलु

गण्डमाला तथा ग्रन्थि में प्रयुक्त, जो गलगण्ड, पुटी एवं ग्रन्थि-गाँठों को समाहित करने वाले शास्त्रीय वर्ग हैं — इसीलिए कांचनार गुग्गुलु।

आमवात हेतु गुग्गुलु

आमवात में प्रयुक्त, जहाँ इसके आम-हर तथा शोथहर कर्म एक साथ लागू होते हैं।

त्वचा-रोग हेतु गुग्गुलु

जीर्ण शोथयुक्त त्वचा-विकारों तथा युवान-पिटिका हेतु कैशोर गुग्गुलु में उपस्थित।

व्रण-रोपण हेतु गुग्गुलु

इसका शास्त्रोक्त व्रणशोधन कर्म, जो आन्तरिक रूप से तथा देर से भरने वाले व्रणों पर बाह्य रूप से प्रयुक्त होता है।

गृध्रसी हेतु गुग्गुलु

शास्त्रीय गुग्गुलु योगों के भीतर गृध्रसी में प्रयुक्त।

अर्श हेतु गुग्गुलु

अर्श के योगों में उपस्थित, जहाँ इसका भेदक कर्म शोथ घटाता है।

योग-आधार के रूप में गुग्गुलु

किसी भी अन्य एकल द्रव्य की तुलना में अधिक आयुर्वेदीय योग गुग्गुलु के नाम पर हैं — यह अन्य द्रव्यों को धातुओं में गहरे तक ले जाता है।

मात्रा — कितना लें

शोधित गुग्गुलु 250 मिग्रा–1 ग्राम, प्रायः योगों (योगराज, कैशोर, त्रिफला गुग्गुलु) के भीतर। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

गुग्गुल का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में गुग्गुल के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (Medoroga एवं वात प्रकरण); शार्ङ्गधर संहिता (Guggulu Kalpana).

सुश्रुत संहिता में गुग्गुल के विषय में क्या कहा गया है?

मेद, सन्धि एवं कायाकल्प हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — Medoroga एवं वात प्रकरण.

शार्ङ्गधर संहिता में गुग्गुल के विषय में क्या कहा गया है?

शास्त्रीय गुग्गुलु योगों का आधार। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Guggulu Kalpana.

आयुर्वेद में गुग्गुल किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

गुग्गुलु शास्त्रोक्त शोथहर एवं मेदोहर निर्यास है, जो सन्धिवात, वातरक्त तथा सन्धि-शोथ में, और स्थौल्य एवं बढ़े मेद में प्रयुक्त होता है। यह प्रायः कभी अकेले नहीं दिया जाता: शास्त्रीय गुग्गुलु कल्प उसे उस क्वाथ के साथ जोड़ते हैं जो उसके कर्म को दिशा देता है, इसीलिए योगराज, कैशोर तथा कांचनार गुग्गुलु के प्रयोग इतने भिन्न हैं।

गुग्गुल के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कटु, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, सर, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः वात और कफ शामक. प्रभाव: रसायन, लेखन (scraping), Yogavahi.

गुग्गुल को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। गुग्गुल का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः वात और कफ शामक.

गुग्गुल का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: निर्यास (गुग्गुल).

गुग्गुल की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

शोधित गुग्गुलु 250 मिग्रा–1 ग्राम, प्रायः योगों (योगराज, कैशोर, त्रिफला गुग्गुलु) के भीतर। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

गुग्गुल का प्रयोग कब वर्जित है?

सदैव शोधित गुग्गुलु ही प्रयुक्त करना चाहिए। कभी-कभी हल्का पाचन-विकार अथवा त्वचा-पिटिका कर सकता है; गर्भावस्था में तथा थायरॉइड या रक्त पतला करने वाली औषधि के साथ सावधानी से प्रयोग करें।

गुग्गुल कहाँ पाया जाता है?

गुग्गुलु राजस्थान, गुजरात तथा भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क उत्तर-पश्चिम के मरु प्रदेशों के मूल निवासी एक छोटे कण्टकयुक्त क्षुप का निर्यास है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • शार्ङ्गधर संहिता — Guggulu Kalpana
    शास्त्रीय गुग्गुलु योगों का आधार।
  • चरक एवं सुश्रुत संहिता — Medoroga एवं वात प्रकरण
    मेद, सन्धि एवं कायाकल्प हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Guggulipid for the Treatment of Hypercholesterolemia: A Randomized Controlled Trial Szapary PO, et al.. JAMA (2003)

    An 8-week randomized controlled trial in adults with hypercholesterolemia evaluating standardized guggulipid — a landmark Western trial examining its effect on lipid levels.

    View study
  2. Effect of Commiphora mukul (gum guggulu) in patients of hyperlipidemia with special reference to HDL-cholesterol Nityanand S, Srivastava JS, Asthana OP. Journal of the Association of Physicians of India (1989)

    A clinical study reporting reductions in serum cholesterol and triglycerides and a rise in HDL-cholesterol with gum guggulu.

    View study

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

सदैव शोधित गुग्गुलु ही प्रयुक्त करना चाहिए। कभी-कभी हल्का पाचन-विकार अथवा त्वचा-पिटिका कर सकता है; गर्भावस्था में तथा थायरॉइड या रक्त पतला करने वाली औषधि के साथ सावधानी से प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

गुग्गुलु राजस्थान, गुजरात तथा भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क उत्तर-पश्चिम के मरु प्रदेशों के मूल निवासी एक छोटे कण्टकयुक्त क्षुप का निर्यास है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुग्गुलु किसमें प्रयुक्त होता है?

गुग्गुलु सन्धिवात एवं सन्धि-शूल, स्थौल्य, बढ़े कोलेस्ट्रॉल, थायरॉइड एवं ग्रन्थि-शोथ, जीर्ण त्वचा-रोग, गृध्रसी तथा अर्श में प्रयुक्त होता है। यह योगराज, कैशोर, मेदोहर तथा कांचनार गुग्गुलु सहित शास्त्रीय योगों के एक सम्पूर्ण कुल का आधार है।

गुग्गुलु की मात्रा क्या है?

शोधित निर्यास प्रतिदिन 500 मिग्रा – 2 ग्राम, प्रायः सदैव किसी शास्त्रीय योग के भीतर, अकेले नहीं। वटी के रूप में प्रायः दो वटी दिन में दो बार उष्ण जल के साथ, अथवा निर्देशानुसार।

क्या गुग्गुलु को शोधन चाहिए?

हाँ। कच्चा निर्यास त्वचा-पिटिका तथा पाचन-विकार करता है, और शास्त्रीय परम्परा प्रयोग से पूर्व शोधन अपेक्षित करती है — प्रायः त्रिफला क्वाथ अथवा गोदुग्ध में संस्कार। अनुज्ञप्त योगों में केवल शोधित द्रव्य ही आता है।

गुग्गुलु किसे नहीं लेना चाहिए?

गर्भावस्था एवं स्तनपान में वर्जित। थायरॉइड-रोग होने पर चिकित्सकीय परामर्श लें, क्योंकि यह थायरॉइड-क्रिया को प्रभावित करता है, अथवा यदि आप रक्त पतला करने वाली, थायरॉइड की या डिल्टियाज़ेम औषधि लेते हों। शल्य-क्रिया से पूर्व सेवन रोक दें। यह अम्लपित्त बढ़ा सकता है।

मुझे कौन-सा गुग्गुलु योग लेना चाहिए?

वे परस्पर विनिमेय नहीं हैं: सन्धि-शूल हेतु योगराज एवं महायोगराज, शोथयुक्त त्वचा एवं वातरक्त हेतु कैशोर, वज़न हेतु मेदोहर, ग्रन्थि-शोथ हेतु कांचनार, मूत्र-विकारों हेतु गोक्षुरादि। योग को व्याधि से मिलाने का कार्य चिकित्सक ही करे।

क्या गुग्गुलु संकटग्रस्त है?

Commiphora wightii अति-दोहन एवं आवास-हानि से भारत में अत्यन्त संकटग्रस्त है और IUCN रेड लिस्ट में सूचीबद्ध। अधिकांश व्यापारिक द्रव्य आयातित अथवा सजातीय जातियों का होता है। उन आपूर्तिकर्ताओं को वरीयता दें जो कृषित या प्रमाणित स्रोत बताते हों।

क्या गुग्गुलु के दुष्प्रभाव हैं?

त्वचा-पिटिका सर्वाधिक सामान्य है, साथ ही पाचन-विकार तथा शिरःशूल। यह थायरॉइड-क्रिया को प्रभावित कर सकता है और अनेक औषधियों से प्रतिक्रिया कर सकता है। पिटिका दिखने पर सेवन रोककर परामर्श लें — यह मान्य प्रतिक्रिया है, संयोग नहीं।

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