चित्र: Dr.S.Soundarapandian / Wikimedia Commons, Public domain
पुनर्नवा, गदहपूरना पुनर्नवा
Boerhavia diffusa · Nyctaginaceae
अन्य नाम: पुनर्नवा, गदहपूर्ना, साँठी, Boerhaavia diffusa
प्रयोज्य अंग: मूल, पञ्चाङ्ग
पुनर्नवा (Boerhavia diffusa) आयुर्वेद का प्रधान मूत्रल है, जिसके नाम का अर्थ है "जो पुनः नया करे"। यह शोथ, वृक्क एवं यकृत्-विकारों, पाण्डु तथा सन्धि-शोथ में प्रयुक्त होता है, और उन थोड़े-से द्रव्यों में है जिनका शास्त्रीय संकेत — जल-संचय — किसी आधुनिक संकेत से निकटता से मेल खाता है।
| रस | मधुर, तिक्त, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | मधुर |
| दोष-कर्म | कफ और वात का शमन |
| प्रभाव | Anti-oedema, रसायन |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Boerhavia diffusa
- प्रयोज्य अंग: मूल, पञ्चाङ्ग
- दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
- सामान्य मात्रा: चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा ताज़ा स्वरस; क्वाथ रूप में भी लिया जाता है।
पुनर्नवा, गदहपूरना के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
पुनर्नवा (Boerhavia diffusa) का अर्थ है "जो पुनः नया करे" — एक ऐसा द्रव्य जिसकी शरीर को नवीन करने की ख्याति है। यह आयुर्वेद का प्रमुख शोथहर एवं वृक्क-पोषक द्रव्य है, जो अतिरिक्त जल दूर करता है और स्वस्थ वृक्क एवं यकृत्-क्रिया को सहारा देता है।
वर्गीकरण
निक्टेजिनेसी (Nyctaginaceae) कुल का पुनर्नवा शोथहर, मूत्रल तथा रसायन द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसके लघु-रूक्ष गुण एवं उष्ण वीर्य धातुओं से अतिरिक्त कफ तथा जल का हरण करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
पुनर्नवा शास्त्रोक्त शोथहर द्रव्य है — वही जो शोथ एवं जल-संचय में दिया जाता है। यह शोफ, मन्द वृक्क-क्रिया तथा यकृत्-वृद्धि में प्रयुक्त होता है, और ऐसा मृदु मूत्रल है जो क्षय नहीं करता। इसके नाम का अर्थ है 'जो पुनः नया करे'।
शोथ हेतु पुनर्नवा
शास्त्रों का प्रमुखतम शोथहर द्रव्य, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ भी जल संचित हो।
वृक्क-सहायता हेतु पुनर्नवा
वृक्क-विकारों तथा अल्प मूत्रता में प्रयुक्त, और आयुर्वेदीय वृक्क-योगों का मानक घटक।
यकृत् हेतु पुनर्नवा
कामला तथा यकृत्-वृद्धि में प्रयुक्त, प्रायः कटुकी के साथ।
पाण्डु हेतु पुनर्नवा
पाण्डु में नामित, तथा पुनर्नवादि मण्डूर का प्रधान द्रव्य, जो रक्ताल्पता हेतु लौह-आधारित कल्प है।
सन्धि-शोथ हेतु पुनर्नवा
उस सन्धिवात में इसके शोथहर एवं मूत्रल कर्म मिलकर कार्य करते हैं जहाँ सूजन प्रमुख हो।
जलोदर हेतु पुनर्नवा
उदर-रोग, अर्थात् उदरस्थ जल-संचय में योगों के भीतर प्रयुक्त।
हृदय हेतु पुनर्नवा
हृद्य कहा गया है और उन हृदय-योगों में प्रयुक्त होता है जहाँ व्याधि के साथ जल-संचय भी हो।
रसायन के रूप में पुनर्नवा
इसके नाम का अर्थ ही नवीनीकरण है, और शास्त्र उसे कायाकल्पकारी द्रव्यों में गिनते हैं।
मूत्र-विकारों हेतु पुनर्नवा
गोक्षुर के साथ दाहयुक्त एवं कष्टयुक्त मूत्रता में प्रयुक्त।
पुनर्नवादि मण्डूर एवं पुनर्नवारिष्ट में पुनर्नवा
दोनों शास्त्रीय कल्पों का प्रधान द्रव्य — शोथ सहित रक्ताल्पता हेतु तथा यकृत् एवं जल-विकारों हेतु।
मात्रा — कितना लें
चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा ताज़ा स्वरस; क्वाथ रूप में भी लिया जाता है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
पुनर्नवा, गदहपूरना का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में पुनर्नवा, गदहपूरना के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (शोथ चिकित्सा); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
चरक संहिता में पुनर्नवा, गदहपूरना के विषय में क्या कहा गया है?
श्रेष्ठ शोथहर द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — शोथ चिकित्सा.
भावप्रकाश निघण्टु में पुनर्नवा, गदहपूरना के विषय में क्या कहा गया है?
शोथहर एवं रसायन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में पुनर्नवा, गदहपूरना किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
पुनर्नवा शास्त्रोक्त शोथहर द्रव्य है — वही जो शोथ एवं जल-संचय में दिया जाता है। यह शोफ, मन्द वृक्क-क्रिया तथा यकृत्-वृद्धि में प्रयुक्त होता है, और ऐसा मृदु मूत्रल है जो क्षय नहीं करता। इसके नाम का अर्थ है 'जो पुनः नया करे'।
पुनर्नवा, गदहपूरना के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस मधुर, तिक्त, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य उष्ण, विपाक मधुर. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: Anti-oedema, रसायन.
पुनर्नवा, गदहपूरना को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। पुनर्नवा, गदहपूरना का वीर्य उष्ण है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.
पुनर्नवा, गदहपूरना का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: मूल, पञ्चाङ्ग.
पुनर्नवा, गदहपूरना की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा ताज़ा स्वरस; क्वाथ रूप में भी लिया जाता है। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
पुनर्नवा, गदहपूरना का प्रयोग कब वर्जित है?
सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में अथवा मूत्रल औषधि के साथ निर्देशन में ही प्रयोग करें।
पुनर्नवा, गदहपूरना कहाँ पाया जाता है?
पुनर्नवा भारत के मैदानों में मार्ग-किनारों, बंजर भूमि तथा खेतों में फैलने वाली ओषधि है, जो वर्षा-ऋतु में विशेष रूप से प्रचुर होती है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
शोथहर एवं रसायन के रूप में वर्णित। - चरक संहिता — शोथ चिकित्सा
श्रेष्ठ शोथहर द्रव्यों में उल्लिखित।
Modern research
-
Ethnomedicinal values of Boerhaavia diffusa L. as a panacea against multiple human ailments: a state of art review
(see source). Frontiers in Chemistry (2023)
A review summarising Boerhaavia diffusa's diuretic, hepatoprotective, anti-inflammatory and nephroprotective activities.
View study doi:10.3389/fchem.2023.1297300 -
Hepatoprotective activity of Boerhaavia diffusa L. roots — a popular Indian ethnomedicine
Rawat AK, et al.. Journal of Ethnopharmacology (1997)
An experimental study reporting significant hepatoprotective activity of Boerhaavia diffusa (Punarnava) root extract against chemically-induced liver damage.
View study doi:10.1016/s0378-8741(96)01507-3
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में अथवा मूत्रल औषधि के साथ निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
पुनर्नवा भारत के मैदानों में मार्ग-किनारों, बंजर भूमि तथा खेतों में फैलने वाली ओषधि है, जो वर्षा-ऋतु में विशेष रूप से प्रचुर होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पुनर्नवा किसमें प्रयुक्त होता है?
सर्वोपरि शोथ एवं जल-संचय में, तथा वृक्क-विकार, यकृत्-रोग, पाण्डु, सन्धि-शोथ एवं जलोदर में भी। यह आयुर्वेद का प्रधान मूत्रल तथा पुनर्नवादि मण्डूर एवं पुनर्नवारिष्ट का प्रधान द्रव्य है।
पुनर्नवा की मात्रा क्या है?
मूल अथवा पञ्चाङ्ग चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। पुनर्नवारिष्ट के रूप में 15–30 मिली समान मात्रा जल के साथ भोजनोपरान्त।
क्या पुनर्नवा वृक्कों हेतु सुरक्षित है?
यह अल्प मूत्रता एवं शोथ हेतु प्रयुक्त शास्त्रोक्त वृक्क-द्रव्य है। किन्तु स्थापित वृक्क-रोग को उचित चिकित्सकीय प्रबन्धन एवं निगरानी चाहिए — किसी मूत्रल द्रव्य के प्रयोग से पूर्व चिकित्सकीय परामर्श लें, विशेषतः यदि आप पहले से मूत्रल औषधि ले रहे हों।
इसे पुनर्नवा क्यों कहते हैं?
नाम का अर्थ है "जो पुनः नया करे" अथवा "पुनः नवीन हो जाए"। इसे प्रायः उसके कायाकल्पकारी कर्म का संकेत माना जाता है, और स्वयं वनस्पति का भी, जो शुष्क ऋतु में सूखती दिखती है और वर्षा के साथ पुनः जी उठती है।
क्या पुनर्नवा वज़न घटाने में सहायक है?
यह जल-संचय घटाता है, जो मेद घटाने के समान नहीं है। जो वज़न घटता है वह जल है और लौट आएगा। यह शोथ हेतु वस्तुतः उपयोगी है; यह वज़न घटाने की औषधि नहीं है और उस रूप में प्रयुक्त नहीं होनी चाहिए।
पुनर्नवा किसे नहीं लेना चाहिए?
वृक्क-रोग होने पर, मूत्रल अथवा रक्तचाप की औषधि लेने पर, या निर्जलित अवस्था में चिकित्सकीय परामर्श लें। गर्भावस्था में वर्जित। इसका मूत्रल कर्म निर्धारित मूत्रलों के साथ संचित होकर इलेक्ट्रोलाइट सन्तुलन बिगाड़ सकता है।
पुनर्नवा को हिन्दी में क्या कहते हैं?
पुनर्नवा, गदहपूर्ना अथवा साँठी। अंग्रेज़ी में स्प्रेडिंग हॉगवीड अथवा रेड स्पाइडरलिंग। श्वेत तथा रक्त, दोनों भेद प्रयुक्त होते हैं, जिनमें रक्त सामान्यतः वरीय है।