चित्र: Dinesh Valke from Thane, India / Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0
शतावरी शतावरी
Asparagus racemosus · Asparagaceae
अन्य नाम: सतावर, शतावर, शतावरी
प्रयोज्य अंग: मूल
शतावरी (Asparagus racemosus) आयुर्वेद का प्रधान स्त्री-बल्य है, जिसके नाम का अर्थ "सौ पतियों वाली" लिया जाता है — यह प्रजनन-स्वास्थ्य में उसकी ख्याति का संकेत है। यह मधुर, शीत एवं पोषक है, जो रजोनिवृत्ति, स्तन्य, अम्लपित्त तथा सामान्य क्षय में प्रयुक्त होती है।
| रस | मधुर, तिक्त |
|---|---|
| गुण | गुरु, स्निग्ध |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | मधुर |
| दोष-कर्म | वात और पित्त का शमन |
| प्रभाव | रसायन, स्तन्यजनन |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Asparagus racemosus
- प्रयोज्य अंग: मूल
- दोष-कर्म: वात और पित्त का शमन
- सामान्य मात्रा: मूल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, शास्त्रोक्त रूप से उष्ण दूध के साथ; शतावरी घृत तथा सिद्ध दुग्ध के रूप में भी लिया जाता है।
शतावरी के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
शतावरी (Asparagus racemosus) आयुर्वेद का प्रमुखतम स्त्री-बल्य है, एक शीत एवं पोषक रसायन जिसके नाम का अर्थ प्रायः "सौ मूलों वाली" — अथवा काव्यात्मक रूप से, स्त्री-जीवन की प्रत्येक अवस्था का द्रव्य — किया जाता है। मूल प्रयोज्य अंग है।
वर्गीकरण
एस्पैरेगेसी (Asparagaceae) कुल की शतावरी शास्त्रीय निघण्टुओं में रसायन तथा स्तन्यजनन द्रव्यों में वर्णित है। इसका मधुर-तिक्त रस, गुरु-स्निग्ध गुण, शीत वीर्य एवं मधुर विपाक उसे गहरे पोषक तथा पित्त एवं वात शामक बनाते हैं।
उपयोग एवं लाभ
परम्परागत रूप से हार्मोन-सन्तुलन को सहारा देने, रजो एवं रजोनिवृत्ति की असुविधा कम करने, स्वस्थ स्तन्य बढ़ाने, तथा प्रजनन एवं पाचन संस्थान को पोषित एवं सुदृढ़ करने हेतु प्रयुक्त। शीत रसायन के रूप में यह अम्लपित्त को भी शान्त करती है और सामान्य ओज को सहारा देती है।
रजोनिवृत्ति हेतु शतावरी
इसका सर्वाधिक ज्ञात आधुनिक प्रयोग — शीत एवं हार्मोन-सहायक होने से उष्ण-लहरों, रात्रि-स्वेद तथा मनोदशा-परिवर्तन में ली जाती है।
स्तन्य हेतु शतावरी
प्रमुखतम स्तन्यजनन द्रव्य, जो प्रसव के पश्चात् दिया जाता है और जिसका पारम्परिक अभिलेख दीर्घ एवं सुसंगत है।
अम्लपित्त हेतु शतावरी
मधुर, शीत एवं स्निग्ध — यह आवरण बनाकर शान्ति देती है, जिससे यह आमाशय-शोथ एवं प्रतिवाह में मानक द्रव्य बनती है।
स्त्री-प्रजनन क्षमता हेतु शतावरी
शास्त्रीय परम्परा में प्रजनन-धातु को सहारा देने हेतु प्रयुक्त, जो मासों तक ली जाती है।
रसायन के रूप में शतावरी
कायाकल्पकारी द्रव्यों में वर्गीकृत, विशेषतः पित्त-प्रकृति हेतु जहाँ उष्ण बल्य अनुकूल न हो।
रूक्षता हेतु शतावरी
जहाँ भी धातुएँ रूक्ष हों — शुष्क कास, रूक्ष त्वचा, योनि-शुष्कता — वहाँ अपने स्निग्ध पोषक स्वभाव के आधार पर प्रयुक्त।
दुर्बलता हेतु शतावरी
पुनर्लाभ एवं क्षय में प्रयुक्त बल्य द्रव्य, जो दूध के साथ लिया जाता है।
कष्टार्तव हेतु शतावरी
कष्टार्तव में प्रयुक्त, प्रायः शास्त्रीय स्त्री-योगों में अशोक के साथ।
रोग-प्रतिरोध हेतु शतावरी
सामान्य बलवर्धक कर्म वाले रसायन के रूप में नामित, जो पुनरावर्ती रोगों में प्रयुक्त होती है।
शतावरी चूर्ण एवं शतावरी गुलम में शतावरी
अकेले तथा शास्त्रीय कल्पों में उपलब्ध, और अधिकांश स्त्री-योगों में उपस्थित।
मात्रा — कितना लें
मूल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, शास्त्रोक्त रूप से उष्ण दूध के साथ; शतावरी घृत तथा सिद्ध दुग्ध के रूप में भी लिया जाता है। सुसह्य; उच्च कफ अथवा अवरोधयुक्त अवस्थाओं में संयम रखें और गर्भावस्था या हार्मोन-संवेदनशील अवस्थाओं में निर्देशन में प्रयोग करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
शतावरी का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में शतावरी के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: सुश्रुत संहिता (स्त्री रोग एवं रसायन); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).
सुश्रुत संहिता में शतावरी के विषय में क्या कहा गया है?
प्रजनन एवं कायाकल्प प्रयोग हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: सुश्रुत संहिता — स्त्री रोग एवं रसायन.
भावप्रकाश निघण्टु में शतावरी के विषय में क्या कहा गया है?
रसायन एवं स्तन्यजनन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में शतावरी किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
परम्परागत रूप से हार्मोन-सन्तुलन को सहारा देने, रजो एवं रजोनिवृत्ति की असुविधा कम करने, स्वस्थ स्तन्य बढ़ाने, तथा प्रजनन एवं पाचन संस्थान को पोषित एवं सुदृढ़ करने हेतु प्रयुक्त। शीत रसायन के रूप में यह अम्लपित्त को भी शान्त करती है और सामान्य ओज को सहारा देती है।
शतावरी के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस मधुर, तिक्त, गुण गुरु, स्निग्ध, वीर्य शीत, विपाक मधुर. दोष-कर्म: वात और पित्त का शमन. प्रभाव: रसायन, स्तन्यजनन.
शतावरी को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। शतावरी का वीर्य शीत है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और पित्त का शमन.
शतावरी का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: मूल.
शतावरी की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
मूल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, शास्त्रोक्त रूप से उष्ण दूध के साथ; शतावरी घृत तथा सिद्ध दुग्ध के रूप में भी लिया जाता है। सुसह्य; उच्च कफ अथवा अवरोधयुक्त अवस्थाओं में संयम रखें और गर्भावस्था या हार्मोन-संवेदनशील अवस्थाओं में निर्देशन में प्रयोग करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
शतावरी का प्रयोग कब वर्जित है?
सुसह्य। इसका गुरु, वर्धक स्वभाव उच्च कफ अथवा अवरोधयुक्त अवस्थाओं में तथा क्षीण पाचन वालों में सीमित रखना श्रेष्ठ है। चिकित्सीय प्रयोग हेतु, विशेषतः गर्भावस्था अथवा हार्मोन-संवेदनशील अवस्थाओं में, चिकित्सक से परामर्श लें।
शतावरी कहाँ पाया जाता है?
शतावरी भारत तथा हिमालय की मूल निवासी कन्दिल मूलों वाली आरोही वनस्पति है, जो उष्णकटिबन्धीय एवं उपोष्ण वनों तथा कंकरीली, जल-निकास वाली भूमि में मध्यम ऊँचाई तक स्वतः उगती है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
रसायन एवं स्तन्यजनन के रूप में वर्णित। - चरक एवं सुश्रुत संहिता — स्त्री रोग एवं रसायन
प्रजनन एवं कायाकल्प प्रयोग हेतु उल्लिखित।
Modern research
-
Postpartum Use of Shavari Bar Improves Breast Milk Output: A Double-Blind, Prospective, Randomized, Controlled Clinical Study
(see source). Journal of Alternative and Complementary Medicine (2022)
A double-blind RCT (n=78) reporting increased breast-milk output in postpartum women using a Shatavari-based formulation versus placebo.
View study doi:10.7759/cureus.26831 -
Randomized controlled trial of Asparagus racemosus (Shatavari) as a lactogogue in lactational inadequacy
Sharma S, Ramji S, Kumari S, Bapna JS. Indian Pediatrics (1996)
A multicentric randomized double-blind placebo-controlled trial evaluating Shatavari as a lactogogue and its effect on serum prolactin in mothers with lactational inadequacy.
View study
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
सुसह्य। इसका गुरु, वर्धक स्वभाव उच्च कफ अथवा अवरोधयुक्त अवस्थाओं में तथा क्षीण पाचन वालों में सीमित रखना श्रेष्ठ है। चिकित्सीय प्रयोग हेतु, विशेषतः गर्भावस्था अथवा हार्मोन-संवेदनशील अवस्थाओं में, चिकित्सक से परामर्श लें।
प्राप्ति स्थान
शतावरी भारत तथा हिमालय की मूल निवासी कन्दिल मूलों वाली आरोही वनस्पति है, जो उष्णकटिबन्धीय एवं उपोष्ण वनों तथा कंकरीली, जल-निकास वाली भूमि में मध्यम ऊँचाई तक स्वतः उगती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शतावरी किसमें प्रयुक्त होती है?
रजोनिवृत्ति के लक्षण, स्तन्य, अम्लपित्त, स्त्री-प्रजनन क्षमता, रूक्षता तथा सामान्य क्षय में। यह आयुर्वेद का प्रधान स्त्री-बल्य है, मधुर एवं शीत, और पित्त-प्रकृति हेतु रसायन भी।
शतावरी की मात्रा क्या है?
मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम दूध के साथ, जो थोड़े समय नहीं अपितु सप्ताहों तक लिया जाता है। स्तन्य एवं रजोनिवृत्ति हेतु इसे आँकने से पूर्व प्रायः दो से तीन मास तक निरन्तर लिया जाता है।
क्या शतावरी से स्तन्य बढ़ता है?
यह प्रमुखतम शास्त्रीय स्तन्यजनन द्रव्य है जिसका पारम्परिक अभिलेख दीर्घ एवं सुसंगत है, और प्रसव के पश्चात् यह आज भी मानक आयुर्वेदीय अनुशंसा है। इसे दूध के साथ लें, और यदि दुग्ध-आपूर्ति की समस्या बनी रहे तो स्तनपान-परामर्शक से मिलें।
क्या शतावरी रजोनिवृत्ति में सहायक है?
यह उष्ण-लहरों, रात्रि-स्वेद तथा मनोदशा-परिवर्तन में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है, और उसका शीत पोषक स्वभाव रजोनिवृत्ति-चित्र के भली-भाँति अनुकूल है। प्रभाव सप्ताहों में बनता है। जहाँ HRT निर्दिष्ट हो वहाँ यह उसका प्रतिस्थापन नहीं, अपितु सहायक है।
शतावरी किसे नहीं लेनी चाहिए?
अधिक कफ, मन्दाग्नि अथवा स्पष्ट अवरोध वाले किसी भी व्यक्ति को, क्योंकि यह मधुर एवं गुरु है। ओएस्ट्रोजन-संवेदनशील अवस्था होने पर, तथा मूत्रल या लिथियम लेने पर चिकित्सकीय परामर्श लें।
क्या शतावरी केवल स्त्रियों हेतु है?
नहीं। यह पुरुषों में अम्लपित्त, रूक्षता, क्षय तथा शीत रसायन के रूप में प्रयुक्त होती है, और कुछ पुरुष वाजीकरण योगों में सम्मिलित रहती है। स्त्री-बल्य के रूप में उसकी ख्याति उसके सर्वाधिक प्रचलित प्रयोग को दर्शाती है, कोई प्रतिबन्ध नहीं।
क्या शतावरी अम्लपित्त में अच्छी है?
हाँ — यह अम्लपित्त एवं आमाशय-शोथ हेतु मानक शास्त्रीय द्रव्यों में से एक है, क्योंकि यह मधुर, शीत एवं स्निग्ध है। यह उदासीन करने के स्थान पर आवरण बनाकर शान्ति देती है, और प्रतिअम्लों की तुलना में सतत प्रयोग के अधिक अनुकूल है।