अडूसा, वासा (Justicia adhatoda) — leaf
अडूसा, वासा — Justicia adhatoda. प्रयोज्य अंग: पत्र.
चित्र: VASANTH S.N. / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

अडूसा, वासा वासा

Justicia adhatoda · Acanthaceae

अन्य नाम: वासा, वासक, अडूसा, अरूसा, मालाबार नट

प्रयोज्य अंग: पत्र

वासा (Justicia adhatoda) मालाबार नट है, रक्त-मिश्रित कफ सहित कास हेतु आयुर्वेद का विशिष्ट द्रव्य। इसका नाम उसकी तिक्त गन्ध से निकला है। यह शास्त्रीय रक्तपित्त एवं श्वसन द्रव्य है, जो श्वसनी-शोथ, श्वास तथा श्वसन-मार्ग के रक्तस्राव में प्रयुक्त होता है।

अडूसा, वासा — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कषाय
गुणलघु, रूक्ष
वीर्यशीत
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और पित्त का शमन
प्रभावकासहर, Raktastambhaka (styptic)

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Justicia adhatoda
  • प्रयोज्य अंग: पत्र
  • दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
  • सामान्य मात्रा: पत्र-स्वरस 10–20 मिली अथवा चूर्ण 1–3 ग्राम, प्रायः मधु के साथ; अवलेह तथा क्वाथ के रूप में भी।

अडूसा, वासा के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीअडूसा, वासा
अंग्रेज़ीMalabar Nut
संस्कृतवासा, वासक, अटरूष
बंगालीবাসক
गुजरातीઅરડૂસી
मराठीअडुळसा
तमिलஆடாதோடை
तेलुगुఅడ్డసరము
कन्नड़ಆಡುಸೋಗೆ
मलयालमആടലോടകം
लैटिन (वानस्पतिक)Justicia adhatoda

परिचय

वासा (वासक, Justicia adhatoda) आयुर्वेद की प्रधान श्वसन-ओषधि है, जिसके पत्तों पर कास, श्वास तथा रक्त-विकारों हेतु भरोसा किया जाता है। शीत एवं शोधक होकर यह श्वास-मार्गों को सुख देती है और रक्तस्राव को शान्त करती है।

वर्गीकरण

एकैन्थेसी (Acanthaceae) कुल की वासा कासहर, श्वासहर तथा रक्तपित्तहर द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-कषाय रस तथा शीत वीर्य उर से कफ का हरण करते हैं और पित्त-जनित रक्तस्राव का शमन करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

वासा कास तथा रक्तपित्त हेतु आयुर्वेद की प्रधान ओषधि है। यह कफयुक्त कास, श्वास एवं श्वसनी-शोथ में, और विशेष रूप से श्वसन-मार्ग के रक्तस्राव में प्रयुक्त होती है, जहाँ उसका रक्तस्तम्भक कर्म मूल्यवान है। इसे पत्र-स्वरस के रूप में मधु के साथ दिया जाता है।

रक्तयुक्त कास हेतु वासा

इसका परिभाषक संकेत — रक्तष्ठीवन तथा रक्त-मिश्रित कफ हेतु शास्त्रीय द्रव्य, जो ग्रन्थों में नामित है।

श्वसनी-शोथ हेतु वासा

एक प्रधान कासहर द्रव्य, जो घने श्लेष्मा सहित कफयुक्त कास हेतु प्रयुक्त होता है।

श्वास हेतु वासा

श्वास में प्रयुक्त; इसका क्षाराभ वेसिसीन प्रलेखित श्वसनी-विस्फारक कर्म रखता है।

रक्तपित्त हेतु वासा

सामान्य रूप से रक्त-विकारों का शास्त्रीय द्रव्य, केवल श्वसन-सम्बन्धी विकारों का नहीं।

अतिरज हेतु वासा

अपने रक्तस्तम्भक कर्म के आधार पर असृग्दर में प्रयुक्त।

रक्तार्श हेतु वासा

अर्श में वहाँ नामित जहाँ रक्तस्राव प्रधान लक्षण हो।

राजयक्ष्मा हेतु वासा

शास्त्रीय परम्परा में राजयक्ष्मा में सहायक रूप से प्रयुक्त — एक सहायक द्रव्य, कभी चिकित्सा नहीं।

ज्वर हेतु वासा

श्वसन-संलिप्तता सहित ज्वर में प्रयुक्त।

वासावलेह के रूप में वासा

शास्त्रीय अवलेह रूप, जो तीव्र तिक्त स्वरस की अपेक्षा लेने में सरल है।

वासारिष्ट तथा सितोपलादि योगों में वासा

शास्त्रीय श्वसन-योगों में व्यापक रूप से उपस्थित।

मात्रा — कितना लें

पत्र-स्वरस 10–20 मिली अथवा चूर्ण 1–3 ग्राम, प्रायः मधु के साथ; अवलेह तथा क्वाथ के रूप में भी। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

अडूसा, वासा का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में अडूसा, वासा के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (कास एवं रक्तपित्त चिकित्सा); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).

चरक संहिता में अडूसा, वासा के विषय में क्या कहा गया है?

कास तथा रक्त-विकारों हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — कास एवं रक्तपित्त चिकित्सा.

भावप्रकाश निघण्टु में अडूसा, वासा के विषय में क्या कहा गया है?

कासहर तथा रक्तपित्तहर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.

आयुर्वेद में अडूसा, वासा किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

वासा कास तथा रक्तपित्त हेतु आयुर्वेद की प्रधान ओषधि है। यह कफयुक्त कास, श्वास एवं श्वसनी-शोथ में, और विशेष रूप से श्वसन-मार्ग के रक्तस्राव में प्रयुक्त होती है, जहाँ उसका रक्तस्तम्भक कर्म मूल्यवान है। इसे पत्र-स्वरस के रूप में मधु के साथ दिया जाता है।

अडूसा, वासा के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: कासहर, Raktastambhaka (styptic).

अडूसा, वासा को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। अडूसा, वासा का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.

अडूसा, वासा का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: पत्र.

अडूसा, वासा की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

पत्र-स्वरस 10–20 मिली अथवा चूर्ण 1–3 ग्राम, प्रायः मधु के साथ; अवलेह तथा क्वाथ के रूप में भी। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

अडूसा, वासा का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रीय मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; प्रारम्भिक गर्भावस्था में वर्जित तथा रक्तस्राव-सम्बन्धी प्रयोग निर्देशन में करें।

अडूसा, वासा कहाँ पाया जाता है?

वासा एक सदाबहार क्षुप है जो भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानों तथा निचली पहाड़ियों में सामान्य है, प्रायः बाड़ के रूप में उगाया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
    कासहर तथा रक्तपित्तहर के रूप में वर्णित।
  • चरक संहिता — कास एवं रक्तपित्त चिकित्सा
    कास तथा रक्त-विकारों हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Adhatoda vasica and Tinospora cordifolia extracts ameliorate clinical and molecular markers in mild COVID-19 patients: a randomized open-label three-armed study (see source). Scientific Reports (2023)

    A randomized open-label study reporting Adhatoda vasica (with Tinospora cordifolia) extract improved clinical and molecular markers in mild COVID-19 patients.

    View study doi:10.1186/s40001-023-01507-7

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रीय मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; प्रारम्भिक गर्भावस्था में वर्जित तथा रक्तस्राव-सम्बन्धी प्रयोग निर्देशन में करें।

प्राप्ति स्थान

वासा एक सदाबहार क्षुप है जो भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानों तथा निचली पहाड़ियों में सामान्य है, प्रायः बाड़ के रूप में उगाया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वासा किसमें प्रयुक्त होती है?

सर्वोपरि रक्त-मिश्रित कफ सहित कास में — वही उसका परिभाषक शास्त्रीय संकेत है — तथा श्वसनी-शोथ, श्वास, अतिरज एवं रक्तार्श में भी। यह आयुर्वेद की प्रधान रक्तपित्त ओषधि है।

वासा की मात्रा क्या है?

पत्र-स्वरस 10–20 मिली मधु के साथ, पत्र-चूर्ण 1–3 ग्राम, अथवा वासावलेह 1–2 चम्मच दिन में दो बार। स्वरस तीव्र तिक्त है, इसीलिए अवलेह रूप अधिक प्रयुक्त होता है।

क्या रक्त सहित कास किसी ओषधि से ठीक हो सकती है?

नहीं — रक्त सहित कास सदैव चिकित्सकीय अनुसन्धान अपेक्षित करती है। यह राजयक्ष्मा, कर्कट, फुफ्फुस-अन्तःशल्यता अथवा श्वसनी-विस्फार का संकेत हो सकती है। इस संकेत में वासा का दीर्घ शास्त्रीय अभिलेख है, किन्तु वह निदान की सहायक है, कभी उसका प्रतिस्थापन नहीं।

वासा किसे नहीं लेनी चाहिए?

गर्भावस्था में वर्जित — वासा का प्रलेखित गर्भाशय-उत्तेजक तथा गर्भपातक कर्म है और वह विशेष रूप से प्रतिनिर्दिष्ट है। स्तनपान कराती हों अथवा कोई श्वसन-औषधि लेती हों तो परामर्श लें।

वासा को हिन्दी में क्या कहते हैं?

अडूसा अथवा अरूसा। अंग्रेज़ी में मालाबार नट अथवा वासका। वानस्पतिक नाम Justicia adhatoda प्राचीन स्रोतों में कभी-कभी Adhatoda vasica दिया जाता है।

क्या वासा श्वास में सहायक है?

यह शास्त्रीय श्वसन-योगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है, और उसका क्षाराभ वेसिसीन प्रलेखित श्वसनी-विस्फारक कर्म रखता है। यह सहायक है — श्वास को उचित निदान चाहिए और निर्धारित इन्हेलर बन्द नहीं करने चाहिए।

क्या वासा के दुष्प्रभाव हैं?

शास्त्रीय मात्रा में सुसह्य। यह तीव्र तिक्त है और शुद्ध रूप में लेने पर मिचली कर सकती है। मुख्य सावधानी गर्भावस्था है, जहाँ यह प्रतिनिर्दिष्ट है। अत्यधिक बड़ी मात्रा वमन तथा अतिसार कर सकती है।

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